*व्यंग्य संग्रह : बात बे बात*
*संक्षिप्त परिचय*
*बिपिन कुमार चौधरी*
माता : श्रीमती इंदु देवी
पिता : जय प्रकाश चौधरी
पत्नी : ममता कुमारी (शिक्षिका)
जन्मदिवस : 10 दिसंबर 1984
जन्म स्थान : बिहार (कटिहार)
शिक्षा : स्नातकोत्तर (हिन्दी)
नालंदा ओपेन युनिवर्सिटी पटना (बिहार)
सम्प्रति : मध्य विद्यालय रौनिया, कटिहार (बिहार) में शिक्षण कार्य एवं साहित्य सृजन ब्लॉग और Bipin writer के नाम से यूट्यूब चैनल का संचालन
वर्तमान निवास : बिपिन कुमार चौधरी, ग्राम - बलुआ, पोस्ट - सिक्कट, वाया - सेमापुर, प्रखंड - बरारी, जिला - कटिहार, बिहार
पिन कोड - 854115
मोबाइल नम्बर - 7717702376
eMail - bipinkrchoudhary1@gmail.com
✍🏻 दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, राष्ट्रीय सहारा में करियर, युवा एवं आर्ट एंड कल्चर से संबंधी फीचर लेखन,
✍🏻 मुंबई से प्रकाशित साहित्यनामा पत्रिका और दिल्ली से प्रकाशित निभा पत्रिका में कई कविताएं प्रकाशित
✍🏻पटना से प्रकाशित दैनिक जागरण के "बात बे बात" कॉलम में बीस से ज्यादा व्यंग्य प्रकाशित
✍🏻 सभी प्रमुख पत्र- पत्रिकाओं में पांच सौ से ज्यादा संपादक के नाम पत्र प्रकाशित
✍🏻 रवीना प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित "बरारी विधानसभा के शख्सियत" नामक पुस्तक में बरारी के नामचीन हस्तियों का जीवनी लेखन
साझा संग्रह : काव्य स्पर्श, काव्यांजलि, चलते चलते, ए ब्यूटीफुल मिस्टेक, लॉक डाउन, प्यार का जन्म, द लव दैट हर्ट्स, ए डे इन योर ड्रीम वर्ल्डस, तेरे जैसा यार कहां, ए पिंच ऑफ स्टार्स, आदि
सम्मान : काव्य श्री साहित्य सम्मान, हिन्दी साहित्य रत्न सम्मान, भारती साहित्य सागर सम्मान, रेणु समृद्धि सम्मान, साहित्य शिल्पी सम्मान व अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक, सामाजिक व सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा साहित्य के क्षेत्र में सम्मान प्राप्त।
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१. व्यंग्य // मेरा देश बदल रहा है.....😫😫😫
लठैत का गुस्सा ना जानें क्यों सातवें आसमान पर था!!!
गंगुआ उसे समझाने की कोशिश कर रहा था। देख लठैत ये जो हमारे भारतीय सैनिक हैं ना वो बहुत पराक्रमी और शूरवीर हैं। इनके डर से ही हमारे दुश्मन हम पर कभी सीधा हमला करने का दु:साहस नही करते हैं। कुछ लोग हमारे देश की शांति-व्यवस्था में दखल डालने के लिये घुसपैठ और आतंकवाद का सहारा लेते रहे हैं। कई वार हमारे राष्ट्र को इन आतंकवादियों ने गम्भीर नुकसान भी पहुँचाया है लेकिन हमारे जाबांज सैनिकों ने अपनी जान की परवाह किये बगैर इनलोगों को मुँहतोड़ जवाब दिया है। इन्हीं सैनिकों की बदौलत हमारे देशवासी निफिक्र हो कर शांति से रात को सोते हैं। अरे वो तो हमारा देश एक शांतिप्रिय देश है नही तो ये सैनिक लोग दुश्मनों के घर में घुस कर उन्हें जहन्नुम पहुँचाने का पुरा काबिलियत रखते हैं। हाल ही में भूटान और पाकिस्तान में किया गया सफल सर्जिक्ल स्ट्राइक इसका सबसे बड़ा सबूत है। इसलिए पुरा भारत इन वीर सैनिकों को सलाम करता है।
लठैत गुस्सा से झुंझलाते हुए "क्या मरदे, तुम कौन दुनियाँ में हो!!! यही वीर सैनिक लोग काश्मीर में जब आतंकवादियों को पकड़ने के लिये ऑपरेशन कर रहे होते हैं तो कुछ सिरफिरा छोकरा लोग जेहाद की नौटंकी के नाम पर इनलोगों पर पत्थरबाजी करता है। अभी कुछ दिन पहले की बात है चुनाव करा कर लौट रहे सैनिकों को कुछ पागल-आवारा टाइप का लड़का लोग ना सिर्फ गाली दिया बल्कि थप्पड़ भी मारा और हेलमेट छीनने का प्रयास किया और हमारे देश के नेता जी और बुद्धिजीवी लोग सैनिकों को संयम रखने का उपदेश दे रहे हैं। अपने घर-परिवार से कोसों दूर कठिन परिस्थितियों में अपने मातृभूमि की सुरक्षा के लिये अपना सबकुछ न्योछावर करने के लिये चौबीसों घंटे तैयार रहने वाले वीर जवानों का क्या यही मान-सम्मान है????
गंगुआ ने एक बार फिर समझाया "देख लठैत, ये पत्थर फेंकने वाले लोग इस देश के कम उम्र के कुछ ऐसे नौजवान लड़के हैं जो कुछ दुष्ट लोगों के बहकावे में आकर और कुछ पैसों के लालच में रास्ता भटक गये हैं। इनलोगों को मुख्यधारा में लाने के लिये ये जरूरी है कि सेना संयम से काम ले। फिर शूरवीर भारतीय सैनिक अपना ताकत और बम-बारूद इनलोगों के ऊपर बरबाद करे, ये उचित भी नही है।"
लठैत जोर-जोर से ताली बजाते हुए "क्या बात है गंगुआ, जो लोग हमारी सुरक्षा के लिए सीने पर गोली खाने को तैयार रहते हैं, उनको कुछ नीच और दुष्ट प्रवृति के लोग अपने घिनौने स्वार्थ के लिये अपमानित करते हैं और हमलोग सैनिकों को संयम बरतने और पेलेट-गन का उपयोग नही करने का सलाह देते हैं। आतंकवादियों और देशद्रोही लोगों के लिये इस देश में मानवधिकारों की रक्षा करने वाली एक बहुत बड़ी फौज है लेकिन दिन-रात देश की सुरक्षा करने वाले सैनिकों के मान-सम्मान का किसी को कोई फिक्र नही है। क्या इस देश में सैनिकों का खून और बलिदान इतना सस्ता हो गया है......!!!!
गाँव का सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा व्यक्ति गंगुआ को अब कोई जवाब नही सूझ रहा था। उसने बहस ख़त्म करने के ख्याल से सिर्फ इतना बोला "देख लठैत, तुम तो ठहरा गंवार तुमको ये सब बात समझ में नही आयेगा!!!"
गंगुआ का इस तरह का जवाब पा कर लठैत को थोड़ा गुस्सा आ गया लेकिन उसने खुद को शांत रखा। अचानक कुछ देर बाद उसने गंगुआ की हथेली को अपने हाथ में ले कर मकई का बोरा सीने वाला सूआ उसके हथेली के आर-पार कर डाला। देखते ही देखते गंगुआ का पुरा हाथ खून से लहू-लूहान हो गया। गंगुआ ने झटके से अपना हथेली लठैत के हाथ से छुड़ाया और लठैत को बीस-बाईस फाइट रसीद कर दिया।
समान्यतः गर्म मिजाज का लठैत, आज अपने से बेहद कमजोर कद-काठी वाले गंगुआ से मार खा कर भी ना जाने क्यों ठहाका लगा रहा था और दूसरी ओर गंगुआ दर्द से चिल्लाते हुए अपने गमछा से हथेली को बाँध कर खून रोकने का प्रयास कर रहा था। थोड़ी देर में ही वहाँ काफी भीड़ जमा हो गयी थी लेकिन किसी को दोनों में किसी से कुछ पूछने की हिम्मत नही हो रही थी। हाँ, गंगुआ अब भी ना सिर्फ दर्द से छटपटा रहा था बल्कि लठैत को गंदी-गंदी गाली दे कर उसके कुल-खानदान को बरबाद करने की लगातार धमकी भी दे रहा था।
तभी मुखिया जी ने आते ही लठैत को धमकाया "क्या रे लठैत, तुम अब गाँव में गुंडागर्दी पर उतर गया है!!! ई हम क्या सुन रहे हैं कि तुम दिन-दहारे गंगुआ का मर्डर करना चाह रहा था???"
लठैत ने सबको समझाते हुए बोला "अरे भाई, मरे हुए आदमी को कोई क्या मारेगा!!! ई गाँव का सबसे बड़ा विद्वान गंगुआ हमको संयम का पाठ पढ़ा रहा था। अभी थोड़ा देर पहले ई हमको उपदेश दे रहा था कि अगर पग्लेट टाइप का छोकरा-लोग भारतीय सैनिकों पर पत्थर भी फेंके तो उन्हें संयम से काम लेना चाहिये। आपलोग देखिये मामूली सूआ के हथेली के आर-पार हो जाने पर यही आदमी दर्द से कितना तड़प रहा है और संयम का उपदेश देने वाला ज्ञानी व्यक्ति लठैत सिंह को उसके कुल-खानदान सहित बरबाद करने का धमकी दे रहा है। अरे गंगुआ इस देश के बुद्धिजीवी और ज्ञानी लोगों को सैनिकों की जगह हाफ-माइंड जेहादी लोगों को उपदेश दे कर उसे सही रास्ते पर लाने का प्रयास करना चाहिये....!!!!
