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जीवन धारा २७ कविता

मेरी इन कविताओं को पढ़ कर बताएं क्या इसमें कोई ऐसे कविता भी है, जिसके प्रकाशित होने पर विवाद हो सकता है। *मैं एकल काव्य संग्रह प्रकाशित करवाना चाहता हूं...*


जीवनधारा (कविता संग्रह)

संक्षिप्त परिचय

बिपिन कुमार चौधरी

माता :   श्रीमती इंदु देवी
पिता :   जय प्रकाश चौधरी
पत्नी  :  ममता कुमारी (शिक्षिका)
जन्मदिवस    :  10 दिसंबर 1984
जन्म स्थान :  बिहार (कटिहार) 
शिक्षा :  स्नातकोत्तर (हिन्दी) 
नालंदा ओपेन युनिवर्सिटी पटना (बिहार)

सम्प्रति   : मध्य विद्यालय रौनिया, कटिहार (बिहार) में  शिक्षण कार्य एवं साहित्य सृजन ब्लॉग और Bipin writer के नाम से यूट्यूब चैनल का संचालन

वर्तमान निवास  :  बिपिन कुमार चौधरी, ग्राम - बलुआ, पोस्ट - सिक्कट, वाया - सेमापुर, प्रखंड - बरारी, जिला - कटिहार, बिहार
पिन कोड - 854115
मोबाइल नम्बर - 7717702376
eMail - bipinkrchoudhary1@gmail.com

✍🏻 दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, राष्ट्रीय सहारा में करियर, युवा एवं आर्ट एंड कल्चर से संबंधी फीचर लेखन, 
✍🏻 मुंबई से प्रकाशित साहित्यनामा पत्रिका और दिल्ली से प्रकाशित निभा पत्रिका में कई कविताएं प्रकाशित
✍🏻पटना से प्रकाशित दैनिक जागरण के "बात बे बात" कॉलम में बीस से ज्यादा व्यंग्य प्रकाशित
✍🏻 सभी प्रमुख पत्र- पत्रिकाओं में पांच सौ से ज्यादा संपादक के नाम पत्र प्रकाशित 
✍🏻 रवीना प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित "बरारी विधानसभा के शख्सियत" नामक पुस्तक में बरारी के नामचीन हस्तियों का जीवनी लेखन

साझा संग्रह : काव्य स्पर्श, काव्यांजलि, चलते चलते, ए ब्यूटीफुल मिस्टेक, लॉक डाउन, प्यार का जन्म, द लव दैट हर्ट्स, ए डे इन योर ड्रीम वर्ल्डस, तेरे जैसा यार कहां, ए पिंच ऑफ स्टार्स, आदि

सम्मान :  काव्य श्री साहित्य सम्मान, हिन्दी साहित्य रत्न सम्मान, भारती साहित्य सागर सम्मान, रेणु समृद्धि सम्मान, साहित्य शिल्पी सम्मान व अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक, सामाजिक व सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा साहित्य के क्षेत्र में सम्मान प्राप्त।

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कवि की कलम से

कलम की धार थोड़ी कुंद पड़ गयी है,
वर्ना लोग कभी इसके दीवाने थे,
बहुत दिनों बाद फुरसत मिली है, 
अपने पहले प्यार से ईश्क फरमाने के,

अब तो इस प्यार मे कुछ ज्यादा सुकून  मिलता है,
पहले ये प्यार दाल रोटी की मजबूरी थी,
अब जिंदगी से गुफ्तगू करने की,
अपनी जज्बातों को जुबां पर लाने की...

ए वक्त तेरी रफ्तार बहुत तेज है 
पर रुकना मुझे भी आता नही है 
ठोकरें तो मैंने भी बहुत खाई है 
पर झुकना मुझे भी आता नही है

अबकी जख्म कुछ ज्यादा  गहरा है 
पर तू भर देगा उसे भी 
क्योंकि तुझे पता है 
कि तेरा यह मुसाफिर कभी ठहरा नही है...

लोग हर मंज़िल को मुश्किल समझते है,
हम हर मुश्किल को मंज़िल समझते है.
बड़ा फ़र्क है लोग और हमारे नज़रिए में,
लोग दिल को दर्द और हम दर्द को दिल समझते है.. !!!

आपने तो गुलाब देखा होगा ,
होते हैं वहाँ काँटे भी ,
खुशबू की चाहत रखने वाले ,
कांटों से कभी डरते नही . . .

