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अप्रैल, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

गरीबों_की_बढ़ी_चर्बी_से_सब_परेशान

#गरीबों_की_बढ़ी_चर्बी_से_सब_परेशान (व्यंग्य) ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी फेंकना ऋषि आग बबूला हो कर पुलिस को भद्दी भद्दी गालियां दे रहा था। तभी जामुन काका ने फेंकना को टोका "क्या हुआ रे फेंकना, काहे दरोगवा को गरिया रहा है। फिर आज सौतारी में तुमको धड़ लिया क्या ? फेंकना यह सुनते ही गर्म हो गया, बोला काका इज्जत करते हैं तो ढ़ेर मत बोला कीजिए। आपका बेटवा कौन ऐसा दिन है, जो खा पी कर रात में महाभारत नहीं करता है लेकिन आपका या दारोगवा का का मजाल है कि उसे कोई कुछ बोल दे। आख़िर वह सरपंच का बेटा है और मैं एक गरीब आदमी हूं और मुंह खोलवाए हैं तो सुन लीजिए पिछले बार जब आप ही दारोगवा को बुला कर धड़वाए थे तो यही शर्त पर छूटवाए थे कि दोनों को शाम तक दो देशी मुर्गा के साथ साथ एक बोतल ब्रांडेड फुल पहुंचवाना होगा और आए हैं नाटक बतियाने। तब तक थोड़ी भीड़ भी जमा हो गई थी। सरेआम अपनी मिट्टी पलित होते देख सरपंच जामुन काका ने पैंतरा बदला। बोले तुम तो नाहक गर्म हो रहे हो। मुर्गा लाकर तुम्हीं तो बनाया था और आधा से ज्यादा बोतल भी तुम्हीं खाली कर दिया था। अरे वह तो तुम्हारा इज्जत रखने के लिए हम और दरोगवा थोड़ा सा...

पंचायत चुनाव

पंचायत चुनाव पंचायत चुनाव का माहौल है। सभी ओर एक अत्यंत ही उत्सवी वातावरण है। दरसअल दो दिनों बाद ही वोटिंग होना है। यही कारण है कि हर दस मिनट पर कोई ना कोई टेम्पो या रिक्शा लाउडस्पिकर से शोर मचाते हुए गांव में प्रवेश कर जाता है। देशभक्ति से ओतप्रोत गीतों मेरे देश की धरती सोना उगले..., रंग दे बसंती चोला..., ए मेरे वतन के लोगों... आदि के मुखड़ों के बीच आपका भाई, शिक्षित, मिलनसार फलानां बाबू या आपके घर की शुशील, कर्मठ बहू  ढेकना देवी को भारी से भारी मतों से विजयी बनावें और अपना सेवा करने का अवसर दें ...., के बाद जिंदाबाद का ज़ोरदार नारा और पीछे से बच्चों का शोर और उसके पीछे उड़ती हुई धूल...। सुबह से शाम तक उम्मीदवारों और उनके परिवारजनों, कार्यकर्ताओं का निर्बाध रूप से घर घर आने जाने का सिलसिला, बड़े बुजुर्ग को दंडवत प्रणाम करते हुए आशीर्वाद प्राप्त करने का अघोषित युद्ध, हैंडबिल और पैंपलेटों से पटा पड़ा बरामदा और सड़क पर निकलते ही धनी, सर्विस वाले, जमींदारों और महाजनों को छोड़ दें, फेंकना, जित्तन, हिरवा, मंगरू, झुनियां, मंटू, आदि मजदूर टाईप लोगों को मिलने वाला अ...

