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व्यंग्य // अब चीटर को स्मार्ट कहा जाता है . . .।

मल्लूह काका की गाँव में में बड़ी धाक थी। बड़ा आलीशान मकान था। दो-दो चार चक्का था। बेटा दोनों बाहर बढ़का शहर में रह कर टेक्निकल पढाई करता था। काम कुछ खास नही करते थे लेकिन लोग उनके यहाँ बहुत आता जाता था। सब सरकारी ऑफिस में उनका पहुँच था। थाना-ब्लॉक, कलेक्टेरिट, कोर्ट-कचहरी, पंचायत, सरकारी हॉस्पिटल सब जगह हाकिम-मुलाजिम से उनकी काफी दोस्ती थी। सरपंच-मुखिया, विधायक-सांसद, दरोगा-मनेजर सब लोग उनके यहाँ आते जाते थे। यही कारण था गाँव में उनकी बड़ी धाक थी। मुसीबत में जब भी  कोई आता था, सबसे पहले मल्लूह काका के दरवाजे पर ही जाता था। आदमी भी बहुत नेक थे, दिल खोल कर सबका मदद करते थे।  
                एक बार गंगुआ का अप्पन भाई से झगड़ा हो गया। बात कुछ खास नही था, बस गंगुआ की बकरी बगल में उसके भाई के खेत में चली गयी। उसका भाई समझाया कि बकरी बाँध कर रखा करो, हटिया से सब्जी लाने में अखर जाता है। सामने बारी में जब भी नेनुआ और कद्दू लगाते हैं, बकरी सत्यानाश कर देता है। दस दिन पहले बाजार से खरीद कर बैंगन का पौधा लगाये थे सब ई  बकरी नाश कर दिया। बस फ़िर क्या था गंगुआ ने बकरी को खुब पीटना शुरू कर दिया। इतने में गंगुआ की पत्नी बकरी को बचाने पहुँची लेकिन गंगुआ का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उसने लगे हाथ अपने पत्नी की भी धुलाई कर दी। चारो तरफ़ से गाँव के लोगों की भीड़ जमा हो गयी। गंगुआ की पत्नी जो पहले से ही बीमार चल रही थी, इस पिटाई से बेहोश हो गयी और उसे दाँत लग गया। बड़ी मुश्किल से लोगों ने उसे उठा कर खाट पर डाला। गाँव की कुछ औरतों ने मुँह पर पानी का छींटा मारा, बुढ़ी काकी जल्दी से चमच ले कर आयी और गंगुआ की पत्नी का दाँत छौराया। गंगुआ का भाई तब तक कम्पोन्डर साहब को बुला लाया। कम्पोन्डर कुछ देर जाँच कर कुछ दवाई  दे दिया। गंगुआ का भाई  अपने पॉकेट से सौ रुपया कम्पोन्डर को दे कर विदा किया। कुछ देर में सब लोग अपने घर चले गये। माहौल शांत हो गया लेकिन बुरी तरह से पिटाई होने के कारण बकरी अब भी में-में कर रही थी।

       गँगुआ भी अंदर से बहुत परेशान था। कर्ज़ा ले कर जो पैसा ठेकेदारी के काम लगा दिया था उसका अलग टेंशन था। काम ठीक ढंग से नही होने के कारण अफसर और इंजिनियर लोग रोज़ किसी ना किसी बात को लेकर झंझट करके जाते थे। पैसा हाथ में रहता तो सब मेनेज हो जाता लेकिन हाथ खाली था। घर पर बीबी रोज़ बेटा को कॉन्वेंट में अड्मिशन का जिद्द किये थी। घर का रोज़ का खर्चा भी बड़ा मुश्किल से चलता था। उस पर उसका अपना भाई भी उसका मजबूरी समझने को तैयार नही था। तभी मुखियाजी और मल्लूह काका उधर से गुजर रहे थे।

       मल्लूह काका देखते ही बोले क्या हुआ रे गंगुआ बहुत परेशान है।
      गंगुआ "कुछ नही काका"
"अरे बोलो बेटा, वैसे मैं सब जानता हूँ "  मल्लूह काका बोले।
'क्या जानते हैं ' गंगुआ हैरान हो कर पूछा।
मल्लूह काका रहस्यमयी मुस्कुराहट के साथ बोले "बेटा सुने तुम्हारा भाई तुम्हारी दुल्हनियां को बहुत पीटा है।"
"कौन बोला मल्लूह काका"
"अरे बेटा गाँव क्या, हम तो पुरा देश दुनियाँ का ख़बर रखते हैं"
"ई  बात झूठ है मल्लूह काका" गंगुआ बोला।
"यार छोड़ो, पुरा उमर धूप में सूखा के दाड़ी-बाल नही पकाये हैं" मल्लूह काका ने तंज़ कसा।