- बिपिन  कुमार  चौधरी
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१.शब्द

शब्द होते हैं अनमोल,

जुबां पर लाएं तौल तौल,

भावनाएं रखें नियंत्रित,

बने नहीं फूटा ढ़ोल,


दिल को अगर छू जाए,

बन्द दरवाजे देता है खोल,

अगर चोट लग जाए,

बदल जाता है इतिहास, भूगोल,


दुष्टों की यह प्रवृति,

करते हैं बातें गोल मटोल,

लाख करें हम कोशिश,

भावनाओं का खोल देता है पोल,


क्रोध होता है विनाशकारी,

जिसका कारण कोई बोल,

इंसानों का कोई दोष नहीं,

देवता होते प्रसन्न सुन मंत्रो का बोल,


निरर्थक सभी मेवा, मिष्ठान,

धन, वैभव भी नहीं आता काम,

दिल में चुभ जाए अगर कोई बोल,

इसलिए जुबां पर लाएं इसे तौल तौल...

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२. पाखंड


लेकर नाम धर्म का,

छिपाते काज कुकर्म का,

कैसा यह ज्ञान बांटते हैं,

धर्म का विरोधी, लोग धर्म को मानते हैं,


परमात्मा की तलाश में,

ज्ञान प्राप्ति की उल्लास में,

जिन्हें हम भगवान का डाकिया मानते हैं,

मिथ्याडंबरों से धर्म को कुरूप बनाते हैं।


हमारी श्रद्धा का कर नृशंस हत्या,

नफ़रत फैलाना जिनकी तपस्या,

भीड़ को उन्मादी उपदेशों से बरगलाते हैं,

धर्मगुरुओं का ऐसा भीड़ आम जन को रुलाते हैं,


धर्म की आड़ में, 

निज स्वार्थ के जुगाड़ में,

राष्ट्रहित से भी विरोध करना सिखलाते हैं,

ऐसे पाखंडी देशभक्तों के क्रोधाग्नि को जलाते हैं


लाख टके का एक सवाल, 

धर्म के नाम पर क्यों है बबाल,

सृष्टि को चाहे जिसने भी बनाया है,

हमने अपनी रचना में कौन सा भेद पाया है...

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३. नकारात्मकता


नकारात्मकता तेरा अद्भुत अनुसंधान,

थाली में सजा हो कई स्वादिष्ट पकवान,

पनीर में नमक कम होने का होता गुणगान,

शत शत नमन, तेरी दुष्टता को प्रणाम...


शख्सियत हो चाहे कितना महान,

संघर्ष पथ में जीवन हुआ हो कुर्बान,

जीवन कर दिया भले उन्होंने समर्पित,

त्रुटियां ढूंढने में महारत जज्बे को सलाम,


सृजशीलता का तूं विध्वंसक परिणाम,

सौहाद्र बिगड़ता होता कोई बदनाम,

नफ़रत की ज्वालाग्नि में तड़पता इंसान,

अतृप्त मानसिकता तेरे ज्ञान को प्रणाम,


बोया बबूल याद रख फलेगा नहीं आम,

इसी नफ़रत में होगा तेरा भी काम तमाम,

ईर्ष्या द्वेष के बीज का होगा विभत्स परिणाम,

इसका ज्वलनशील ताप होगा तेरा इनाम,

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४. इबादत 


✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी


ए रब, कर तूं कुछ ऐसी इनायत, 

ख़त्म हो जाए कलह कष्ट का कहर,

मानव जाति की सुरक्षा हो मुमकिन,

आओ सब मिलकर बोलें आमीन...


सुन मेरे परवरदिगार, ओ मेरे भगवान,

कर रहे सब त्राहिमाम, संकट में इंसान,

कर कुछ ऐसा करिश्मा, रुक जाए कोहराम,

आओ सब मिलकर बोलें, जय श्री राम...


गलतियां हमसे लाख हुई, हम तेरे ही संतान,

तेरी रहमत की आरज़ू में तड़प रहे कई भाईजान,

कर तूं कुछ ऐसी मेहरबानियां, हो सबको फख्र,

आओ सब मिलकर बोलें, अल्लाह हो अकबर...


तेरे हैरतअंगेज कारनामे, करता सारा जग नमन,

स्वीकार कर हमारी प्रार्थना, कर दे ईर्ष्या द्वेष का पतन,

लंगर में सब साथ बैठ, तेरे दरबार में माथा सकें टेक,

आओ सब मिलकर बोलें, वाहेगुरु दा खालसा वाहेगुरु दी फतेह ...

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५. भेद (कोरोना संकट)


अपनी जान बचाने की खातिर,

आज इंसान कुछ दिनों के लिए कैद है,

असली दर्द हम बेजुबानों से पूछो,

बिना गुनाह आजीवन कैद हैं,


इस कैद से निकल, जीवन नहीं बचा पाओगे,

तेरे कैदी होने का यह मूल भेद है,

तुम्हारे शौक की खातिर आजीवन आंसू बहाता हूं,

क्या तुमलोगों को कोई खेद है...