आखिर कश्मीर में सेना के दर्द को कोई क्यों नहीं समझ पा रहा है.....
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" हाथों में हथकड़ी जुवां पर ताले हैं
सहमे - सहमे सीमा के रखवाले हैं "
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बनारसी काका ने भी लठैत की बातों का समर्थन करते हुआ कहा कि यह हमारे देश का बहुत बड़ा दुर्भाग्य है कि जो लोग इस देश के मान-सम्मान की हिफाजत के लिये अपना जान देने को तैयार हैं, उन्हें ही कुछ लोग ना सिर्फ अपने गलतबयानी से अपमानित कर रहे हैं, बल्कि पत्थर फेंक कर उन पर सीधे जानलेवा हमला करने वाले लोगों के विरुद्ध भी सैनिकों को संयम रखने का उपदेश दिया जा रहा है। अगर अब भी हमलोग जागरुक नही हुए तो अंग्रेजों ने जाते-जाते भारत के तीन टूकड़े कर डाला और आने वाले समय में इसके और भी कितने टूकड़े हो सकते हैं। इन जेहादी भाइयों के बारे में तो सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि....
"उम्र जन्नत में रह कर,
उसे उजाड़ने में गुज़ार दी,
और जिहाद बस इस बात का था,
कि मरने के बाद जन्नत मिले...!"
तभी लठैत ने बोलना शुरू किया कि कई बार शरीर को ज़माने वाली ठंड में सैनिक लोग भूखे प्यासे ड्यूटी करते हैं। गजब तो तब हो जाता है कि तेज बहादुर यादव नाम का सैनिक सोसल मीडिया के माध्यम से यह शिकायत करता है कि कुछ लालची अफसरों के कारण सीमा पर तैनात सैनिकों को ढंग का खाना भी नसीब नही होता और कुछ ही दिनों के बाद उसे बरखास्त कर दिया जाता है। कोई जरूरी नही कि तेज बहादुर सच बोल रहा हो, ऐसा सम्भव है कि बहादुर जी भी कुछ ज्यादा के लिये भारतीय अफसरों को बदनाम कर रहे हों लेकिन अगर तेज बहादुर की बात में जरा भी सच्चाई है तो ये हमारे देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है और एक सैनिक के रूप में कुर्बानी देने वाले महान योद्धाओं की आत्मा स्वर्ग में यही बोल रही होगी
ग़लतफ़हमी में ज़िंदगी का हर लम्हा गुज़र गया,
धोखा मिला हमको,
उसका वक्त संवर गया,
जिससे उम्मीद लगाए चलते रहे जां हथेली पे लेकर ,
मतलब निकल गया और वो हमसे बिगड़ गया !!
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२. व्यंग्य // जनता ने हड़काया तो ई.वी.एम. खराब है......😎😎😎
गाँव के चौपाल पर आज एक बहुत महत्वपूर्ण गरमागर्म बहस छिड़ चुका था। गंगुआ बड़े गुस्से में तमतमाते हुए बोला "देखो भाई ईमानदार होने का ढोल पीटना बहुत आसान है, लेकिन सचमुच में ईमानदार होना बहुत मुश्किल है। सबसे बड़ी बात एक बेईमान आदमी के नज़र में कोई ईमानदार हो ही नही सकता है और इससे भी बड़ी बात यह है कि दुनियाँ में अधिकांश लोग इसलिए ईमानदार बनें बैठे हैं क्योंकि उसको बईमानी का अब तक मौका ही नही मिला है।"
लठैत को भी गुस्सा आ गया, बोला "ज्यादा ज्ञान मत झाड़ो और सबसे पहले तुम्हीं बताओ कि तुम और तुम्हारा नेता लोग किस कोटि में है!!!!"
गंगुआ ने लठैत को समझाया कि देखो भाई हम जानते हैं कि तुम घर से भौजाई से लड़ कर आया है और गुस्सा झुठो हम पर उतार रहा है!!!! अरे ओतने खून में ताव है तो तनी जाके मुखियाजी से लड़ो कि तुम्हारा इन्द्रा-आवास अब तक काहे नही बना है....। ऊ तो तुमसे पार लगेगा नही, बस चौपाल पर बैठ कर चार गो नेता को गरिया के अपने को बड़का शेर समझते हो!!!"
लठैत की दुखती रग पर चोट पड़ने से लठैत कुछ ज्यादा ही तिलमिला गया। उसने चिल्लाते हुए बोला कि साला किसी नेता को कोई शर्म नही है, चुनाव के समय घर-घर जा कर गोर लगेगा और मुंगेरी लाल का हसीन सपना दिखा कर वोट ले लेगा और जीतने के बाद कभी कहेगा फंड नही है, कभी कहेगा अफसर लोग ज्यादा काबिल है, बिना पैसा के नही सुनता है, जनता का दुख-दर्द नही समझता है, कभी कोई और प्राब्लम बता कर टरकाते रहेगा लेकिन जो लोग लक्ष्मी-दर्शन करवा देगा उसका काम यही लोग तुरंत करवा देता है। आखिर गरीब आदमी करे तो क्या करे????
बनारसी काका ने समझाया कि अगर सब आदमी लोग मिल कर ईमानदार आदमी का चुनाव करे, तभी इस समस्या का समाधान हो सकता है।
लठैत फिर तिलमिला गया, बोला काका आदमी से ज्यादा ई जो कुर्सी है वही बईमान है, आप कितना भी ईमानदार आदमी को कुर्सी पर बैठा दीजिए, कुर्सी पर बैठते ही साला वो बैमानी का सब वेद-पुराण तुरंत सीख जाता है।
गंगुआ ने लठैत की बातों का समर्थन करते हुए बोला कि अन्ना हजारे ने इसी कारण से सरकारी कार्यों के निगरानी के लिये जनलोकपाल की मांग की थी। अन्ना टीम ने बहुत बड़ा आंदोलन किया था लेकिन सब नेता लोग अपने नाक में नकेल डालने की कोशिश करने वाले अन्ना के आंदोलन को ही नकेल पहना कर साइड कर दिया।
तब तक मुखिया जी पहुँच गये थे। पहुँचते ही बोले कम जानकारी हो तो ज्यादा ज्ञानी बनने का कोशिश नही करना चाहिये!!!!! अरे अन्ना टीम का सबसे बड़ा हीरो तो केजरीवाल था, उसको देश की राजधानी दिल्ली की जनता ने सिर-आँखों पर बिठाया लेकिन ई लोग तो सबसे ज्यादा ऐश करने लगा। बारह हजार की थाली वाला पार्टी करने लगा। जितना पैसा का काम करता है, उससे ज्यादा रुपया तो अखबार और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रचार पर खर्च कर देता है, सबसे बड़ी बात दिल्ली का मुख्यमंत्री अपने छोटे से छोटे काम का दिल्ली से ज्यादा दिल्ली के बाहर ढोल पीटने का कोशिश करता है....!!!!
"ई तो बिल्कुल पागलपन है और जनता के पैसे का बरबादी है" गंगुआ ने हैरान होते हुए बोला।
मुखिया जी ने तब समझाया "अरे भाई यही तो राजनीति है, काम करो कम और ढोल पीटो ज्यादा!!! इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि आप सरकारी पैसे से पाँच वर्षों तक अपना प्रचार करते हुए जनता के माइंड में ई बात घुसा देना चाहते हैं कि आपसे ज्यादा कर्मठ नेता और कोई नही है । मतलब हारने वाला नेता का प्रचार तो चुनाव के बाद बंद हो जाता है लेकिन जितने वाला नेतालोग पाँच वर्ष तक अपना प्रचार ताबड़तोड़ जारी रखता है। सबसे बड़ी बात विपक्षी लोग सही-गलत सब काम का विरोध और सिर्फ विरोध करते हुए, जनता को बराबर यह एहसास कराते रहता है कि जनता जो गलती किया है उसका सजा भुगत रहा है। आम आदमी पाँच वर्ष इसी गफलत में रह जाता है!!!!"
लठैत तभी गुस्सा करते हुए बोलता है "ए मुखिया जी, आप राजनीति का बात छोड़िये और आज आपको फ्रेश जवाब देना होगा कि आखिर मेरा इन्द्रा आवास कब बनेगा??? चार दिन से घर में इसी झंझट के कारण खाना नही बन रहा है कि जब आप इलेक्शन में मुखिया जी के लिये ऐतना मेहनत किये तो मुखिया जी इन्द्रा आवास अब तक काहे नही दिये हैं!!!!"
