सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

अक्टूबर, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

१२. आख़िर क्यों इतना मजबूर इस देश में अन्नदाता है... (काव्यांजलि) @

अाठ अक्टूबर मुंशी प्रेमचंद्र की पुण्यतिथि को समर्पित मेरी कविता 💐💐💐💐 आख़िर क्यों इतना मजबूर इस देश में अन्नदाता है... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी हम सभी का पालनहार यह धरती - माता है, फ़िर अन्नदाता से ही क्यों नाराज़ भाग्य विधाता है, कभी बाढ़ से पीड़ित कभी सुखाड़ आता है, कठोर मेहनत कर भी नहीं भरपेट भोजन पाता है... सपने जिनके मजबूरियों के भेंट चढ़ जाता है, सरकार उदासीन रब भी कहर ढाता है, बीमार हालत में दवाई बिन स्वर्ग सिधार जाता है, संघर्ष पथ में नित्य बिना कसूर यह सजा पाता है... बच्चे जिनके अन्न को मोहताज हो जाता है, जिस घर की देवियों की दशा देवताओं को रुलाता है, उन्हीं के कर्मों से हर कोई थाली में भोजन पाता है, आख़िर क्यों इतना मजबूर इस देश में अन्नदाता है...

१५. बनावटी चेहरे @

बनावटी चेहरे ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी बनावटी चेहरा सजाकर, आइना को झूठा बतलाते हैं, कुकर्मों की काली बदरी ढककर, क्या हैं और क्या दिखाते हैं... कड़कती धूप में तपकर, कम समझदार पसीना बहाते हैं, मौसम हो चाहे कितना प्रतिकूल, फूलों की खूबसूरत बगिया सजाते हैं... बगिया के खूबसरत फूल, मिलकर सुंदर माला बनाते हैं, किसी के चरणों के स्पर्श की इच्छा, अफसोस बनावटी चेहरे को सजाते हैं... इत्र का मनमोहक सुगंध, पसीने को बदबूदार बताते हैं, निज स्वार्थ में फुलवारी रौंद कर, बनावटी लोग बनावटी आंसू बहाते हैं... पसीना बहाने वाले को मूर्ख समझकर, ये लोग उनका उपहास उड़ाते हैं, आंसू बहाना इन मूर्खों को नहीं आता, मजबूर होकर ये लोग खून की नदियां बहाते हैं...