सुबह का समय था। मंग्लु काका गाय का गोबर उठा कर नाद में दाना-पानी डालने जा रहे थे। तभी उधर से गंगुआ गुजर रहा था, मंग्लु काका को देखते ही बोला "राम ! राम ! काका"
काका भी मंग्लु के सुर में सुर मिलाते बोले "राम! राम ! गंगुआ। इतना सुबह मुँह फुलाये कहाँ चल दिया रे गंगुआ।"
गँगुआ झल्लाते हुए बोला "ए काका, ई बेगारी क्या होता है हो"
काका हँसते हुए "अब क्या हुआ जी! और ई सुबह-सुबह बेगारी के बारे में जानने को तुमको क्यों सूझा???"
का बोले काका "आज सुबह-सुबह बाबूजी इहे बात पर गरिया दिये हैं!!! बोले ज्यादा मुखीयाजी का बेगारी मत किया करो। नेता लोग सिर्फ लोगन के खून चूसना जानता है। ऐसे तुम्हारा जिंदगी नही कटने वाला है। घर में बहु रोते पीटते रहती है कि बाबूजी हमनी के भँसा दिये। अरे हमलोगों का छोड़ो अपन बेटा के बारे में ही सोचो। महँगाई का ज़माना है। उसको कैसे पढाओगे, लीखाओगे। आज बढिया से नही पढ़ाए तो कल तुम्हारे तरह ऊ भी केकरो चमचागीरी करेगा।"
हमको तो काका बहुत गुस्सा आ रहा था। अब आप ही बताईये मुखीयाजी हमको ठेकेदारी दिये हैं कि नही। बाबू जी को बोले त बोलने लगे "भक बुरबक !!! एक साल में एगो ठेकेदारी दे ही दिये तो उससे तुम्हारा पेट थोड़े भर जायेगा। अप्पन खेती-बारी पर ध्यान दो बेटा। कुछ धंधा भी अपना शुरू करो। दो गो पैसा हाथ में रहेगा, तभी ना अप्पन बाल बच्चा को पढाओगे, अपना भी दुख-सुख में सही ढंग से जीवन निर्वाह करोगे। आ एक बात हम बोल देते हैं - ई घर में रहना है तो नेता लोग का बेगारी करना बंद करो। हमसे रोज़-रोज़ बहु का रोना धोना नही देखा जाता है।"
काका सुबह सुबह मूड खराब हो गया, लेकिन हमको ई बात अब तक समझ में.नही आया कि साला ई बेगारी क्या होता है ?????
काका मुस्कुराते हुए बोले "बेटा बाबूजी बात तो ठीक ही बोले हैं। जब किसी को अपने काम का वाजिब मेहनताना नही मिलता है तो उसको बेगारी बोलते हैं। तुम जितना पैसा ठेकेदारी से कमाते हो उससे क्या तुम्हारे बीबी बच्चे का भरण पोषण होगा???
"नही काका" गंगुआ बोला।
"यही बेगारी है बेटा"
तभी गंगुआ का पक्का मित्र लठैत सिंह पहुँच गया "काका को राम! राम! बोल कर बिगड़ते हुए बोला कि काका के हम्मर पार्टनर से बेगारी करवायेगा!!! टाँग तोड़ के हाथ में थमा देंगे॥"
काका समझाते हुए बोले "यही आजकल के लईकन में सबसे बड़ा कमी है। बात समझे नही, आ कपार फोड़ने के लिये तैयार। अरे यार अब पहले वाला ज़माना नही है। राजतंत्र में राजा और जमींदार लोग, मुगलकाल में नवाबलोग, अँगरेज़ के समय अँगरेज़ अफसर लोग गरीब लोग से बड़ा बेगारी करवाता था। बेटा दिन रात बैल के तरह काम करवा कर भी एतना भी मजदूरी लोग के नही देता था कि गरीब लोग अप्पन बीबी बच्चा और अपना पेट ढंग से पाल सके। बहुत जोर-जुल्म का ज़माना था बेटा। अब लोकतंत्र है अब कोई किसी से जबरदस्ती बेगारी नही करा सकता है। सब तरह के काम के लिये वाजिब मेहनताना और सेवाशर्त निर्धारित है। यहाँ तक कि एक मजदूर के लिये भी न्यूनतम मज़दूरी निर्धारित है। अगर कार्यस्थल पर या सेवाकाल में किसी के साथ दुर्घटना हो जाता है तो सरकार मुआवजा देती है। एक आदमी को अनुकम्पा पर नौकरी भी देती है।"
लठेत सिंह अचानक बोल उठा ए काका जब सबका सेवाशर्त और मेहनताना सरकार पहले निर्धारित कर दिया है तो ई मास्टर लोग, होम गार्ड का जवान, आँगनबारी सेविका लोग पटना के सड़क पर एतना हंगामा काहे किये हुए है?????
