मोबाइल जिंदगी ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी कबाड़ी में पड़ा मोबाइल, इंसानी फ़ितरत का हुअा शिकार, कभी जिंदगी में सबसे ख़ास था, अहंकार टूटा जब हुअा बेकार ... चिपक कर जिसने संग घंटो बिताया, दोस्तों संग अपनी प्रेमिका को पटाया, जिसकी बदौलत सोशल मीडिया में सुर्खियां पाया, अचानक हीं उसे कबाड़ी को थमाया ... धरती पर यह जो मानव है, स्वार्थवश पल में बनता दानव है, मानवीय स्नेह कृपा का जिसे होता अहंकार, कष्टदायक होती यह जिंदगी नरक बनता संसार... कबाड़ी वाला भी बिल्कुल हतप्रभ था, अपनी दुर्गति का मोबाइल को भी कहाँ ख़बर था, नशा जब तलक उसका टूटा था, सिम और चिप से उसका साथ छूटा था ... सिम खुशनुमा हालात है, चिप संजोने लायक यादाश्त है, मानव की इतनी हीं अहमियत है, फ़िर सबकुछ सुपुर्दे ख़ाक है... सूर्य चन्द्रमा इस सृष्टि में गवाह हैं, मानवीय स्वार्थ कृत अनंत गुनाह हैं, गुनहगारों की भी पूजा होती है, यह सिर्फ वक्त और हालात की बात है ...
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