रहस्योद्घाटन ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी हम उन मासूमों को बचा नहीं सके, डाक्टर बाबू उनके लिये दवाई ला नहीं सके, माँ की ममता आँखो से सैलाब बन कर निकल गया, दिखावटी मातम मनाने का अवसर हम गंवा नहीं सके .... अपने कष्टों को तोतली जुबां में वो बता नहीं सके, सियासत के मसीहा अपना हुनर दिखा नहीं सके, लाशों के ढ़ेर को देख भी मूकदर्शक यह मुल्क हैं, अपनी आक्रोश को भी हम जता नहीं सके... कुछ सीढ़ियों के अभाव में जिंदा जल गये, कुछ दुस्कर्मीयों के हैवानियत के हत्थे चढ़ गये, हिंदु-मुस्लिम गाय-गोबर से अभी हमें फुरसत नहीं, कुछ दो सो बच्चे दवाइयों के अभाव में पंचतत्व में मिल गये वक्त का क़हर न्यौता देकर नहीं आता है, सिस्टम के हाथों सिसक कर आमजनों के सांसो का डोर टूट जाता है, जाँच कमिटी का गठन कर सियासत मलाई खाता है, चुनाव आने पर रहस्यों का राज हमें बताता है... मंदिर मस्जि़द गुरूद्वारे से उन्हें फुरसत नहीं है, हमारे वोटों की भी उन्हें अभी जरूरत नहीं है, ...
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