"यही तो षडयंत्र है बेटा" काका बोले।
आजकल नेतालोग बेगारी का नया नया तरीका खोज लिया है। एगो तरीका है "नियोजन"। अरे मरदे सरकारी विभाग में नियोजन क्या होता है जी। सरकार दो-चार साल में स्कूल बंद कर देगी क्या??? जो मास्टर को नियोजित कर दिया है। ऐहे बात आँगनबारी और होम गार्ड पर भी लागू होता है। नियोजन का साफ मतलब है कि काम तो तुमसे खूब करवायेंगे लेकिन पैसा देंगे मजदूर के बराबर जबकि सुप्रीम कोर्ट भी कह दिया है कि सभी सरकारी कर्मचारी को समान काम का समान वेतन मिलना ही चाहिये। लेकिन नेताजी लोग के अप्पन तर्क है। कुल मिला के एतने समझो बेटा कि नियोजन मतलब बेगारी। आजकल सरकार का होशियारी देखो डाक्टर और इन्गीनीयर भी नियोजित। काहे भाई आज कई गो नेता बिना कमीशन के ठेकेदारी किसी को देता है। जीत्तन मांझी मुख्यमंत्री होकर खुद भी बोले थे कि सब विधायक सांसद कमीशन खाता है। हमको भी कमीशन मिलता है। लेकिन पब्लिक का सेवा करने वाला जमीनी स्तर के सरकारी कर्मचारी से करवायेंगे बेगारी।
अब तुम ही लोग बताओ कि नियोजन का नाटक ग्यारह माह तक ठीक लगता है। सालों साल आप किसी पढ़े लिखें आदमी से काम करवाओ और उसे समान काम का समान वेतन नही दो। ई तो बिल्कुल अन्याय है!!!!!
गंगुआ कुछ देर सोच कर बोला "काका ई लोग कोई कम्पीटीशन से थोड़े आया है।"
काका फ़िर मुस्कुराये "बेटा यही राज़ है। ये बताओ सरकार और नेता को कम्पीटीशन लेने के लिये मना कौन किया था। अगर ई लोग काम के लायक नही है तो अभी तक इसको काम पर रख कर पब्लिक को मूर्ख ही बना रहे हैं। अरे नेता लोगन अब भी शर्म करो और नालायक लोग को सरकारी विभाग से बाहर करो क्योंकि ई नालायक लोग समाज और देश को बर्बाद कर देगा। पर नियोजन के नाम पर लोगों से बेगारी करा कर लोकतंत्र का मजाक मत उड़ाओ।
लठैत सिंह गरजते हुए बोला "बिल्कुल सही काका"
काका फ़िर समझाते हुए बोले कि देख गँगुआ मान लो तुम्हारा बेटा खूब पढ़-लिख लिया। सरकार कम्पीटीशन लेबे नही करेगा तो तुम्हारा बेटा क्या करेगा।
गंगुआ गुस्सा करते हुए "ई तो नाजायज है ना काका।सरकार का काम है कि कॉम्पिटिशन ले के तेज छात्र लोगन को बढिया पोस्ट और वेतन दे।"
काका वही बात है लेकिन कॉम्पिटिशन का क्या हाल है बिहार में "बिहार SSC में देखबे किया। गरीब आदमी के बाल-बच्चा आखिर करेगा क्या ???? सरकार ज्यादा से ज्यादा करेगी क्या "नियोजन"
लठेत सिंह समझ गये, समझ गये, बिल्कुल समझ गये :- "सरकार को चाहिये, फोकटिया कर्मचारी"
- बिपिन कुमार चौधरी
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महान हो सर जी भाषा गाँव की है ।
जवाब देंहटाएंऔर चोट महलों पर ।
आपके कलम में बरा दम ।है ।
thanks bhai
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