तुम्हारी तरक्की से हमें शिकवा नहीं,

फिर आपस में क्यों इतना मतभेद है,

अपनी जाति के जीव भी तुम्हारे दुश्मन हैं,

किस काम का बाइबिल, कुरान और तुम्हारा वेद है...

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६. कोरोना तेरा यह खूबसूरत पैग़ाम...


काम तो है यूं ही बदनाम,

बहुत मुश्किल दिन रात आराम,

जिंदगी को खूबसूरत बनाता काम,

कोरोना तेरा यह खूबसूरत पैग़ाम...


सारी दुनिया है परेशान,

हिन्दू हो या हो मुसलमान,

सारा धर्म तेरे लिए एक समान, 

कोरोना तेरा यह खूबसूरत पैग़ाम,


गिरफ्त में तेरे आए जो इंसान,

दूर से करता उसे हर कोई सलाम,

सोचे मूर्ख किसके लिए बेचा ईमान,

कोरोना तेरा यह खूबसूरत पैग़ाम,


आता नहीं है बैंक बैलेंस भी काम,

व्यर्थ हुआ गलत सही काम तमाम,

कठोर सच्चाई से रू ब रू होता इंसान,

कोरोना तेरा यह खूबसूरत पैग़ाम,


पड़ोसी भूखा लोग बेफिक्र खाए पकवान,

इस सोच को भी तूने बदल दिया हैवान,

कोई पड़ोसी नहीं हो संक्रमित, सब परेशान,

कोरोना तेरा यह खूबसूरत पैग़ाम,


मानव का हत्यारा बेशक तू बदनाम,

इंसानियत खुद भूल कर, आदमी बोले दोषी भगवान,

निज स्वार्थ में अंधा कितना गिर चुका इंसान,

कोरोना तेरा यह खूबसूरत पैग़ाम,


खोजे सब इस समस्या का समाधान,

सबको आया समझ क्यों संकट में है जान,

प्रकृति से खिलवाड़ और गलत विज्ञान,

कोरोना तेरा यह खूबसूरत पैग़ाम...

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७. इंसानियत का सबक

फ़ुरसत नहीं, कितना व्यस्त थे हम,

कोरोना ने ढाया ऐसा सितम,

सबके सब बेरोजगार हो गए,

दर्द पूछो उनसे जो बीमार हो गए...


दिहाड़ी से जिनका चलता था चूल्हा,

लॉक डाउन से कितना लाचार हो गए,

सरकारी मदद एक मात्र ठिकाना,

बदनसीबी पूछो उनसे, खैरात से जो महरूम हो गए...


कोरोना से लड़ाई में सफलता का राज,

रहे नहीं कोई घर दाने को मोहताज,

बच्चों के आंखो का आंसू, पेट की आग,

गरीबों का विद्रोह कराएगा उनसे विश्वासघात...


मजबूरियों से अगर कोई लाचार हो गया,

बंदा पड़ोस का कोई बीमार हो गया,

ख़तरा सभी पर बड़ा मंडराएगा,

लाखों का दौलत कोई काम नहीं आएगा,


बढ़ाओ होंसला, करो जरूरतमंद की मदद,

ख़तरे में मानव जाति, बचाएगा इंसानियत,

कोरोना हारेगा, ख़तम होगा यह मुसीबत,

शर्त बस इतना, हमारा और पड़ोसी का हो हिफाज़त...

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८. कोरोना तूने पागल सबको बनाया है...


काम धंधा सब हुआ सरपट चौपट, 

सड़क पर निकलते पुलिस मारे लट्ठ,

यह दुर्दिन ऐसा कैसा आया है,

कोरोना तूने सबको पागल बनाया है,


गरीब हो या हो आदमी खास,

मजदूर हो या कोई सरताज,

तेरे खोफ़ ने सबको डराया है,

कोरोना तूने पागल सबको बनाया है,


कीमती था जिनका एक एक पल,

काम नहीं आया पद और धनबल,

आदमी को ओकाद खूब बताया है,

कोरोना तूने पागल सबको बनाया है,


एक शिकायत तुझसे है शैतान,

गरीब आदमी कुछ ज्यादा परेशान,

यह फर्क तूने भी दिखाया है,

कोरोना तूने पागल सबको बनाया है,


तुमसे उन्हें खौफ नहीं, जिनके घर नहीं रोटी,

मौत से खेलना उनके लिए बात छोटी मोटी,

ऐसे लोगों को ही खूब सताया है,

कोरोना तूने पागल सबको बनाया है,


मानवता करे मानव से पुकार,

करो सबकी मदद बचा लो संसार,

यह संदेश सारे जहां में फैलाया है,

कोरोना तूने पागल सबको बनाया है...

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९. एहसास


बेजुबानों को करके पिंजरे में बन्द,

शौक हमने अपना खूब पूरा किया है,

घरों में कैद होकर फिर क्यों बैचैन हैं,

सोचो बेजुबानों को कितना दर्द दिया है...