गंगुआ झल्लाया बोला "मेरी पत्नी को जो आँख उठा कर देखेगा, हम उसका आँख निकाल लेंगे, ई धरती पर किसका औकाद है जो उसको छू देगा।"
मल्लूह काका भी तमतमा गये बोले "चल यार!!!! भौंकने वाला कुत्ता काटता नही है। उतने औकाद है तो अपना भाई को सबक सीखाओ। कन्या को दिन-दहारे कोई पीट दिया और मरद यहाँ मुँह से शेर बना फ़िर रहा है।"
गँगुआ की पत्नी सब बात सुन रही थी। पति के करीब आ कर कराहते हुए बोली "आप गलत नही हैं जी, लेकिन मल्लूह काका भी क्या गलत बोल रहे हैं। आखिर झगड़ा तो आज उहे लगाया। नही तो आज इतना बड़ा कांड होता क्या???? देखिये बकरी अभी तक में.... में..... कर रही है"

लोहा गर्म था और मुखीयाजी जो अब तक चुपचाप सारी बात सुन रहे थे, उन्होंने समझदारी से चोट किया "देख गँगुआ बात को गहराई से समझने की कोशिश करो। आखिर आज इतना बड़ा कांड किसके कारण हुआ और अगर तुम अब भी उसको सबक नही सिखाये तो तुम्हारा इस पंचायत में क्या इज्जत रह जायेगा।"
मुखियाजी की बात गंगुआ को तीर की तरह लगी। गिड़गिड़ाते हुए बोला "आप तो सब बात जानबे करते हैं मुखीयाजी। कितना मजबूरी में हम गुजर रहे हैं। मेरा हाथ भी खाली है। अब आप ही बताईये हम क्या करें।
मुखीयाजी गम्भीर हो कर बोले "यार हमलोग मर गये हैं क्या ???इज्जत के सामने पैसा क्या है जी!!!! और तुम्हारा इज्जत चला जाये और  हमलोग तुम्हारे लिये पैसा का इंतिजाम भी नही कर सकें तो इस दुनिया में जी कर क्या करेंगे। चलो हमारे साथ. . ."

  तीनों आदमी साथ चल दिये और पहुँच गये मुरली बाबू के यहाँ। मुरली बाबू की उमर साठ से कुछ ज्यादा होगी। मुखीयाजी को देखते ही बोले "क्या हुआ मुखीयाजी और ई  गंगुआ के कन्या को आज कौन मारा हो!!! बड़ा घोर कलयुग आ गया है। लोग औरत पर भी बाते बात में हाथ उठाने लगा है"
मुखीयाजी कुर्सी पर बैठते ही बोले "सही बोल रहे हैं मुरली बाबू लेकिन लोग को पता नही है कि अभी मुखिया कौन है। हम ऐसन दुष्ट लोग को ऐसा सबक सिखायेंगे कि जिंदगी भर याद रखेगा।"
मुरली बाबू पान का पीक फेंकते हुए बोले "बिल्कुल मुखीयाजी!!! नही तो पंचायत बरबाद हो जायेगा। खैर मेरे पास कैसे आना हुआ।"
मुखीयाजी दर्द भरे सुर में बोले "गँगुआ का मुसीबत तो आप जान ही रहे हैं। अभी थाना जाना होगा। मल्लूहजी को साथ में इसलिए ले लिये हैं। बस आप दस हजार रुपया गँगुआ को चला दीजिये। बेचारा मुसीबत में है, इज्जत का सवाल है। इज्जत बच जायेगा तो रह सह के पैसा तो चुका ही देगा।"
मुरली बाबू पहले तो खूब ना-नुकुर किये लेकिन मल्लूह काका का इशारा मिलते ही बोले "पैसा हम मुखीयाजी आपके गारेन्टि  पर देंगे और सूद सैकड़ो में दस (10% महीना) लगेगा।"

गँगुआ जो अब इंतिकाम की आग में जल रहा था, दस प्रतिशत महीना सूद पर भी पैसा लेने को  झट तैयार हो गया। पैसा ले कर तीनों थाना पहुँचे। दरोगा साहब ने मुखीयाजी को राम !! राम !! बोला और बैठने को कुर्सी दी। मल्लूह काका दरोगा को एक कोने में खींच कर ले गये। कुछ देर बाद दोनों वापस लौटे। तबतक गँगुआ डरा-सहमा  बगली झाँक रहा था कि  आते ही दरोगा साहब गरजते हुए बोले कि तुही गंगुआ है जी ????
गंगुआ डरते हुए बोला "जी साहब !!! गौर लगते हैं दरोगा साहब "
दरोगा ने अपने चौकीदार को आवाज़ लगाई कि बांधो साले को और लगाओ सौ डंडा!!! साला के खून में ढेर गर्मी चढ़ गया है। मेरे क्षेत्र में गुंडागर्दी करता है!!! आज हम इसका सब नशा उतार देंगे!!!
मल्लूह काका अपनी हँसी छिपाते हुए बोले "अरे दरोगा साहब ई  नही, इसका भाई  है"
तब जा कर गँगुआ के जान में जान आई ......
अभी गँगुआ को मल्लूह काका भगवान के किसी अवतार से कम नही लग रहे थे।
तभी  मुखीयाजी जो अब तक गमछा में मुँह छिपा कर ना जाने क्या कर रहे थे, गम्भीर होते हुए बोले "ए  दरोगा साहब आप हमारे पंचायत के इज्जतदार आदमी से ऐसे बात नही कर सकते हैं।"

