वो दोस्त कहाँ गये
जो देखते ही मुस्कुरा देते थे
उन्हे सिर्फ मेरी फिक्र थी
मेरी बट्वे की नही
आज रिश्ता उतना ही घन्सिठ होता है
जितना बटवा भारी हो
वरना कोई आँख भी नही मिलाता
चाहे सड़क कितनी भी संकरी हो
निगाहों से गिर कर भी
लोग उनसे निभा लेते है
आपका बटवा अगर भारी हो
तो लोग सिर पर उठा लेते हैं
धोखा खा खा कर बहुत कुछ सीखा है
लेकिन कैसे कह दूँ
अब ठगा नही जाऊँगा
इसलिए एक चीज मुझे लौटा दे
मेरे दिल को फ़िर से बच्चा बना दे
वैसे तो जंग मैंने ही छेड़ा है
क्योंकि इम्तिहान से मुझे डर नही लगता
ये बात अलग है कि
तू इम्तिहान सबका लेता भी नही
पर हो सके तो एक चीज़ मुझे लौटा दे
मेरे दिल को फ़िर से बच्चा बना दे
- बिपिन कुमार चौधरी
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