दीवारों से टकड़ा टकड़ा कर,

अक्सर परिंदों के पंख टूट जाते हैं,

अपनी बेबसी पर वो छटपटाते हैं,

तब हम मानव खूब खिलखिलाते हैं...


भावनाओं के पैरों में घुंघरू बांध कर,

दूसरों को नचाने में मजा बहुत आता है,

अपनी भावनाओं से जब खिलवाड़ होता है,

घुंघरुओं की आवाज में भी आनंद नहीं आता है...


अपनी जान पर जब आफत आई है,

आज कोई पंख हमारे काम नहीं आई है,

तिलमिला कर खुद पर खीझ जाते हैं,

पिंजरे का दर्द हमें एहसास दिलाते हैं

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१०. प्रकृति का बदला


दहशत के इस माहौल में,

मौत का आतंक छाया है,

मानव तू कितना बुद्धिमान,

प्रकृति ने औकाद बताया है...


चमगादड़ के सूप से भले नहीं,

जैविक हथियार से ही आया है,

अपनी मौज की खातिर तूने,

कितने जीवों का अस्तित्व मिटाया है


अपनी बादशाहत की खातिर,

जिसने धरती पर उत्पात मचाया है,

उस विवेकशील जाति पर ख़तरा देख,

ईश्वर ने भी खूब आंसु बहाया है,


जिंदगी सबकी कैदखाना बन चुकी है,

संक्रमित होते अपनों की भोहें तनी है,

सूक्ष्मजीव कोरोना ने ऐसा कहर बरपाया है,

अपनों ने भी लाशों को गले नहीं लगाया है,


तरक्की का चहुंओर घमासान है,

प्रदूषित वातावरण सब परेशान है,

यह कैसा आफत हमने बुलाया है,

जहां कोई विज्ञान काम नहीं आया है,


अपनी सुविधाओं की खातिर,

सारी सीमाएं हम तोड़ गए हैं,

कई नदियां नाला बन चुका है,

कई जलिय जीव विलुप्त हो गए हैं  ...


प्रकृति से इस बेरहम छेड़छाड़ का,

कीमत मानव जाती को चुकाना होगा,

धरती पर मानव जाती की सुरक्षा हेतु,

मानव को अंदर का हैवान मिटाना होगा...

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११. व्यर्थ_सारा_जखीरा


बमों का जखीरा, विध्वंस का मदिरा,

संकट में सब जन हैं, सबकी यही पीड़ा,

तरक्की हमने बहुत की, फिर कैसा यह अंधेरा,

ऊर्जा किया कहां नष्ट, काम आया नहीं ज़ख़ीरा,


सामने दिख रहा सबको काल है,

सारी दुनियां में क्यों इतना बबाल है,

अदृश्य सा एक कण है, विचलित सबका मन है,

सुपर पावर भी है डरा, व्यर्थ सारा जखीरा,


भयभीत है अंतर्मन, करे करबद्ध सब निवेदन,

संकट में अस्तित्व है, सृष्टि पर खतरा बड़ा,

मानव की लोलुपता, ले रही है कठिन परीक्षा,

संयम सहयोग की तपस्या, निदान होगा समस्या,


आश्चर्यजनक अद्भुत है, मानव कितना दुष्ट है,

विपदा में सब हलकान हैं, लूटने में कुछ पहलवान हैं,

अश्रु उन्हें दिखता नहीं, आत्मा भी कांपता नहीं,

ये लोग सच में महान हैं, मृत्यु से भी सामर्थ्यवान हैं,


नाम उनके कई हैं, लेकिन उन्हीं से आस है,

किया जिसने सृष्टि का सृजन, पापियों का नाश है,

कोतुहल एक बड़ी, बड़ा मुश्किल एक सवाल है,

मौत सामने देख भी लालच की मिटती क्यों नहीं प्यास है,


अंतरात्मा से आती आवाज, नर मत हो निराश,

विध्वंस का भी होगा सर्वनाश, मानव रचेगा इतिहास,

एक नया सवेरा आयेगा, आतंक मिट जाएगा,

दूर हो जाएगा यह पीड़ा, काम न आयेगा तेरा ज़ख़ीरा


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१२. आख़िर क्यों इतना मजबूर इस देश में अन्नदाता है...

हम सभी का पालनहार यह धरती - माता है,
फ़िर अन्नदाता से ही क्यों नाराज़ भाग्य विधाता है,
कभी बाढ़ से पीड़ित कभी सुखाड़ आता है,
कठोर मेहनत कर भी नहीं भरपेट भोजन पाता है...

सपने जिनके मजबूरियों के भेंट चढ़ जाता है,
सरकार उदासीन रब भी कहर ढाता है,
बीमार हालत में दवाई बिन स्वर्ग सिधार जाता है,
संघर्ष पथ में नित्य बिना कसूर यह सजा पाता है...