दरोगा ने अपना पैंतरा बदलते हुए बोला "अरे हमको समझने में गलती हो गया। खैर छोड़िये मुखीयाजी। बोलिये कैसे आना हुआ????"
मुखीयाजी ने गँगुआ की दर्द भरी दास्तान बड़े विस्तार में दरोगा को सुनाया !!!!!
दरोगा जी कानूनी धारा को याद करते हुए बोले "मुखिया जी आपके गँगुआ का इज्जत तो हम बचा लेंगे लेकिन इसमें खर्चा बहुत है। केस बहुत मजबूत बनाना होगा, जिससे जज तुरंत इसके भाई को अरेस्ट करने का ऑर्डर दे दे। बस खर्चा का आप इंतिजाम कर दीजियेगा।"
मुखीयाजी थोड़ा सख्त लहजे में बोले ए दरोगा साहब मेरे सामने घूसखोरी का बात नही कीजिये।
दरोगा भी गुस्सा में आकर बोला तब हम वही आकर  इंस्पेक्शन करके केस बनायेंगे। ई गंगुआ का नशा तो हम उतार के रहेंगे मतलब गँगुआ के भाई का।
मल्लूह काका ने आगे आकर मामला सम्भाला "क्या आपलोग भी बच्चा की तरह बहस करने लग गये हैं, यहाँ गँगुआ के इज्जत की पड़ी है और आपलोग घूसखोरी के नाम पर लड़ रहे हैं। ए बेटा गँगुआ दो दरोगा साहब को दस हजार"
गंगुआ जो दरोगा के मुँह से अपना नाम सुन कर ही काँप जाता था। उसे उस समय मल्लूह काका साक्षात भगवान लग रहे थे। बस उनके आदेश का इंतिजार था और गंगुआ ने दस हजार दरोगा के कदमों में रख दिया।

  पर ये क्या दरोगा साहब दस हजार देख कर तमतमाते हुए बोले "रे गँगुआ रे !!!! तुमसे भीख माँग रहे हैं जी , उठा पैसा यहाँ से , और चल निकाल यहाँ से"
गंगुआ को मानो 'काटो तो  खून नही' की स्थिति थी। लेकिन अबकी मल्लूह काका तमतमा गये बोले ए  दरोगा साहब गरीब आदमी है जो लाया है रख लीजिये और जो बच गया वो बाद में पहुँचा देगा। एक बात और गंगुआ मेरा बेटा दाखिल है,इसका इज्जत बचा लीजिए!!!!"
काफी मान मनौव्व्ल के बाद दरोगा जी ने दस हजार रुपया पॉकेट के हवाले किया लेकिन गंगुआ को चेतावनी भी दे दी कि केश का इंस्पेक्शन होने से पहले कम से कम दस हजार और पहुँचा दो....। नही तो केस उल्टा भी लिखा  सकता है।

वहाँ से तीनों साथ-साथ वापस लौट आये। गँगुआ को शेष दस हजार की चिंता सता रही थी। घर आ कर देखा तो बीबी अब दर्द से कराह रही है। बकरी अब भी में...में... कर  रही थी। तभी गंगुआ के दिमाग में एक आइडिया आया और उसने झट से कसाई बुला कर बकरी को सात हजार में बेच डाला। कसाई जब बकरी को ले जाने लगा तो गंगुआ की पत्नी फ़िर दहाड़ मार कर रोने लगी!!!! उधर दूसरी और गंगुआ का भाई भी मुँह छिपा कर रो रहा था कि आज छोट मोट बात के लिये भाई गाभीन बकरी बेच दिये।
       लेकिन गँगुआ इस सबसे बेखबर झट से उस पैसा को दरोगा को दे आया। शाम को मल्लूह काका के यहाँ पंचेति हुआ। दरोगा साहब भी वहाँ मौजूद थे। गंगुआ की पत्नी से जब दरोगा ने मार-पीट के बारे में पूछा तो बोले बकरी बाँधने में गिर गयी थी। इसी गुस्सा से मालिक बकरी भी बेच दिये। गंगुआ कि पत्नी के इस झूठ से गंगुआ का इज्जत बच गया था। सभी लोग अपने अपने घर चले गये थे। सिर्फ दरोगा और मुखीयाजी ना जाने किस खुशी में पार्टी कर रहे थे। एक बात जो मुखीयाजी बार बार बोल रहे थे कि "मल्लूह जी सही में बहुत स्मार्ट हैं"

उधर इस सम्पूर्ण कहानी की जड़ वो बकरी कसाई खाने में बँधी अपने मौत का इंतिजार करते हुए में......में......में......में.... कर रही थी 😅😅😅😅

    - बिपिन कुमार चौधरी

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