२. पाखंड @

पाखंड ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी लेकर नाम धर्म का, छिपाते काज कुकर्म का, कैसा यह ज्ञान बांटते हैं, धर्म का विरोधी, लोग धर्म को मानते हैं, परमात्मा की तलाश में, ज्ञान प्राप्ति की उल्लास में, जिन्हें हम भगवान का डाकिया मानते हैं, मिथ्याडंबरों से धर्म को कुरूप बनाते हैं। हमारी श्रद्धा का कर नृशंस हत्या, नफ़रत फैलाना जिनकी तपस्या, भीड़ को उन्मादी उपदेशों से बरगलाते हैं, धर्मगुरुओं का ऐसा भीड़ आम जन को रुलाते हैं, धर्म की आड़ में,  निज स्वार्थ के जुगाड़ में, राष्ट्रहित से भी विरोध करना सिखलाते हैं, ऐसे पाखंडी देशभक्तों के क्रोधाग्नि को जलाते हैं लाख टके का एक सवाल,  धर्म के नाम पर क्यों है बबाल, सृष्टि को चाहे जिसने भी बनाया है, हमने अपनी रचना में कौन सा भेद पाया है...

११. व्यर्थ सारा ज़ख़ीरा @

#व्यर्थ_सारा_जखीरा ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी बमों का जखीरा, विध्वंस का मदिरा, संकट में सब जन हैं, सबकी यही पीड़ा, तरक्की हमने बहुत की, फिर कैसा यह अंधेरा, ऊर्जा किया कहां नष्ट, काम आया नहीं ज़ख़ीरा, सामने दिख रहा सबको काल है, सारी दुनियां में क्यों इतना बबाल है, अदृश्य सा एक कण है, विचलित सबका मन है, सुपर पावर भी है डरा, व्यर्थ सारा जखीरा, भयभीत है अंतर्मन, करे करबद्ध सब निवेदन, संकट में अस्तित्व है, सृष्टि पर खतरा बड़ा, मानव की लोलुपता, ले रही है कठिन परीक्षा, संयम सहयोग की तपस्या, निदान होगा समस्या, आश्चर्यजनक अद्भुत है, मानव कितना दुष्ट है, विपदा में सब हलकान हैं, लूटने में कुछ पहलवान हैं, अश्रु उन्हें दिखता नहीं, आत्मा भी कांपता नहीं, ये लोग सच में महान हैं, मृत्यु से भी सामर्थ्यवान हैं, नाम उनके कई हैं, लेकिन उन्हीं से आस है, किया जिसने सृष्टि का सृजन, पापियों का नाश है, कोतुहल एक बड़ी, बड़ा मुश्किल एक सवाल है, मौत सामने देख भी लालच की मिटती क्यों नहीं प्यास है, अंतरात्मा से आती आवाज, नर मत हो निराश, विध्वंस का भी होगा सर्वनाश, मानव रचेगा इतिहास, एक नया सवेरा आयेगा, आतंक म...

९७. धंधा ए बदनाम @

**धंधा ए बदनाम ✍🏻 *बिपिन कुमार चौधरी* आजाद हमारा देश, आजाद है हिंदुस्तान, फिर क्यों और किससे हम हैं परेशान, हो हिंदु,मुस्लिम चाहे सीख या मुसलमान, सब सामान, करते सब मिलकर मतदान, बेशक मैं गलत, लेकिन बोलता सारा हिंदुस्तान, बिना नोटों का नहीं होता, किसी टेबल पर काम, उपर ही उपर खा जाते, फिर बनते मासूम अनजान, अपने दिल की कोई ना पूछे, बेवजह सिस्टम बदनाम, देश का हर युवा ईमानदार व निष्ठावान, फेक दो उसके आगे मुर्गे का एक टांग, रहो बेफिक्र करेगा तुम्हारा ही गुनगान, समझो भेद आप, बन जाओगे महान, उसके साथ हो जाए थोड़ा मदिरापान, मस्ती में थिरकेंगे, चाहे लूट जाए जहांन, यही इनकी समाजसेवा, इतना ही मांग, लूट लाओ आप या हो कोई गरीब कुर्बान, मौका का फायदा यहां सभी खूब उठाते हैं, भरने खुद का पैकेट सिस्टम को गलत बताते हैं, अगर जनता के प्रतिनिधी मन में लें ठान, बेरोजगार हो कर फिर किसको करेंगे बदनाम,