बच्चे जिनके अन्न को मोहताज हो जाता है,
जिस घर की देवियों की दशा देवताओं को रुलाता है,
उन्हीं के कर्मों से हर कोई थाली में भोजन पाता है,
आख़िर क्यों इतना मजबूर इस देश में अन्नदाता है...

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१३. किसका_इंतिज़ार
         (डॉ. प्रियंका रेड्डी के बहाने)

चौकीदारों के इस देश में,
अवलाओं के अस्मत का पहरेदार कोई नहीं है,
सबसे ज्यादा जिस राष्ट्र में पूजी जाती है,
वहां इन देवियों सा लाचार कोई नहीं है...

सती प्रथा की साक्षी देवियां,
धन, ज्ञान और वैभव पर राज है जिनका,
सृष्टि का सृजन करने वाली नारी,
गिद्ध निगाहों से असुरक्षित तन-बदन इनका...

पुत्र-मोह से बचपन कुंठित,
जवानी मनचलों से व्यथित,
दहेज़ का पहाड़ बनाता भार,
फ़िर भी बांटती सबको प्यार...

प्यार बांटने वालों से ऐसा व्यवहार,
जीवन भर सिसकने को यह लाचार,
जन्म देने वालों के लिए होती पराई,
ससुराल और समाज में सीमित जिनका अधिकार,

समाज के बुद्धिजीवी करें विचार,
नारी शक्ति वहशियों का क्यों है शिकार,
अपराधियों से ज्यादा हम हैं गुनाहगार,
क्या अपनों के आबरू लूटने का हमें है इंतिजार...
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१४. नकाबपोश फहरिस्ते

मैंने बहुत कुछ पाया है,
मैंने बहुत कुछ खोया है,
पाकर कभी संतुष्ट नहीं हुआ,
खो कर कभी हिम्मत नहीं खोया है...

भीड़ में भी अक्सर तन्हा रहा हूं,
अकेले भी भीड़ को पीछे धकेला है,
सोचने वाले तक्कलूफ में रहते हैं,
ईश्वर की इनायत ऐसा अलबेला है...

मैं भले ही कितना भी मजबूर रहा हूं,
कीचड़ उछालने वालों से दूर रहा हूं,
फिर भी इनलोगों में बैचैनी छाई हुई है,
इन धूर्त लोगों की शामत आई हुई है...

अब तक चुप रहा हूं लेकिन,
अब बातें करना जरूरी है,
रंगे सियार की जिंदगी जीने वालों,
मुझ जैसों से दुश्मनी तुम्हारी मजबूरी है..

फहरिस्ते का ताज पहन कर,
कब तक काली करतूत छिपाओगे,
अरे बेनकाब करना शुरू कर दिया,
अंधेरे में आइने को भी चेहरा नहीं दिखाओगे...

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१५. बनावटी चेहरे

बनावटी चेहरा सजाकर,
आइना को झूठा बतलाते हैं,
कुकर्मों की काली बदरी ढककर,
क्या हैं और क्या दिखाते हैं...

कड़कती धूप में तपकर,
कम समझदार पसीना बहाते हैं,
मौसम हो चाहे कितना प्रतिकूल,
फूलों की खूबसूरत बगिया सजाते हैं...

बगिया के खूबसरत फूल,
मिलकर सुंदर माला बनाते हैं,
किसी के चरणों के स्पर्श की इच्छा,
अफसोस बनावटी चेहरे को सजाते हैं...

इत्र का मनमोहक सुगंध,
पसीने को बदबूदार बताते हैं,
निज स्वार्थ में फुलवारी रौंद कर,
बनावटी लोग बनावटी आंसू बहाते हैं...

पसीना बहाने वाले को मूर्ख समझकर,
ये लोग उनका उपहास उड़ाते हैं,
आंसू बहाना इन मूर्खों को नहीं आता,
मजबूर होकर ये लोग खून की नदियां बहाते हैं...
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१६. नाटकीय आख्यान

नाटक की नाटकीयता अभिनय का ज्ञान,
सरस्वती की कृपा बनाता कलाकार महान,
मंदिर की आरती मस्जिद का अजान,
इस भेद में उलझ कर मानवता बनता श्मशान...

अद्भुत आज की मानवता अनमोल ज्ञान,
गालियां देकर लोग चाहते खुद का समाधान,
समस्या हो बड़ी, चाहे हो कितना व्यावधा न,
सहयोग की सकारात्मकता से संभव सबका कल्याण...

समस्या कहां नहीं, कहां नहीं व्यावधान,
हम हैं किनके भरोसे कौन करेगा समाधान,
आप आगे बढ़ो पीछे हम हैं भाई जान,
संघर्ष में सहयोग से विमुखता देते आख्यान...
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१७. कुत्तानियत

कुत्तों की महफिल में सरदार ने फरमाया,
इंसानों को काटना अब हमने छोड़ दिया है,
एक दूसरे को काटने के लिए इंसान ही काफी हैं,
अपनी बिरादरी के सारे रिकार्ड को भी तोड़ दिया है...