मुखिया जी लठैत का तेवर देख कर बिल्कुल सकपका गये, लेकिन बहुत जल्दी खुद को सम्भालते हुए बोले "अरे तुम और तुम्हारी घरवाली दोनों पागल हो गया है। पहले वाला मुखिया कागज सब गड़बड़ कर दिया है, सुधारने में समय लग रहा है, औकताने से थोड़े होगा। थोड़ा धेर्य रखो।"
लठैत ने बिल्कुल मारने के ख्याल से लाठी उठाते हुए कहा लेकिन आप तो बोले थे कि चुनाव अगर जीत गये तो तीन महीना के अंदर तुम्हारा इन्द्रा आवास बन जायेगा और अब तीन वर्ष से ज्यादा हो गया है।"
मुखिया की तो सिठी-पिठी गुम हो गयी। काफी मशक्कत के बाद चौपाल पर बैठे लोगों ने मुखिया जी को मार खाने से बचाया। जब मामला कुछ स्थिर हुआ तो मुखिया जी लठैत को धमकी देते हुए बोले "देख लेना लठैत तुम्हारे गुंडागर्दी का हम तुमको पूरा मजा तुमको चखा कर रहेंगे।
लठैत एक बार फिर डंडा ले कर दौड़ा, अब तो मुखिया जी अपना जान-प्राण ले कर भागे। सबलोगों ने काफी प्रयास के बाद एक बार फिर लठैत को पकड़ कर बिठाया। लठैत लगातार मुखिया को माँ-बहन की गालियाँ दे रहा था और गाँव वाले को समझा रहा था कि इस बार पंचायत चुनाव में किसी हाल में इस कमीना मुखिया को जीतने नही देना है।
इसी बीच मुखिया जी अपने पाले हुए कुछ गुण्डों को ले कर चौपाल पर पहुँच गये। इसके बाद तो लठैत की जमकर ना सिर्फ चौपाल पर मुखिया के गुण्डों ने पिटाई की बल्कि थोड़ी ही देर में दल-बल के साथ दरोगा जी भी वहाँ पहुँच गये और थाना में ले जा कर लठैत को इतना ठोका कि वो तीन माह तक खड़ा भी नही हो पाया। वो तो गनीमत ये रही कि थाना पहुँच कर लठैत की बीबी ने दरोगा और मुखिया जी काफी पैर पढ़ा जो लठैत जेल जाने से बच गया। इस सबके बीच लठैत की मदद के लिये पूरे गाँव में कोई तैयार नही हुआ।
कुछ दिनों बाद चौपाल पर फिर एक बार जमघट लगा था। तभी मुखिया जी भी दरोगा जी के साथ वहाँ पहुँचे तो आज हिम्मत करके गंगुआ ने मुखिया जी को टोक कर बोला कि देखिये मुखिया जी आप जो लठैत के साथ किये, बहुत गलत किये। आपको इस बार पंचायत चुनाव में हमलोग कोई वोट नही देंगे।
पॉवर और पैरवी की बात ही कुछ और होती है। मुखिया जी पर वो नशा सिर चढ़ कर बोल रहा था, उन्होंने बड़े ही गरुड़ भरे अंदाज में गंगुआ को समझाया "देख गंगुआ अगर हम इस बार चुनाव हार गये तो तुमको और लठैत को बूथ केप्चर्ड करने के आरोप में जिंदगी भर जेल में सड़ा देंगे।
गंगुआ हैरान होते हुए "ए मुखिया जी ये क्या गुंडागर्दी है, आप अपने काम-काज से पब्लिक को तो खुश रख नही पा रहे हैं और चुनाव हारने पर आप निर्दोष आदमी पर इतना बड़ा आरोप लगा दीजियेगा। आपको शर्म नही आता है।"
मुखिया जी ने ठहाका लगाते हुए बोला "अरे गंगुआ, अभी तुम राजनीति में एकदम बच्चा है। जब बड़ा नेता लोग जनता द्वारा हड़काया जाने पर, चुनाव आयोग और भारतीय लोकतंत्र का मजाक उड़ाते हुए बोल सकते हैं कि ई.वी.एम. खराब है तो हम छोटा नेता लोग दो-चार गो शरीफ लोग को बलि का बकरा तो बना ही सकते हैं। फिर सही-गलत का फैसला दरोगा जी तुमको थाने ले जा कर करेंगे। इसलिए जब तक पंचायत चुनाव हो नही जाता है तुम अपना ज्ञान थोड़ा कम झाड़ो।"
चौपाल पर सभी लोग मुखिया जी की बात सुन कर आवाक थे और हमारे देश के सभी छोटे-बड़े नेताओं की तरह मुखिया जी ठहाका लगाते हुए वहाँ से ब्लॉक की ओर चले गये।
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३. व्यंग्य //अगर भोंपू नही होता, तो धर्मों का सत्यानाश हो जाता.....!!!
गाँव के चौपाल का जमघट आज 'दुर्गा-पूजा की तैयारी' पर चर्चा में मशगूल था।
लठैत ने सबसे पहले अपनी बात रखते हुए बोला "देखिये भाई, चंदा जितना लगाना है लगा दीजिये लेकिन पूजा में अबकी ओम डी.जे. वाला ही आयेगा। सस्ता वाला डी.जे.मंगवा कर आपलोग सब मजा खराब कर देते हैं। अरे भाई बढ़िया आवाज होगा तब ना दस गाँव का आदमी जानेगा कि हमलोग कितना बढ़िया से पूजा कर रहे हैं। इसी आवाज को सुन कर दस आदमी आपके मेला में आता है और गाँव के लोगों का मान-सम्मान बढ़ता है। पिछले साल ई लोग सस्ता वाला लाउडस्पीकर कर लिया, कुछ पते नही चलता था कि मंदिर में क्या हो रहा है।"
कई लड़को ने एक सुर में लठैत का समर्थन किया!!!
बनारसी काका ने आपत्ति जताई, बोले "अपने गाँव में उस समय से दुर्गा-पूजा हो रहा है जब डी.जे.और लाउडस्पीकर दुनियाँ में आया भी नही था। पूजा, प्रार्थना, ध्यान, आराधना आदि के लिये शोर करने की जरूरत नही है। हमलोग पूजा तो करेंगे ही और इस बात का भी पुरा ध्यान रखना जरूरी है कि पूजा के नाम पर फालतू शोर होने से गाँव के बूढ़ा-बुजुर्ग, बीमार-लाचार लोगों को बेवजह कष्ट नही हो। डी.जे.के आवाज़ से आदमी चिड़चिड़ा हो जाता है, इससे कमजोर आदमी का बी.पी. बढ़ जाता है। डाक्टर लोग बोलता है कि डी.जे. के कारण बेहरापन का शिकायत बढ़ रहा है। रात में भी तुमलोग डी.जे. बजाओगे जिससे सबलोग का नींद खराब हो जाता है। फिर गाँव-समाज में पढ़ने वाला बच्चा सब भी है, उनलोगों का ध्यान रखना भी जरूरी है। इसलिए पूजा-पाठ में डी.जे.लाने का कोई मतलब नही है।"
तभी पीछे से कुछ लड़कों की दबी जुबान में आवाज आई "बुढ़ऊ सठिया गये हैं, आजकल बिना डी.जे. के कहीं पूजा-पाठ होता है। अरे मरदे, डी.जे.के बगैर विसर्जन में तनको भी मजा नही आयेगा। एक तो साला नीतीश कुमार दारू बंद कर दिया और अब डी.जे. भी नही बजेगा तो विसर्जन में नुंगी-डांस और नागिन-डांस क्या हमलोग बुढ़ऊ सबके तरह भाँग-धतूरा खा कर और गाँजा पी कर करेंगे।"
बनारसी काका अनुभवी थे, उन्होंने लड़कों का मन ताड़ लिया और लठैत ग्रूप को खुश करने के ख्याल से बोले "देखो बेटा पूजा के साथ मनोरंजन भी जरूरी है, इसलिए नवरात्रि के अंत में तुमलोग 'माता का जागरण' या रामलीला का आयोजन भी कर लो। विसर्जन के दिन दो-चार घंटा के लिये डी.जे. कर लेना लेकिन अश्लील भोजपुरी और गंदा बोल वाला फिल्मी गाना नही बजाना। ई सब हमलोगों के संस्कृति के खिलाफ है, धार्मिक गाना पर भी जम कर डांस और मस्ती हो सकता है। अरे हमलोग के जवानी के समय बैंड पार्टी वाला आता था, और एक से एक गायक सब ऐसा-ऐसा मधुर गाना गाता था कि बूढ़ा-जवान सब झूमने लगता था। पर आजकल फैशन के चक्कर में लोग डी.जे.पर गंदा-गंदा गाना बजा कर धर्म-संस्कार का सत्यानाश कर रहा है। तुमलोग गाँव का समझदार लड़का है, तुमलोगों को ई सबसे परहेज करना चाहिये।
लठैत बिल्कुल गुस्सा से तमतमाते हुए बोला "ए काका आप अपना समझदारी अपने पास रखीये और लड़का लोगों को अपने ढंग से काम करने दीजिये।"
बनारसी काका भरी सभा में इस तरह अपने अपमान से आहत थे, लेकिन अपमान का घुट पी कर बोले "देखो लठैत औकताओ नही, और आराम से बात करो। अरे पूजा-पाठ सार्वजनिक काम है, इससे किसी को तकलीफ नही होना चाहिये।"
अब लठैत का पक्का यार हिटलरवा भी गुस्साते हुआ बोला "सालों भर जब दिन में पाँच बार मस्जिद से आजान का कान-फारू आवाज आता है तो किसी को कोई तकलीफ नही होता है। हम हिन्दुलोग जब किसी पूजा-पाठ में कोई आयोजन करते हैं तो प्रदूषण फैलने लगता है, लोग बीमार पड़ने लगता है, बच्चा लोग का पढाई बरबाद होने लगता है। सरकार, डाक्टर, पर्यावरणविद, सोसल एक्टिविस्ट सब मिल कर उपदेश देने लगता है। काहे भाई हिंदूलोग को पूजा-पाठ करने का इस देश में कोई आजादी नही है।
अब तक चुपचाप रहने वाला गंगुआ ने लठैत और उसके साथियों को समझाना शुरू किया। "देखो हिटलरवा आज देखा-देखी लोग हर छोटा-बड़ा आयोजन में लाउडस्पीकर और डी.जे. का धरलल्ले से उपयोग करने लगा है। फिफ्टी परसेंट साम्प्रदायिक दंगा का कारण भी यही लाउडस्पीकर और डी.जे. है। लोग सर्वशक्तिमान ईश्वर के आराधना के नाम पर खुल्लम-खुल्ला दिखावा पर उतर गया है। क्या हिंदू, क्या मुस्लिम सबको यही लगता है कि अगर लाउडस्पीकर और डी.जे. उसके मंदिर-मस्जिद से उतर गया तो उसका धर्म ही ख़त्म हो जायेगा और इसको धर्म का कुछ ठेकेदार लोग मज़हब पर गम्भीर संकट बता कर दंगा करवाने का षडयंत्र भी रच दे रहा है। अरे भाई तुमलोग ये बताओ कि उन्नीसवीं सदी के अंत में 'जान फिलिप रेइस ' लाउडस्पीकर का आविष्कार किया तो उसके पहले इस दुनियाँ में हमलोगों का धर्म और मजहब नही था क्या ????
