मल्लूह काका की गाँव में में बड़ी धाक थी। बड़ा आलीशान मकान था। दो-दो चार चक्का था। बेटा दोनों बाहर बढ़का शहर में रह कर टेक्निकल पढाई करता था। काम कुछ खास नही करते थे लेकिन लोग उनके यहाँ बहुत आता जाता था। सब सरकारी ऑफिस में उनका पहुँच था। थाना-ब्लॉक, कलेक्टेरिट, कोर्ट-कचहरी, पंचायत, सरकारी हॉस्पिटल सब जगह हाकिम-मुलाजिम से उनकी काफी दोस्ती थी। सरपंच-मुखिया, विधायक-सांसद, दरोगा-मनेजर सब लोग उनके यहाँ आते जाते थे। यही कारण था गाँव में उनकी बड़ी धाक थी। मुसीबत में जब भी कोई आता था, सबसे पहले मल्लूह काका के दरवाजे पर ही जाता था। आदमी भी बहुत नेक थे, दिल खोल कर सबका मदद करते थे। एक बार गंगुआ का अप्पन भाई से झगड़ा हो गया। बात कुछ खास नही था, बस गंगुआ की बकरी बगल में उसके भाई के खेत में चली गयी। उसका भाई समझाया कि बकरी बाँध कर रखा करो, हटिया से सब्जी लाने में अखर जाता है। सामने बारी में जब भी नेनुआ और कद्दू लगाते हैं, बकरी सत्यानाश कर देता है। दस दिन पहले बाजार से खरीद कर बैंगन का पौधा लगाये थ...
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