हमारी वफादारी के आजकल बहुत चर्चे हैं,
इतना मुकम्मल मुकाम हमने हासिल कर लिया है,
इंसानों पर नहीं किसी का कोई भरोसा है,
इंसानी वफादारी ने शायद आत्महया कर लिया है ...

संगति का असर नहीं खुद पर हमें आने देना है,
हम कुत्तों से ख़तरनाक आजकल ये इंसान हैं,
विकट परिस्थिति में भी नहीं बेचते हम अपना ईमान हैं,
बदलते वक्त में भी हमारी ख़ास पहचान है,

नमक खा कर हम कर्ज अदा करते हैं,
मौत हो सामने फ़िर भी नहीं डरते हैं,
इंसानों के कमिनेपन का असर नहीं होना चाहिए,
हम कुत्तों को कुत्ता बन कर जीना चाहिए ...
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१८. अनोखा आशियाना

तिनके तिनके को जोड़ कर हमने आशियाना बनाया है,
वहां बनाया है जहां पहले किसी ने नहीं बनाया है,
दुनिया की नजरों में मैं बेशक पागल हो सकता हूं,
इन्हीं पागलों की जमात ने मुझे पागल बनाया है...

पंख है आसमान में उड़ सकता हूं,
सुरक्षित आशियाने की जगह ढूंढ सकता हूं,
क्या करूं यह धरा वीरान हो गया है,
बुद्धिमानों का जमात हैवान हो गया है...

ऊंची ऊंची अट्टालिकाओं की हमें चाहत नहीं है,
हम जैसे कितने विलुप्त हो गए लेकिन कोई आहत नहीं है,
इन पागलों का नाश निकट अब आया है,
महत्वाकांक्षा में मानवता ने बस इतना ही पाया है...

प्रकृति की गोद में चहक हम परिंदे खुश हैं,
हमारा किसी से यहां कोई बैर नहीं है,
हमारी दुर्गति देख आप अब भी सचेत नहीं हुए,
यकीन मानो मानवता की ख़ैर नहीं है...
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१९. नारी अस्मिता की विजयी

अय्याशो की महफ़िल में मर्दानगी की बाज़ी लगी थी, 
अबला के चीख़ से पत्थरों की चारदीवारी भी सहमी थी,

दानवी ठहाकों के बीच लाचार क्रंदन था, 
रावण दहन वाली सभ्यता में नारी अस्मिता का अभिनंदन था...

आँखो की अश्रुधारा को कृष्ण का इंतिजार था, 
सभ्यताओं के संस्कृति में सुदर्शन चक्र लाचार था,

हवस के हब्शियों को अपनी शक्ति पर विश्वास था, 
नारी शक्ति को भी अपनी दुर्बलता का एहसास था...

अचानक हीं अबला को देवी शक्ति की अनुभूति हुई, 
शक्ति प्रदर्शन को लालायित हब्शियों की ख़ूब दुर्गति हुई...

एक झटके में नग्न वदन को पंजे से छुड़ाया था, 
मौत भी काँप जाये क़हर उसने ऐसा मचाया था...

कोमल हथेलियों ने जब कटार को थाम लिया, 
मर्दानगी ठोंकने वाले कईयों का जान लिया,

अंतिम शख़्स नारी शक्ति के इस  अद्भुत पराक्रम से अनजान था,
क़रीब आने पर पता चला यह उसकी ख़ास सखी का भाईजान था ...

ऐसे भाइयों के शव पर उसकी बहन ने भी थूका था, 
हब्शियों के दुःसाहस पर नारी अस्मिता के विजयी का सुनहरा मौका था ...
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२०. मोबाइल जिंदगी

कबाड़ी में पड़ा मोबाइल, 
इंसानी फ़ितरत का हुअा शिकार, 
कभी जिंदगी में सबसे ख़ास था,
अहंकार टूटा जब हुअा बेकार  ...

चिपक कर जिसने संग घंटो बिताया, 
दोस्तों संग अपनी प्रेमिका को पटाया, 
जिसकी बदौलत सोशल मीडिया में सुर्खियां पाया, 
अचानक हीं उसे कबाड़ी को थमाया ...

धरती पर यह जो मानव है, 
स्वार्थवश पल में बनता दानव है, 
मानवीय स्नेह कृपा का जिसे होता अहंकार, 
कष्टदायक होती यह जिंदगी नरक बनता संसार...

कबाड़ी वाला भी बिल्कुल हतप्रभ था, 
अपनी दुर्गति का मोबाइल को भी कहाँ ख़बर था,
नशा जब तलक उसका टूटा था,
सिम और चिप से उसका साथ छूटा था ...