कुछ देर के लिये गाँव के चौपाल का जमघट बिल्कुल खामोश हो गया।
तब बनारसी काका ने बोलना शुरू किया "देखो भाई लाउडस्पीकर और डी.जे. उतारने से धर्म और मजहब का नाश नही होता है लेकिन एक लोकतांत्रिक देश में किसी भी धर्म के मानने वाले लोगों के आस्था पर चोट करना भी अच्छी बात नही है!!!"
बनारसी काका के पाला बदल लेने से गंगुआ थोड़ा घबरा गया, लेकिन थोड़ी देर में खुद को सम्भालते हुए बोला "जानते हैं काका सबसे बड़ा परेशानी क्या है, आज हर धर्म को मानने वाला लोग पूजा-पाठ के नाम पर अपने धन-बल का शक्ति-प्रदर्शन करने लगा है। हमारे धर्म और आस्था का नेतृत्व कट्टरपंथी विचारधारा के लोग करने लगे हैं। सोनू निगम का अगर आजान के नाम पर दिन-प्रतिदिन बढ़ते शोर के विरुद्ध आवाज उठाना गलत है तो धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर मुल्ला-मौलवियों द्वारा अनाफ-सनाफ फतवा जारी करना भी सरासर गलत है, लेकिन सबसे बड़ा गलती एक आम भारतीय कर रहा है जो धर्म के ठेकेदारों और उनके कथित रहनुमाओं को आँख मूंद कर समर्थन दे रहा है। इससे ना तो धर्म बचेगा और ना ही इंसानियत, आखिर कब तक हमलोग धर्म और आस्था जैसे पवित्र चीजों के लिये मनगढ़ंत इगो का निर्माण कर मानवता को शर्मसार करते रहेंगे।
गंगुआ का ज्ञान सबके सर चढ़ कर बोल रहा था।
गंगुआ ने फिर तमाम लोगों से सवाल किया कि आपलोग बताईये कि तीन ओर समुद्री सीमा से घिरे गंगा-यमुना और ब्रह्मपुत्र आदि नदियों वाले देश में लोग जल-प्रदूषण से परेशान हो कर डिब्बा वाला पानी खरीद कर पीने को मजबूर हो गया है। आने वाले समय में लोगों को अपने साथ शुद्ध हवा साँस लेने के लिये ऑक्सिजन का सिलिंडर साथ में ले कर चलना होगा लेकिन जब लगातार बढ़ते शोर से ध्वनि-प्रदूषण खतरनाक स्तर पर चला जायेगा तो लोग क्या करेंगे????
जब किसी ने कोई जवाब नही दिया तो बनारसी काका ने मजाक में पूछा "ए ज्ञानी बाबा, हमलोग तो सरपट मूर्ख हैं, आप ही अपना ज्ञान बघारिये....।
गंगुआ इस चुटकी से थोड़ा शर्मा गया लेकिन सबको समझाते हुए बोला "पूजा-पाठ, कीर्तन-शिवचर्चा, नमाज-जलसा सब जरूरी है लेकिन धार्मिक दिखावे के नाम पर पर्यावरण और समाजिक-सौहाद्र से खिलवाड़ बिल्कुल भी जायज नही है!"
लठैत और हिटलरवा के साथ-साथ उसका पुरा ग्रूप अब शांत हो चुका था।
तभी अचानक मुखियाजी चौपाल पर पहुँच गये और उन्होंने आते ही कहा कौन इस दुर्गा पूजा में डी.जे.नही बजने देगा हम उसका सात पुश्त को सबक सीखा देंगे.....!!!!!!!
और सबलोग खिलखिला कर हँस पड़े
😆😆😆😆😆😆😆😆😆😆😆😆😆
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४. #गरीबों की बढ़ी चर्बी से सब परेशान
फेंकना ऋषि आग बबूला हो कर पुलिस को भद्दी भद्दी गालियां दे रहा था। तभी जामुन काका ने फेंकना को टोका "क्या हुआ रे फेंकना, काहे दरोगवा को गरिया रहा है। फिर आज सौतारी में तुमको धड़ लिया क्या ? फेंकना यह सुनते ही गर्म हो गया, बोला काका इज्जत करते हैं तो ढ़ेर मत बोला कीजिए। आपका बेटवा कौन ऐसा दिन है, जो खा पी कर रात में महाभारत नहीं करता है लेकिन आपका या दारोगवा का का मजाल है कि उसे कोई कुछ बोल दे। आख़िर वह सरपंच का बेटा है और मैं एक गरीब आदमी हूं और मुंह खोलवाए हैं तो सुन लीजिए पिछले बार जब आप ही दारोगवा को बुला कर धड़वाए थे तो यही शर्त पर छूटवाए थे कि दोनों को शाम तक दो देशी मुर्गा के साथ साथ एक बोतल ब्रांडेड फुल पहुंचवाना होगा और आए हैं नाटक बतियाने।
तब तक थोड़ी भीड़ भी जमा हो गई थी। सरेआम अपनी मिट्टी पलित होते देख सरपंच जामुन काका ने पैंतरा बदला। बोले तुम तो नाहक गर्म हो रहे हो। मुर्गा लाकर तुम्हीं तो बनाया था और आधा से ज्यादा बोतल भी तुम्हीं खाली कर दिया था। अरे वह तो तुम्हारा इज्जत रखने के लिए हम और दरोगवा थोड़ा सा इंजॉय कर लिए थे, लेकिन मूर्ख आदमी हो, जब तक सोंटा नहीं पड़ेगा दिमाग जगह पर थोड़े ही आएगा। फेंकना भी आज मुंहतोड़ जवाब देने के मूड में था, बोला ए सरपंच साहब गरीब लोगन का इज्जत तो आप जैसन नमक हराम लोगों के दुष्टई का दासी होता है। कोरोना के कारण काम धंधा सब बन्द हो गया है। माय बहुत बीमार है। बड़ा मुश्किल से निंघोरा करके बाबू साहब से पांच परसेंट पर रुपया उठा कर दवाई लेने गए थे कि दारोगवा भेंट गया। हाथ में बटुआ देखते बोला कि लॉक डाउन में तुमको मस्ती चढ़ल है और मेरा बात सुनने से पहले आठ दस लाठी घिंच दिया। जब मैं बिलख बिलख कर रोने लगा तो बोला हाफ का दाम दो और जल्दी से माय का दवाई लेकर खिसको। माय का दवाई का ओकाद नहीं है मेरा, और ई ..... (भद्दी गालियां) पुलिसवाला जिसको दारू पीने वाले को पकड़ने का ड्यूटी मिला है, उसको दारू क्या किडनी बेच कर पिलाएं हम। तभी क्रांतिकारी बाबा भी वहां टपक गए। भीड़ देख मामले की तह तक जाने का प्रयास करने लगे लेकिन फेंकना द्वारा पुलिस वालों को लगातार गाली देना उन्हें नागवार गुजरा। पहले उन्होनें फेंकना को ऐसा करने से रोकना चाहा लेकिन जब वह नहीं माना तो उसे दो तीन झापड़ रसीद कर दिया। फेंकना अब और भी जोड़ जोड़ से भद्दी भद्दी गालियां बकने लगा। सरपंच साहब ने भी लगे हाथ अपना हाथ साफ कर लिया। तब उसकी मां रोती गिड़गिड़ाती बाहर अाई, बोली सब मिलकर गरीब के बेटा को जान से मार दो। अरे हमलोग का सबसे बड़ा गलती है कि हमलोग गरीब हैं। क्रांतिकारी बाबा ने समझाया, बोले काकी कोरोना में पुलिस जान पर खेलकर लोगों को जागरूक कर रहा है और तुम्हारा बेटा पूरे पुलिस डिपारटमेंट को गरिया रहा है और तुम भी उसी का पक्ष ले रही हो। आख़िर तुम्हारा कर्जा नहीं धारता है कोय।
काकी भी गुस्से से तमतमा कर बोली, अरे पूरे दुनियां का कर्जा तो हम गरीब लोग धारते हैं। फेंकना दिन रात खटता है तब दोनों शाम चूल्हा जलता है। लेयका फयका है शाम में मन बहलाने के लिए दो घूंट तारी पी लिया तो किसी के बाप का क्या बिगड़ गया लेकिन उस मामले को रफा दफा करने में पांच हजार खर्च हो गया। अब आधा मजदूरी वही कर्जा तोड़ने में चला जाता है। बार बार बाहर जाने का जिद्द कर रहा था लेकिन जबरदस्ती रोक कर रखे हैं। चार दिन से हम बीमार हैं, कर्जा उठा कर दवाई लेने गया तो दरोगवा बेटा को बड़ी मार मारा है। बात अब बिल्कुल स्पष्ट हो चुकी थी। क्रांतिकारी बाबा बोले रुको काकी हम एसपी से बात करते हैं। तभी काकी हाथ जोड़कर बिलखते हुए बोली, मालिक रहम करो। ई जल्लाद का कंप्लेन करने पर मेरे बेटा का जिंदगी संकट में पड़ जाएगा। सरपंच साहब गरमा कर बोले, देखिए बुढ़िया का नौटंकी और उधर बेटा, लाट साहब का नाना बन रहा है। हम अभी दारोगवा को फोन कर इसके शरीर का चर्बी कम करवाते हैं। मास्टर होशियार चंद ने तब सरपंच साहब को टोका, फेंकना का चर्बी तो कम होना ही चाहिए और हो भी जाएगा लेकिन एक गरीब आदमी अगर अपनी बीमार मां की दवाई लाने जाता है और उस पर कोई अपने वर्दी के ताव में अत्याचार करता है तो उसकी चर्बी कब और कौन कम करेगा ...?
