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जून, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

रहस्योद्घाटन

             रहस्योद्घाटन ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी हम उन मासूमों को बचा नहीं सके,  डाक्टर बाबू उनके लिये दवाई ला नहीं सके,  माँ की ममता आँखो से सैलाब बन कर निकल गया,  दिखावटी मातम मनाने का अवसर हम गंवा नहीं सके .... अपने कष्टों को तोतली जुबां में वो  बता नहीं सके,  सियासत के मसीहा अपना हुनर दिखा नहीं सके,  लाशों के ढ़ेर को देख भी मूकदर्शक यह मुल्क हैं,  अपनी आक्रोश को भी हम जता नहीं सके... कुछ सीढ़ियों के अभाव में जिंदा जल गये,  कुछ दुस्कर्मीयों के हैवानियत के हत्थे चढ़ गये,  हिंदु-मुस्लिम गाय-गोबर से अभी हमें फुरसत नहीं,  कुछ दो सो बच्चे दवाइयों के अभाव में पंचतत्व में मिल गये वक्त का क़हर न्यौता देकर नहीं आता है,  सिस्टम के हाथों सिसक कर आमजनों के सांसो का डोर टूट जाता है,  जाँच कमिटी का गठन कर सियासत मलाई खाता है,  चुनाव आने पर रहस्यों का राज हमें बताता है... मंदिर मस्जि़द गुरूद्वारे से उन्हें फुरसत नहीं है,  हमारे वोटों की भी उन्हें अभी जरूरत नहीं है,  ...

१९. नारी अस्मिता की विजयी @

नारी अस्मिता की विजयी ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी अय्याशो की महफ़िल में मर्दानगी की बाज़ी लगी थी, अबला के चीख़ से पत्थरों की चारदीवारी भी सहमी थी, दानवी ठहाकों के बीच लाचार क्रंदन था, रावण दहन वाली सभ्यता में नारी अस्मिता का अभिनंदन था... आँखो की अश्रुधारा को कृष्ण का इंतिजार था, सभ्यताओं के संस्कृति में सुदर्शन चक्र लाचार था, हवस के हब्शियों को अपनी शक्ति पर विश्वास था, नारी शक्ति को भी अपनी दुर्बलता का एहसास था... अचानक हीं अबला को देवी शक्ति की अनुभूति हुई, शक्ति प्रदर्शन को लालायित हब्शियों की ख़ूब दुर्गति हुई... एक झटके में नग्न वदन को पंजे से छुड़ाया था, मौत भी काँप जाये क़हर उसने ऐसा मचाया था... कोमल हथेलियों ने जब कटार को थाम लिया, मर्दानगी ठोंकने वाले कईयों का जान लिया, अंतिम शख़्स नारी शक्ति के इस  अद्भुत पराक्रम से अनजान था, क़रीब आने पर पता चला यह उसकी ख़ास सखी का भाईजान था ... ऐसे भाइयों के शव पर उसकी बहन ने भी थूका था, हब्शियों के दुःसाहस पर नारी अस्मिता के विजयी का सुनहरा मौका था ...

२०. मोबाइल जिंदगी @

मोबाइल जिंदगी ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी कबाड़ी में पड़ा मोबाइल, इंसानी फ़ितरत का हुअा शिकार, कभी जिंदगी में सबसे ख़ास था, अहंकार टूटा जब हुअा बेकार  ... चिपक कर जिसने संग घंटो बिताया, दोस्तों संग अपनी प्रेमिका को पटाया, जिसकी बदौलत सोशल मीडिया में सुर्खियां पाया, अचानक हीं उसे कबाड़ी को थमाया ... धरती पर यह जो मानव है, स्वार्थवश पल में बनता दानव है, मानवीय स्नेह कृपा का जिसे होता अहंकार, कष्टदायक होती यह जिंदगी नरक बनता संसार... कबाड़ी वाला भी बिल्कुल हतप्रभ था, अपनी दुर्गति का मोबाइल को भी कहाँ ख़बर था, नशा जब तलक उसका टूटा था, सिम और चिप से उसका साथ छूटा था ... सिम खुशनुमा हालात है, चिप संजोने लायक यादाश्त है, मानव की इतनी हीं अहमियत है, फ़िर सबकुछ सुपुर्दे ख़ाक है... सूर्य चन्द्रमा इस सृष्टि में गवाह हैं, मानवीय स्वार्थ कृत अनंत गुनाह हैं, गुनहगारों की भी पूजा होती है, यह सिर्फ वक्त और हालात की बात है ...