सिम खुशनुमा हालात है, 
चिप संजोने लायक यादाश्त है, 
मानव की इतनी हीं अहमियत है, 
फ़िर सबकुछ सुपुर्दे ख़ाक है...

सूर्य चन्द्रमा इस सृष्टि में गवाह हैं, 
मानवीय स्वार्थ कृत अनंत गुनाह हैं,
गुनहगारों की भी पूजा होती है, 
यह सिर्फ वक्त और हालात की बात है ...
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२१. ठगी

ठगी बहुत बढ़िया धंधा है , 
खुद को समस्या से बाहर निकालने का, 
बस थोड़े बड़े-बड़े बोल बोलने होते हैं, 
सच-झूठ के खट्टे-मीठे जहर घोलने होते हैं....

वक्त पर सच सामने आ जाता है, 
सहयोग और मदद करने वाला कठोर सजा पा जाता है, 
बहुत दर्द होता है ठगे जाने पर, 
कसक उस समय और भी बढ़ जाता है, 
ठगने वाला जब  हो अपना कोई...,

वक्त का मरहम हर दवा का ईलाज है....
पश्चाताप की बीमारी लेकिन लाईलाज है ...
यह एहसास ही बहुत पीड़ादायक है...
इस दर्द को झेलना आसान नहीं, 
अक्सर लोग इसे भूल जाते हैं, 
शायद यही इसका समाधान है, 
अन्यथा डिप्रेशन, मानसिक असंतुलन, आत्महत्या कई व्यवधान हैं ....
हर कुछ आपके मनमुताबिक नहीं हो सकता ...
ये कोई जन्नत नहीं, 
ये दुनियाँ जहाँन है ...

फिर भी एक बात है ...
ठगी उतनी बड़ी समस्या नहीं, 
जितना कि इसका एहसास है, 
आप ठगी की समस्या से उबर सकते हो ...
लेकिन अगर कोई हर पल आपको इसका एहसास दिलाये ...
भूली बातों को भी याद दिलाये ...
समस्या ये बहुत बड़ी होती है ...
इसके कारण कई जिंदगी खत्म होती है ......! ! ! !
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२२. आदमी का रंग . . .

कुत्ता चाहे जितना तगड़ा हो 
दुम टेढ़ी होती है 
आदमी जितना दुष्ट हो 
जुबां उतनी मीठी होती है

वैसे मीठा मैं भी बोलता हूँ 
किसी की जिंदगी मे ज़हर नही घौलता हूँ 
पर इन मीठी जुबान वालों का 
दिल चाहे जितना काला हो 
चेहरा बहुत भोला होता है 
जब मतलब निकाल जाते हैं इनके 
हर शब्द शोला होता है

इसका ये मतलब नही 
तीखी बोलने वाले 
बड़े अच्छे होते हैं 
विचार मे जिनकी सादगी हो 
जुबां भी शहद से मीठे होते हैं

धोखा अक्सर लोग वहाँ खा जाते हैं 
जिनकी जुबां शहद सी मीठी हो 
लेकिन दिल अलबेली जलेबी हो 
ये गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं 
हर पल ढंग बदलते हैं,
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२३. 🤓🤓 कुटिल वाणी 🤓🤓

इस जहाँ  में सिर्फ आदमी बोलता है,
अपनी वाणी से कुछ लोग शहद 
तो कुछ लोग ज़हर घोलता है,
अक्सर उनकी  बातें  बड़ी हो जाती है,
उनका शख्सियत भी बड़ा  हो जाता है,
वाणी में जिनकी इंसानियत बोलता है,

कुछ लोगों की बातें 
दिल को छू जाती है,
कुछ लोग अपनी जुबान से 
कई जख्मों पर मरहम लगा जाते हैं,
कुछ की बातें आदमी तो आदमी 
कई कौम को तबाह कर जाते हैं,

बड़ी शिद्दत से 
भगवान ने इंसान को बनाया है,
इसी  जुबान ने कितने को हैवान बनाया  है,
महाभारत का शकुनि,
रामायण की  सुमिंत्रा,
ये कोई गैर नही थे,
जिन्होंने अपना होकर 
अपनों का अस्तित्व मिटाया,

अक्सर हम लफ्जों के जाल में फंस जाते हैं,
शातिर लोग इन्हीं लफ्जों से कई चाल चल जाते हैं,
कई लोग दिल के बिल्कुल बुरे नही होते हैं,
इन्हीं शातिरों  के जाल में कई घर जल जाते हैं,

दुश्मन अगर करे सामने से हमला,
अक्सर उसे अपनी ओकाद समझ आ जाती है,
अपना बन कर जो चलाए,
जुबां से कुटिल बाण,
सुंदर चमन को भी वो मिटा जाती है!