तभी फेंकना दारू पीकर सबको गरियाते हुए बोला, अरे भीड़ हटाओ जो होगा हम देख लेंगे।
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५. व्यंग्य // आपस में लड़ रहे शिक्षक नेता, शिक्षक एकता की सबसे बड़ी पहचान है....😃😃😃
गाँव के चौपाल पर आज कुछ ज्यादा भीड़ नही थी। बनारसी काका आल्हा गा कर चौपाल पर बैठे लोगों का मनोरंजन कर रहे थे। इसी बीच अपने हल बैल के साथ किशन वहाँ से गुजर रहा था। चौपाल के पास पहुँचते ही उसने बनारसी काका को टोका "ए काका, अगर ई मास्टर लोग अपना वाजिब मांग के लिये हड़ताल और आंदोलन कर रहा है तो बिल्कुल ठीक बात है। लेकिन स्कूल सब में देखते हैं कि मास्टर लोग अलग-अलग संघ के नाम पर अपने-अपने में आपस में लड़ते रहता है। अब आप ही बताईये कि ई सब क्या ठीक बात है....!!!! अरे भाई जब अपना वाजिब हक (समान काम का समान वेतन) के लिये लड़ने में सब मास्टर में आपस में एकता नहीं है तो ई लोग गाँव-समाज के बच्चा को एकता का क्या पाठ पढ़ायेगा?????
लठैत ने भी चुटकी लेते हुए कहा "अरे मरदे, अगर एकता रहता तो अब तक सरकार क्या ऊपर वाला भगवान भी मास्टर लोगों का वाजिब बात नहीं मानने का हिम्मत नहीं करता!!! अरे संघ-संघ वाला खेल के चक्कर में ही सब मास्टर लोग ठगाता रहता है और पटना के सड़क-चौराहे पर इन्हीं लोगों का चेला-चटिया लोग सरकार के इशारा पर इनलोगों को डन्गाता रहता है।सबसे शर्म का बात तो ई है कि बेशर्म के तरह मार खा कर भी इनलोगों का जमीर नही जागता है और अपने भाई-बंधु का दर्द समझ में नहीं आता है। सारा दुनियाँ जानता है कि
~¦ आपस में भाई करे मार, तो घर लूटे गंवार ¦~
लठैत के मुँह से ऐसी बात सुन कर चौपाल पर बैठे गाँव के हेडमास्टर चंदन बाबू को बहुत गुस्सा आ गया। उन्होंने लठैत को धौपते हुए बोलना शुरू किया "देख लठैत, पढ़ने के टाइम में तो तुम गुल्ली-डंडा में अपना समय खराब कर जिंदगी नरक बना लिया। मुखिया जी के चमचागिरी में तुम्हारा दिन गुजरता है और बात ऐसा बनाता है कि महात्मा गाँधी इस दुनियाँ से जाते समय सारा ज्ञान का जंतर-मंतर तुम्हीं को सौंप कर गये थे।
लठैत भी कहाँ कम था बोला "जाइये मरदे, पढ़-लिख कर बड़का ज्ञानी बनने का नौटंकी मत करिये। अरे भाई, नहीं पढ़े तो क्या हुआ मजदूरी करके पेट भरते हैं, लेकिन क्या मजाल है कि कोई जरा भी हम मजदूर लोगों का हकमारी कर ले, कितना भी आपस में झगड़ा रहेगा लेकिन सब मिल कर सबसे पहले हकमारी करने वाला को ऐसा सबक सिखायेंगे कि साला दोहरा के फिर हमारे ग्रूप के किसी गरीब मजदूर को परेशान करने का हिम्मत नही करेगा लेकिन आपलोग तो पढ़-लिख कर भी हम गंवार लोगों से बदतर हैं। अरे आप ही का कुछ साथी लोग पटना में मार खाया और आपमें से ही कुछ मास्टर लोग बोला कि वो मेरा संघ का नही है। अब आप बताइये जब आपलोग में आपस में ही एकता नही है तो फिर बच्चा लोगों को आपलोग क्या एकता का प्रेरणा दीजियेगा। अरे आपलोगों का स्थिति देख कर तो हमको यही डर लगता है कि आपलोग से पढ़ा बच्चा-लोगों को किताबी ज्ञान चाहे जो मिल जाये लेकिन आपसी प्रेम और भाईचारे का प्रेरणा शायद ही मिलेगा। अगर ऐसा ही रहा तो एक दिन फिर देश जरूर गुलाम हो जायेगा।
चंदन बाबू को अब कोई जवाब नही सूझ रहा था। काफी समय चुप रहने के बाद बोले "अरे मरदे, हम जिस संघ का प्रखंड-अध्यक्ष हैं, उस संघ का मास्टर लोग पटना में कभी मार नहीं खाया है।"
अबकी किशन ने बड़ी घृणा भरी नज़रों से चंदन बाबू को देखते हुए बोला "थू.... थू.....थू.... मास्टर साहब!!! आपके मुँह से इस तरह का बात बिल्कुल शोभा नही देता है। अरे भाई पुरा दुनियाँ सिर्फ इतना जानता है कि पटना में सड़क पर मार खाने वाला लोग सिर्फ और सिर्फ प्राइमरी स्कूल का मास्टर था, जो अपने वाजिब हक और सुप्रीम कोर्ट के आदेश 'समान काम के लिये समान वेतन' को लागू कराने के लिये विधानसभा का घेराव करने गया था। अब आप बेशर्म के तरह बोलते हैं कि मार खाने वाला मास्टर लोग हमारे संघ का नही था। अरे भाई, जब मास्टर का ही इज्जत नही बचा तो आप अपना संघ का डुगडुगी बजा कर कौन बड़का तीर मारने का नौटंकी कर रहे हैं।"
बनारसी काका ने किशन की बातों का समर्थन करते हुए बोला "देखिये चंदन बाबू, आज अगर मीडिया के किसी एक आदमी पर हमला होता है, तो पूरा देश का मीडिया उसका नही सिर्फ निंदा करता है बल्कि दोषियों पर कार्यवाई करने के लिये दबाव बनाया जाता है। तभी भारत का चौथा स्तम्भ भारत में इतना मजबूत है। आपलोग संघ के राजनीति के चक्कर में समाज को शिक्षित करने वाले शिक्षक-समुदाय के प्रतिष्ठा का बंटाधार कर दिये और अपने को बड़का ज्ञानी समझते बने फिरते हैं। आपलोग के इसी मूर्खता के कारण सरकार आपलोग का शोषण कर रही है। यही हालात रहा तो फिर आपलोग भूल जाइये 'समान काम, समान वेतन!!!!"
चंदन बाबू ने बड़े ही ताव में आकर बोलना शुरू किया "नही बनारसी बाबू, आपलोग किसी भ्रम में नही रहिये!!! हमलोग सरकार के खिलाफ आर-पार की लड़ाई शुरू कर दिये हैं। बिहार के एक-एक स्कूल में तब तक ताला लटका रहेगा, जब तक बिहार सरकार सभी शिक्षकों को समान काम का समान वेतन नही दे देती है।"
अब तक बिल्कुल चुपचाप रहने वाले गंगुआ ने बड़े ही शायराना अंदाज में मुँह खोला "ए मास्टर साहब, आपके बात से हमको एक फिल्मी डाइलॉग याद आ गया....
क्या बोला था, हाँ...
दिल को बहलाने के लिये गालिब, ख्याल बहुत अच्छा है.....,
अरे मरदे आपलोग तो खुद ही एक-दूसरे का टाँग खींचते रहते हैं। पिछले बार TET पास टीचर को आपलोग ना सिर्फ अनट्रेंड बोल कर ग्रेड-पे से वंचित कर दिये बल्कि ट्रेंड TET को भी दो साल का लोचा लगा कर चाइनीज वेतनमान में भी उनलोगों को बड़का वाला अँगूठा दिखा दिये। अब अपना नेतागिरी का बारी आया तो सबसे सहयोग का अपील कर रहे हैं। अरे भाई , आपलोग को इतना मामूली बात काहे समझ में नही आता है कि बबूल का पेड़ लगाने वाले को आम फलने का उम्मीद नही करना चाहिये।"
चंदन बाबू ने अपना आखरी दांव खेला "देखिए आपलोग समझ नही रहे हैं, ये बहुत महत्वपूर्ण समय है बिहार के सभी शिक्षकों को स्कूल में पूर्ण तालाबंदी कर देना चाहिये। अगर इस बार शिक्षक लोगों ने एकता का परिचय नहीं दिया तो सब सत्यानाश हो जायेगा!!!"
बनारसी काका ने एकएक ठहाका लगाया "ऐसा नही बोलिये चंदन बाबू!!! अगर बिहार सरकार ने सच में समान काम का समान वेतन पूरी ईमानदारी से बिहार के सभी शिक्षकों को दे दिया तो आपलोगों जैसे नेताओं की राजनीति और चंदा उगाही की दुकानदारी बंद हो जायेगी। आज अधिकांश शिक्षक संघ के नेताओं के खाने और दिखाने के दो अलग-अलग दाँत हैं। सरकार से ज्यादा अधिकांश शिक्षक संघ के नेता लोग ये नही चाहते हैं कि शिक्षकों को उसका वाजिब हक मिल जाये ...। माध्यमिक शिक्षक संघ के नेताओं ने बिना किसी ठोस बातचीत के बगैर मैट्रिक-इंटर के कॉपी मूल्यांकन के बहिष्कार आंदोलन को वापस ले कर कितने शिक्षकों के अरमान और विश्वास की धज्जियां उड़ा दी। आपलोगों में से बहुतों ने अब तक शिक्षक-समुदाय को मुंगेरी लाल का हसीन सपना दिखा-दिखा कर अपना उल्लू सीधा करने का काम किया है। अब भी सारे लोग एक मंच पर आकर अन्याय और शोषण के विरुद्ध महासंग्राम का शंखनाद करें नहीं तो शिक्षक-बंधु एक बार फिर से निश्चित रूप से ठगे जाने वाले हैं।
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६. व्यंग्य // अपना काम बनता भाड़ में जाये जनता : वरिष्ठ शिक्षक नेता
जेठ की दोपहर में मल्लूह काका मुखिया जी के साथ बैठ कर देश दुनियाँ की गप्प हाँक रहे थे कि तभी किशन ने चौपाल पर बैठे मल्लूह काका को टोका "ए काका, सुने मास्टर लोग हड़ताल तोड़ दिया है और अब मेट्रिक का कॉपी मूल्यांकन भी शुरू हो गया है।"
मुखिया जी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया "अरे किशन, ई हड़ताल वगेरह कुछ नही था, ई सब तो नया मास्टर को फुसलाने के लिये पूरनका मास्टर सबका मकर्जाल था"
किशन हैरत से "हम कुछ समझे नही मुखियाजी"
मुखिया जी ने समझाना शुरू किया "देख किशन कल तुम्हारा बेटा गोलूवा जब खेलते खेलते गिर गया और रोने लगा तब तुम्हारा बाबू पोता को चुपाने के लिये क्या किया था????
