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आज भर लिया है हमने क़लम में ज़ख्मों का लहू
गम इस बात का नही
कि जो हासिल करना था कर नही पाये
गम तो इस बात का है कि
जिनकी तबाही रोकने के लिये खुद को बरबाद कर लिया
उसी ने हमेशा पीठ पर छुड़ा घोंपा
अपनी छोटी सी तबाही पर जिसने
मेरा सुकून मुझसे छीन लिया था
उनके लिये आँधी को झेला हूँ मै
दर्द का ढिंढोरा पीटने की आदत नही
मेरी खामोशी समझना इतना आसान भी नही
वक्त जख्मों को भर देगा
पर निशान का क्या करूँ . . .
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✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी
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