९८. फेसबुकिया_दान_रहस्य @

#फेसबुकिया_दान_रहस्य ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी हर चौराहे पर दानवीर खड़ा, फिर जनता काहे इतना रोय। सेवक अगर लेबे सुधि, जनता दानवीर का करे क्यों खोज।। अपनी दयनीय हालत पर दिन रात, गरीब आंसु बहाये रोज। इनकी दुर्दशा का फ़ेसबुक पर, खुशी मनाये दानवीरों का फौज।। गुप्त दान, महा कल्याण सनातन संस्कृति का पावन सोच। सोशल मीडिया पर गरीबों का ऐसा मजाक, मानो धरती का बोझ।। दाताओं के इस देश में दानवीर कर्ण भी बहुत लजाए। दानदाता समाजसेवी जब, भिखारियों का हक मार खा जाए।। मत करो मदद गरीबों का, बस करो तुम इतनी मेहरबानी। अपनी दीनता का तस्वीर देख, उतरे ना किसी गरीब का पानी।। हाथ को देकर उसके योग्य काम, बनाओ उसको स्वाभिमानी। दीनता का मजाक उड़ाने वाले, दीन बड़ा और है तूं अभिमानी।। राह चलते पैरों पर गिर, ताज तूने बड़ा यह पाया है। क्या तेरी ऐसी तस्वीर सोसल मीडिया पर कोई लगाया है।।

१२४. सत्ता_नीति @

#सत्ता_नीति ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी खैरात बांट बांट कर, संपन्न हुआ ना कोय। संपन्न होता बहुजन, फिर हाथ न फैलाता कोय।। दोष मढ़ मढ़ कर, किया वोट जो न था देय। अब जो सत्ता सतावे, नाचो भंग-मदिरा पेय।। ईमान को सब कोसत हैं, आपन ईमान पूछे ना कोय। अगर सब आपन ईमान पूछियें, फिर काहे कोई रोय।। हर डाल पर हंस बैठा, मौका मिलत उल्लू होय। पांच बरस ढोल बजावत, जनता मन ही मन रोय।। सत्ता से हमें क्या मतलब, बुद्धिजीवी बेसुध होय सोय। बुद्धिजीवी बने जब चमचा, लोकतंत्र काहे ना रोय।। देश खूब तरक्की करे, अचरज जनता खुश ना होय। जनता जब तरक्की करे, नेता को नीति पसंद ना होय।। मेधा को मिले सम्मान, जात पात को वोट करे ना कोय। हर हाथ पाये रोटी सम्मान, दुष्ट, दुर्जन सत्ता से दूर होय।।

१२५. पटरी से जरा भी उतरूं, बन जाता फालतू और बेकार @

एक पत्नी पीड़ित की कहानी, मेरी कविता की जुबानी ________________________________________ #पटरी_से_जरा_भी_उतरूं_बन_जाता_फालतू_और_बेकार ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी इस पत्नी नाम की बीमारी का क्या करूं मैं यार ? नहीं पचता इसका भोजन बिना किये टकरार, उसकी सुनो, उसी की सुनो, बनो एकदम वफादार, पटरी से जरा भी उतरूं, बन जाता हूं फालतू और बेकार... मैं भले कुछ ना बोलूं,  फिर भी बातें उसकी कभी ख़तम नहीं होती है यार, अगर ध्यान जरा भी भटका मेरा, शुरू हो जाता टकरार, झगड़ा ख़तम करने को बोलना पड़ता, मैं गलत तुम सही हो सरकार, पटरी से जरा भी उतरूं, बन जाता हूं फालतू और बेकार... काम उसे मेरी बिल्कुल पसंद नहीं आये, चाहे रहूं कितना भी खबरदार, काम अगर नहीं करूं तो, शुरू हो जाता टकरार, ताने से उसके बच जाऊं, इसलिए साथ ले जाता हूं उसे बाज़ार, पटरी से जरा भी उतरूं, बन जाता हूं फालतू और बेकार.. रोज रोज की यही है कीच कीच, यह मुश्किल बड़ा कारोबार, कुछ मित्र पारंगत इस काम में लेकिन भाभीजी करती उस पर भी वार, तब सोचता मैं नहीं अकेला, पीड़ित सारा संसार, पटरी से जरा भी उतरूं, बन जाता हूं फालतू और बेकार ....