किशन मुखिया जी के सवाल का कुछ मतलब नही समझा, फिर भी बोला "अरे मुखिया जी आप भी एतना घुमा-फिरा कर बात करते हैं, अरे चिन्ति काकी दरवाजा पर केला का छिलका फेक दी थी। गोलूवा भी वही दरवाजा पर खेल रहा था और केला का छिलका पर जैसे लात पड़ा गिर गया। तब बाबू जी गोलूवा को गोद में उठा लिये और उसको चुपाने के लिये जमीन में दो-तीन लात जोर से मार दिये, गोलूवा को लगा नीचे जमीन पर गिरने से उसको जो चोट लगा है, दादा जी तीन चार लात मार कर जमीन को सजा दे दिये हैं और गोलूवा खुश हो कर खूब हँसने लगा।"
तब मुखिया जी ने समझाया "मूल्यांकन बहिष्कार में भी कुछ वैसा ही हुआ है, इनलोगों का वरिष्ठ नेता लोग, हाईस्कूल के नया मास्टर लोग को गोलूवा के तरह जमीन पर लात मार कर खुश कर दिये हैं, और मूल्यांकन बहिष्कार समाप्त हो गया है।"
मल्लूह काका को भी मुखिया जी का बात कुछ समझ में नही आया। बोले ए मुखिया जी पहेली मत बूझाइये, और थोड़ा क्लियर बात बोलिये।
मुखिया जी ने ठहाका लगाते हुए बोला "एक बात बताईये कि अगर अभी पाँच साल का गोलूवा अप्पन बड़ भाई-बहन के साथ खेलने का जिद्द करेगा तो ऊ लोग क्या करेगा"
मल्लूह काका "धू मरदे, छोटा बच्चा को कहीं बड़ा बच्चा अपने साथ थोड़े खिलायेगा"
मुखिया जी ने फिर सवाल दागा "अगर किशन और उसकी पत्नी काम में बिजी हो और बोल दे कि गोलूवा को थोड़ा देर ओझड़ा कर रखो तब बड़ा बच्चा लोग क्या करेगा????"
मल्लूह काका झल्लाते हुए जवाब दिया "अरे मुखियाजी, माय-बाप के डर से दूध-भात बना कर गोलूवा को खेला लेगा या क्रिकेट के एक्सट्रा खिलाड़ी बना कर ग्राउंड के बाहर जब गेंद जायेगा तो उसको गेंद वापस लाने के लिये दौड़ा देगा।"
मुखिया जी ने एक बार फिर से ठहाका लगाया, बोले "हाईस्कूल का नया मास्टर लोग भी वही दूध-भात और क्रिकेट के एक्सट्रा खिलाड़ी के तरह मैदान में फुदक रहा था और ई लोग सपना देख रहा था कि परी रानी आयेगी और "समान काम का समान वेतन" वाला मिठाई इसको ला कर दे देगी जबकि ई लोग को तो पूरनका मास्टर के वरिष्ठ नेता लोग द्वारा, सरकार के कहने पर एक्सट्रा खिलाड़ी के तरह खेलाया जा रहा था, और ई लोग इस भ्रम में था कि मूल्यांकन बहिष्कार के खेल का मैन खिलाड़ी यही लोग हैं।"
किशन को मुखिया जी का बात पर बिल्कुल भी विश्वास नही हुआ बोला "ए मुखिया जी, गोलूवा और परी रानी का कहानी सुना कर आप हमको सही बात नही बताना चाहते हैं तो नही बताईये लेकिन हाईस्कूल का एम॰ए और बी.ए. पास मास्टर लोग एतना बेवकूफ नही है, जो बिना मतलब का हड़ताल तोड़ देगा।"
मुखिया जी को किशन की बात बिल्कुल भी नही जंची, गुस्सा कर बोले "ढेर होशियार आदमी जो है ना दस जगह महकता है, अरे विश्वास नही हो रहा है तो पूछो हाईस्कूल के किसी नियोजित मास्टर से कि इनका वरिष्ठ नेता लोग , सरकार से इनको क्या दिलवा दिये जो ई लोग मूल्यांकन बहिष्कार वापस ले लिये?????"
तभी चौपाल के बगल से चंदन बाबू गुजरे तो सभी लोगों ने उन्हें काफी आवाज दी लेकिन आज वो सबको सुन कर भी अनसुना करते हुए तेजी से अपने ससुराल वाला मोटर साईकिल दौड़ा कर निकल गये। चंदन बाबू नया-नया हाई स्कूल का मास्टर बने हैं लेकिन उनकी माली हालत बहुत खराब है। कम्पीटीशन वाला परीक्षा पास करके स्कूल जाय्न किये हैं लेकिन वेतन प्राइमरी स्कूल के नियमित मास्टर से भी कम मिलने के कारण हीन भावना के शिकार हैं। अबकी चंदन बाबू और इनके जैसे हजारों शिक्षक एक वरिष्ठ नेता के नेतृत्व में आर-पार की लड़ाई लड़ रहे थे। सरकार द्वारा वेतन रोके जाने के बावजूद अपने चंदन बाबू अपने तमाम साथियों के साथ अपने हक की लड़ाई "समान काम का समान वेतन" हासिल करने के लिये मूल्यांकन केंद्र के बाहर धरने पर डटे थे, लेकिन वरिष्ठ नेता जो इनलोगों के सर्वमान्य नेता थे और इनलोगों के वाजिब हक की लड़ाई के लिये सड़क से कोर्ट तक लड़ाई का नेतृत्व कर रहे थे ने ऐसा रंग बदला कि बेचारी गिरगिट भी शर्म से पानी पानी हो गई।
आज इनका और इनके साथियों का मूल्यांकन बहिष्कार वाला हड़ताल तो ख़त्म हो गया लेकिन इनकी पत्नी ने सुबह-सुबह घर में खाना हड़ताल कर दिया। बार-बार चंदन बाबू से एक ही सवाल पूछ रही थी कि अगर कोर्ट के निर्णय का ही इंतिजार करना था तो एक माह से आपलोग सड़क पर नौटंकी क्यों कर रहे थे???
चंदन बाबू एक ही जवाब दे पा रहे थे कि प्रदेश अध्यक्ष ने हड़ताल तोड़ने को कहा है।
उनकी श्रीमती को उनका ये जवाब ठीक वैसा ही लग रहा था जैसे कोई भैंस के आगे बीन बजा कर उसे नचाना चाह रहा हो जबकि भैंस को कई दिनों से नाद में भोजन नसीब नही हुआ हो।
दरअसल चंदन बाबू बीन बजाने के आलावे कुछ कर भी नही सकते थे क्योंकि जिन लोगों को चंदन बाबू और उनके तमाम साथी उस्ताद मान कर,उनके एक इशारे पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार थे, वो लोग तो ठग तांत्रिक निकला और मूल्यांकन बहिष्कार का ड्रामा उनलोगों ने ठीक उसी सेंस में किया था जिस प्रकार चुनाव के समय भीड़ जमा करने के लिये नेताजी लोग कभी-कभी नौटंकी नाच का आयोजन कर लिया करते हैं। अब इनके वरिष्ठ नेता को जिस नागमणि की तलाश थी वो उन्हें हासिल हो चुका है, हालांकि चंदन बाबू और उनके साथी भी अब बड़े हो चुके हैं और उन्हें ये भी मालूम हो चुका है कि कोई परी रानी "समान काम का समान वेतन" वाला मिठाई ले कर नही आने वाला है, लेकिन घर-परिवार से लेकर सड़क चौराहे पर एक ही बात सब पूछ रहा है कि मूल्यांकन बहिष्कार से मिला क्या ?????
दरअसल हमारे गाँव-समाज में अक्सर देखा जाता है कि कुछ गरीब तबके के लोग अपने भाई से झगड़ा होने पर अपने ऊँची पहुँच और बड़े रसूख वाले दोस्तों का हवाला दे कर घर-परिवार में रौब झाड़ने का प्रयास करते हैं, और तब बिल्ली मौसी बराबर हिस्सों में रोटी बाँटने के नाम पर पुरा रोटी ही खा जाती है, जैसा कि वरिष्ठ नेता खा गये हैं। अब देखना है कि नियोजित भाई अपने अन्य नियोजित भाई से कैसे-कैसे लड़ कर एक दूसरे का सत्यानाश करते हैं......
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७. व्यंग्य // सरकारी स्कूल के लिये सही नीति बना कर हमलोगों को अपने बाल-बच्चे का भविष्य खराब नही करना है....????