इनकी फितरत, इनका नज़रिया,
खुद पर ना हावी होने दीजिये,
अपने मस्तिष्क के अंतरंग में,
किसी को विषफल के पौधे नही बोने दीजिये,
ऐसे लोगों की जुबां बहुत मीठी होती है,
जिंदगी को बीच मझधार में ले जा कर ये तो डुबोती है....
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२४.   दिल को फ़िर से बच्चा बना दे . . . 

वो दोस्त कहाँ गये 
जो देखते ही मुस्कुरा देते थे 
उन्हे सिर्फ मेरी फिक्र थी 
मेरी बट्वे की नही 
आज रिश्ता उतना ही घन्सिठ होता है 
जितना बटवा भारी हो 
वरना कोई आँख भी नही मिलाता
चाहे सड़क कितनी भी संकरी हो 
निगाहों से गिर कर भी 
लोग उनसे निभा लेते है
आपका बटवा अगर भारी हो 
तो लोग सिर पर उठा लेते हैं 
धोखा खा खा कर बहुत कुछ सीखा है 
लेकिन  कैसे कह दूँ 
अब ठगा नही जाऊँगा 
इसलिए एक चीज मुझे लौटा दे 
मेरे दिल को फ़िर से बच्चा बना दे

वैसे तो जंग मैंने ही छेड़ा है 
क्योंकि इम्तिहान से मुझे डर नही लगता 
ये बात अलग है कि 
तू इम्तिहान सबका लेता भी नही 
पर हो सके तो एक चीज़ मुझे लौटा दे 
मेरे दिल को फ़िर से बच्चा बना दे
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२५. पैसा

पैसा ने दिन दिखाया ऐसा 
कुत्तों को देखा 
उनकी दुम भी देखी 
कभी जो भौंकते थे 
चेहरा देख कर 
उन्हे तलवा चूमते भी देखा 

पैसों के लिये 
मैंने खुद को भले ना गिराया हो 
पर इस पैसे ने मुझे बहुत गिराया है 
अगर ये है तो बहुत कुछ पास है 
अगर ये होता तो बहुत कुछ पास होता
कुत्तों को भी देखता 
भौंकते भी देखता 
तलवा चाटते  भी देखता 
पर राज़ की बात 
शायद नही जान पाता

जिंदगी बहुत प्यार है मुझे तुमसे 
पर तुम बहुत बेवफा हो 
मैंने कई जिंदगी सजाने को सोचा 
कि तुम मुझे प्यार करोगी 
पर तुमने हमेशा मुँह चिढाया 
कि तेरी औकाद है क्या ????

जब जिंदगी से नफरत होने लगी
तभी ये पैसा आया 
थोड़ी इज्जत थोड़ा प्यार लाया 
पर जिंदगी अब मै तुम्हे फ़िर प्यार करने लगा हूँ 
इन पैसों के कारण नही 
वो तो है मेरी   . . . 😜😜😜

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२६. बलिदान

वो लोग कुछ और थे . . .
उनकी बात कुछ और थी . . .
लोग पूछते हैं 
उन्होंने क्या दिया 
आत्मसम्मान के लिये 
अपने देश के लिये 
हम भारतीयों के लिये 
अपनी मिट्टी के लिये 
औरतों की सुरक्षित आबरू के लिये 
बच्चों के स्वर्णिम भविष्य के लिये 
उन्होंने वो दे दिया 
जिसके लिये आज लोग कहते हैं 
कि वो है तो जहाँ है 
नमन उस वीर सपूत को 
जिसने अपनी मातृभूमि के लिये 
अपना सबकुछ समर्पित कर दिया . . .
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२७. खाली सफे

मुझे रहने दो कागज़ पर 
ही लफ्ज़ बनकर
यहाँ खुलती है जुंबा 
होंठ सील जाते है 
कहना नहीं चाहते 
कमबख्त चंद शेर धोखा दे जाते है
और क्यों गला घोटूं नीली स्याही का 
जब खाली सफ़े भी बहुत कुछ कह जाते  है,

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२७. जिंदगी

ए जिंदगी सुना है तेरे  बहुत रंग है
दुनियाँ तेरी बड़ी रंगीन है
आदमी कुछ ज्यादा ही गिर गया है
तू मान या ना मान
मामला बड़ा संगीन है


आरजू बड़ी हो
कोई बात नही
मंजिल मुसाफिर को ना मिले
उतने बुरे हालात नही
लेकिन दिमाग तो सदियों से बुरा रहा है
दिल भी बुरा हो चुका है
अब प्यार कोई दिल से नही
हैसियत से करने लगा है
कल तक लोग अपनो के लिये
अपनी हैसियत मिटा देते थे
आज हैसियत की फिक्र मे
आदमी बेमौत मरने लगा है

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