बनारसी काका किशन के साईकिल दुकान पर अपने साईकिल का पंचर बनवा रहे थे। जेठ की दोपहर में साईकिल का टायर अगर पुराना हो तो पंचर होना आम बात है। किशन का दुकान ऐसे समय में लोगों के बहुत काम आता था। गाँव में लगभग पाँच किलोमीटर के दायरे में कोई दूसरा दुकान नही होने के कारण किशन पंचर बनाने का लगभग दोगुना कीमत वसूलता था। लोगों के मजबूरी का फायदा उठाने के बावजूद शायद ही कोई किशन से बहस करता हो क्योंकि सुदूर देहात में पड़ने वाले उस गाँव में समय पर पंचर बनाने वाला मिस्त्री मिल जाना ही बहुत बड़ी बात थी, पंचर बनाने के कीमत से किसी को कोई खास एतराज नही था। तभी गाँव के प्राथमिक विद्द्यालय के प्रधानाध्यापक निखिल बाबू अपने एक सहायक शिक्षक के साथ अपनी दहेज वाली पुरानी मोटर-साईकिल को सरपट दौड़ाते हुए वहाँ से गुजर रहे थे। बनारसी काका ने निखिल बाबू को देखते ही आवाज लगाई, ए मास्टर साहब रुकिये थोड़ा आराम कर लीजिये।
निखिल बाबू ने जोर से ब्रेक लगा कर गाड़ी रोक दी।
निखिल बाबू के रुकते ही बनारसी बाबू बोले "क्या हो मास्टर साहब, ससुराल के गाड़ी का असली मजा तो आप ही उठा रहे हैं!!!
किशन ने भी तंज़ कसा "अरे काका कभी मास्टर साहब मोटर-साईकिल को आराम नही देते हैं।"
निखिल बाबू का पारा बिल्कुल चढ़ गया। बोले अरे किशन तुमको मेरे मोटर-साईकिल का परेशानी बुझाता है और मेरा परेशानी किसी को दिखाई ही नही पड़ता है।"
किशन मुस्कुराते हुए "क्या सर कितना बढ़िया तो स्कूल में कुर्सी तोड़ते हैं!!!!!!"
मास्टर साहब दुखी हो कर बोले "अभी छात्रवृति वाला रिपोर्ट जमा करने जा रहे हैं, फिर बच्चा लोगों का अंक-पत्रक बनाना है, इसी बीच आधार कार्ड बनवाने के लिये केंप भी लगेगा, mdm रिपोर्ट भी परसों तक सी.आर.सी. में जमा करना है। बाल पंजी का काम अधूरा है। उसको भी इसी माह फाइनल करना है।अब एगो नया टेंशन कपार पर अलगे सरकार पटक दिया है।"
किशन हैरानी से एतना टेंशन के बाद फिर नया टेंशन ????
निखिल बाबू सिर खुजलाते हुए "अरे किशन थोड़ा देखो तो मेरा मोटर-साईकिल इतना धुआँ काहे दे रहा है????"
किशन झल्लाते हुए "क्या सर????अरे भाई, हम साईकिल का मिस्त्री हैं, मोटर-साईकिल का नही!!! मेरे पास न तो औजार है, और नही मोटर-साईकिल के बारे में कोई जानकारी है??? आप भी रह-रह कर मजाक करने लगते हैं!!"
अभी किशन ने अपनी बात ख़त्म भी नही की थी कि निखिल बाबू बोल पड़े "अच्छा धुआँ छोड़ दो, थोड़ा गाड़ी का ब्रेक ही ठीक कर दो"
किशन "अरे मास्टर साहब हम मोटर-साईकिल का मिस्त्री नही हैं!!!!!"
निखिल बाबू किशन की बात को अनसुना करते हुए "अरे मरदे, कम से कम मोटर-साईकिल का चैन ही टाइट कर दो"
किशन अब माथा पीटने लगा!!!!!
लेकिन किशन बाबू कहाँ रुकने वाले थे "बोले छोड़ो बनारसी बाबू के साईकिल का पंचर बना कर, मेरे मोटर-साईकिल का भी पंचर बना देना!!!!"
अब बनारसी काका गुस्से से झुंझलाते हुए "आप निखिल बाबू पगला गये हैं क्या ??? जब किशन बोल रहा है कि उसके पास औजार नही है तब आप काहे उसको परेशान कर रहे हैं!!!"
तभी निखिल बाबू ने डिक्की खोल कर औजार का किट निकालते हुए कहा "बनारसी बाबू अब आप किशन को बोलिये जल्दी से मेरा मोटर-साईकिल ठीक कर देगा!!!!"
बनारसी बाबू भी माथा ठोक लिये बोले "अरे भाई आपका दिमाग काम नही करता है क्या??इसको मोटर-साईकिल के बारे में जब जानकारी नही है तो आप अपना मोटर-साइकिल का काहे सत्यानाश करवाना चाहते हैं????
अब निखिल बाबू का भी गुस्सा भी सातवें आसमान पर था, बोले पगला तो बिहार सरकार गया है, अरे प्राइमरी का मास्टर को इण्टर का कॉपी चेक करने बोलता है!!!! बताईये जब केंद्रीय विद्द्यालय के इण्टर का मास्टर सिलेबस का पूर्ण जानकारी नही होने के कारण कॉपी चेक करने के लिये तैयार नही हुआ तो प्राइमरी के मास्टर से इण्टर का कॉपी चेक कराने का क्या मतलब है???? आपको मेरे मोटर-साईकिल का फिक्र है लेकिन लाखों बच्चे के भविष्य के साथ सरकार खिलवाड़ कर रही है, इस बात का चिंता किसी को क्यों नही है??? अरे जब मास्टर के कमी के कारण प्राइमरी स्कूल का अपना काम टाईम पर नही हो पा रहा है फिर ई नया बखेरा से गरीब-बच्चालोग का पढ़ाई का जो नुकसान होगा, उसका पूर्ति कौन करेगा??? और अगर बिहार में ई सब हो सकता है तो साईकिल मिस्त्री कार और ट्रेक्टर ठीक क्यों नही कर सकता है???
निखिल बाबू की बात सुनकर बनारसी काका और किशन के तो होश उड़ गये लेकिन तभी मुखिया जी ने आते ही निखिल बाबू की खिंचाई शुरू कर दी, बोले "का हो मास्टर साहब जिस थाली में आपलोग खाते हैं, उसी में छेद करते हैं....! अरे सरकार का नमक खा कर सरकारी काम में अरंगा लगाना आपलोग को बिल्कुल भी शोभा नही देता है!!!!
निखिल बाबू को मुखियाजी की बात बिल्कुल तीर सा लगा। तिलमिलाते हुए बोले "ए मुखिया जी हमलोग तो सिर्फ थाली में छेद करते हैं, ऊ भी ऐसा थाली जिसमें कभी भरपेट भोजन नही परोसा जाता है, और आधा पेट भोजन भी कभी भी समय पर नही मिलता है लेकिन यहाँ तो ऐसा-ऐसा लोग है जो थाली ही गायब कर देता है, और सबसे बड़ी बात बिना थाली के ही चारा, यूरिया, अलकतरा, गरीब का आनाज, मिट्टी और ना जाने क्या-क्या खा जाता है????
मुखिया जी को निखिल बाबू से इस घुमावदार जवाब की उम्मीद नही थी, बोले देखिए निखिल बाबू मास्टर हैं मास्टर बन कर रहिये और जो बोलना है स्पष्ट बोलिये!!!"
निखिल बाबू भी पूरे मूड में थे, गरजकर बोले "इस देश में आजकल चोर-लोग बहुत जोर से बोलने लगा है। हर सरकारी योजना में खुलेआम बंदरबांट करने वाला लोग ही लोगों को समाजसेवा और राष्ट्रहित का पाठ पढ़ा रहा है, और पढ़ने पढ़ाने वाले लोगों पर चोरों की पहरेदारी बिठा दी गयी है!!!!"
मुखिया जी अब आपे से बाहर थे, बोले "क्या रे किशन हम चोर हैं ??? ई दो टका का मास्टर हमको चोर बोलता है!!!!"
निखिल बाबू ने फिर एक बार दहाड़ लगाई, बोले गूंगे लोगों को गवाही में खड़ा नही कीजिये मुखिया जी, अरे इस किशन से आप चार वर्ष पहले बीस हजार रुपया इन्द्रा आवास के नाम पर लिये थे, क्या किशन का इन्द्रा आवास बन गया। अरे किशन क्या, आप गाँव में कौन ऐसा आदमी है जिसको आप कोई ना कोई मुंगेरी लाल का हसीन सपना दिखा कर नही लूटे हैं, पंचायत के प्रत्येक काम में आपका और उस काम से जुड़े हर सरकारी कर्मचारी का कमीशन बाँधा हुआ है और आप सरकार के तुगलकी फ़रमान को शिक्षकगण द्वारा नही मानने पर पहले नसीहत देते हैं और फिर डराते हैं!!!!!
बनारसी काका ने हाथापाई नही हो, ईसलिए स्थिति को सम्भालने के ख्याल से बोले "क्या निखिल बाबू!!! मानते हैं आपलोगों के साथ सरकार गलत कर रही है, लेकिन पब्लिक का क्या गलती है???"
निखिल बाबू ने भी बनारसी काका को समझाया कि ऐसा मत बोलिये बनारसी बाबू, जो पब्लिक बच्चे को छात्रवृत्ति नही मिलने पर मास्टर से हाथापाई के लिये तैयार हो जाती है, क्या उसे ये मामूली बात समझ में नही आ रहा कि रिजल्ट में देरी या अयोग्य लोगों से मैट्रिक-इण्टर का कॉपी जाँच कराना दोनों ही बच्चों के भविष्य के साथ घटिया मजाक है।
मुखिया ने टोका "अरे भाई, ई तो सरकार का नीति है!!! इसमें कोई क्या कर सकता है???
निखिल बाबू मुस्कुराते हुए बोले कि मुखिया जी यहाँ गाँव में प्राइमरी स्कूल के शिक्षा-समिति का सचिव आपकी बहु है, लेकिन आपका पोता सब दिन बाहर कॉन्वेंट में पढ़ता है, उसी प्रकार इस देश में सरकारी शिक्षा-नीति बनाने वाले किसी भी नेता या अफसर का बच्चा सरकारी स्कूल में नही पढ़ता है, और यही इस देश के गरीब बच्चों का दुर्भाग्य है। सरकार गरीब बच्चों और उसके अभिभावक को सिर्फ खैरात बाँटने वाली योजना से खुश रख कर मूर्ख बनाने का प्रयास कर रही है। सरकारी शिक्षकों को ना तो उसका कानूनी हक "समान काम का समान वेतन" दे रही है और ना ही सरकार शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त कर रही है। आखिर ऐसे में गरीब बच्चों को कैसे मिलेगा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा?????
बनारसी बाबू के साईकिल का पंचर बन चुका था, उन्होंने जाते-जाते बोला क्या मास्टर साहब आप इतना भी नही समझते हैं गरीब का बच्चा अगर सही ढंग से शिक्षित हो जायेगा तो इनलोगों के बच्चों का राजनीतिक करियर खराब नही हो जायेगा।
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८. व्यंग्य // जल्दी मरना है तो पियो ब्राण्डेड दूध
गाँव के चौपाल पर आज रघु काका की बड़ी चर्चा थी। अपनी इकलौती बेटी की शादी उन्होंने क्या धूम-धाम से की थी। गाँव में ऐसा भोज तो मुखियाजी भी अपने बेटी की शादी में नही कर सके थे। रघु काका को गाँव के सभी लोग दिल खोल कर दुआ दे रहे थे।
अंजुमन काका बोले भाई पैसा तो बहुतों को अल्लाह ने दिया है लेकिन रघु बाबू जैसा दिल अल्लाह बहुत कम लोगों को देते हैं।
मन्ती काकी ने भी दोनों हाथ उठा कर आशीष दिया, बोली अरे अंजुमन मियाँ अमीर को तो हर कोई पूछता है, लेकिन गाँव के सब गरीब लोग को भी रघु बाबू उतना ही आदर-सम्मान से निभा दिये। देखना उनकी बेटी भी रानी बन कर रहेगी।
लठैत ने मुखिया जी पर तंज कसा, बोले मुखिया जी का तो, पत्तल पर सामान देख कर ही दिमाग चकरा गया। बोले रघु पगला गया है बेटी की शादी में कोई ऐसे पैसा लुटाता है। अरे भाई मुखिया हो कर सब-समाज के बीच कोई ऐसा बोलता है। जिसका जैसा श्रधा हुआ किया, मदद तो किसी का करेंगे नही, लेकिन कोई बढ़िया अगर कुछो कर रहा है तो टाँग अराने ज़रूर पहुँच जायेगा। तभी मन्ती काकी का बेटा किशन भी बोल उठा, अरे ठग-ठुग के मुखिया बन जाना अलग बात है, और गाँव समाज में इज्जत कमाना अलग बात है। देखते नही हैं, मुखिया जी का बेटा क्या करता है???
गंगुआ ने भी चुटकी ली, बोला "का करेगा, कॉलेज में कृष्ण बने के चक्कर में तीन-चार बार सरकारी ससुराल जा चुका है। कई बार मुखिया जी प्रिन्सिपल का हाथ-पाँव जोड़ कर बेटा को कॉलेज से निकाले जाने से बचाए हैं, और गाँव में डींग हाकेंगे कि मेरा बेटा दिल्ली में ये करता है और ये करके वो बनेगा।
और सबलोग अत्यंत घृणा से अभिभूत हो कर खिलखिला पड़े
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अचानक चौपाल पर मुखिया जी को देख कर सबके होश उड़ गये। आते ही मुखिया जी गुस्सा से तमतमाते हुए बोले "अरे भाई, सौ दिन लूट कर एक दिन गाँव में बड़का भोज करना हो तो हम भी हर साल ऐसा भोज कर सकते हैं।"
मल्लूह काका ने मुखिया जी को समझाया, "अरे मुखिया जी, आप भी कौन गंवार लोगों के मुँह लगते हैं। ई लोग को क्या पता कि रघु कौन-कौन कर्म करता है। यहाँ तो पेट क्या भरा, गधा के तरह खाली ई लोग को चारों ओर हरियाली दिखता है।"
मन्ती काकी ने मल्लूह काका को टोका "बोली बढ़िया आदमी के बारे में मल्लूह ऐसे बोलोगे तो रोटी पर नमक नसीब नही होगा।"
गाँव की औरतें भले कितनी भी अनपढ़ हो लेकिन अक्सर उनकी बातों के मतलब बहुत गम्भीर होते हैं।
मल्लूह काका ने भी बड़ा घुमावदार जवाब दिया। अरे मन्ती भौजी रोटी अगर नसीब हो गया तो नमक तो तुम्ही से माँग लेंगे। और तुम इतनी दयालु हो कि नमक क्या अपना बेटा के हिस्सा दूध भी तुम हमको हांडी से निकाल कर दे दोगी।
मन्ती काकी कुछ बोलती कि उससे पहले मुखिया जी बोल उठे हाँ मल्लूह जी, आप भी सिंथेटिक दूध पी कर किशन के तरह जिंदगी भर डाक्टर का चक्कर लगाते रहियेगा।
"सिंथेटिक दूध" और "किशन की लम्बी बीमारी" की बात सुनते ही चौपाल पर बैठे सभी लोगों का होश उड़ गया
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गँगुआ ने हैरत से पूछा "ए मुखियाजी जो बोलना है खुल कर बोलिये"
मुखिया जी ने अपना ज्ञान बघारने वाले अंदाज़ में बोलना शुरू किया, "अरे भाई रघु मौत का सौदागर है, मौत का सौदागर....., आज तक इस गाँव में कितना आदमी दूध से ज्यादा पानी मिला कर शहर में बेचा है, लेकिन रघु जैसा तरक्की कौन किया है, जरा किसी का नाम बताओ"
लठैत हैरत से बात तो बिल्कुल सही बोलेते हैं मुखिया जी !!!!
मुखिया जी आगे बोलना शुरू किया "अरे रघु कपड़ा धोने वाला सरफ (डिटरजेंट), खेत में डालने वाला यूरिया, मकान रंगने वाला सफेद पेंट, कीटनाशक फोर्मेलीन, और केमिकल मिला कर दूध बनाता है। इसी को बोलते हैं "सिंथेटिक दूध"। जानते हो सिंथेटिक दुध से क्या-क्या होता है:-
अल्सर, पीलिया, बी पी का बीमारी, किडनी और लीवर का प्राब्लम, लीवर कैंसर और बहुत कुछ।
बुढवा लोग कमजोरी दूर करने के लिये दूध पिता है, लेकिन सिंथेटिक दूध तो आदमी का हड्डी ही गला देता है। समय से पहले आँख खराब होना, बाल सफेद होना, दिल और दिमाग कमजोर होना अरे मत पूछो रघु के सिंथेटिक दूध का क्या-क्या फायदा है।
मल्लूह काका ने मुखिया जी को टोका "अरे चलिये मुखिया जी, हम आपसे ही नमक माँग कर खा लेंगे!!!
तभी गंगुआ ने मुखिया जी को टोका "ए मुखिया जी आप इस तरह से बेवजह रघु काका को बदनाम मत कीजिये!!!! अरे ऊ मल्टीनेशनल कम्पनी का पॉकेट वाला दूध बेच कर आगे बढ़े हैं। अगर कोई दोष है तो मल्टीनेशनल कम्पनी वाला का है!!!!!
अब तो मल्लूह काका बिल्कुल बमक गये, "बोले शहर में चार अक्षर पढ़ के बड़का ज्ञानी बनता है!!! अरे बुरबक रघु डाक्टर कहिया से बन गया जो इंजेक्शन का कार्टून का उसको हर सप्ताह ज़रूरत पड़ता है।"
मुखिया जी गाँव वालों को समझाते हुए "अरे गाँव वालों रघु इंजेक्शन से कम्पनी का पॉकेट से ऑरिजिन दूध निकाल कर सिंथेटिक दूध डाल कर गाँव के बढ़िया-बढ़िया डाक्टर-इंजिनियर को मूर्ख बना दिया। तुमलोग कहाँ का विद्वान बने फिरते हो। अगर विश्वास नही होता है तो गाँव के महेंद्र डाक्टर से खुद पूछ लो।
महेंद्र डाक्टर चौपाल पर ही मौजूद था "बोला, भाई हमको माफ करो, लेकिन रघु जी बोले कि गाँव का लोग जल्दी बीमार नही पड़ेगा, और बीमार पड़ेगा तो तुम्हारा भी आमदनी बढेगा। इसलिए हम आपलोग को कुछ नही बताये थे।"
चारों ओर सन्नाटा पसर चुका था। कल रघु काका के बेटी में भोज खा कर जो लोग उनका गुणगान कर रहे थे, उनकी काली करतूत जान कर सभी उतना ही भयभीत थे। दरअसल गाँव में शायद बहुत कम लोग ऐसे थे जिन्होंने रघु काका से सिंथेटिक दूध नही खरीदा हो। गाँव ही क्या इस देश में भी बहुत कम ऐसे लोग हैं जिन्होंने किसी ना किसी रघु काका से जहरीला सिंथेटिक दूध नही खरीदा हो, ऐसा मैं नही 16 मार्च 2016 को केंद्र सरकार खुद कहती है कि भारत का हर तीसरा आदमी किसी ना किसी रूप में जहरीला दूध का सेवन कर रहे हैं। पर पैसे के लिये रघु काका जैसे कुछ लोग इतना गिर चुके हैं कि उन्होंने दूध जैसे अमृत को ज़हर बना दिया है। आज दूध के लिये गाँव में एक फेमस लोकोक्ती प्रचलित है :-
"गाँव में मिलता नही, शहर में बिकता नही"
गम्भीर सन्नाटे को ख़त्म करते हुए रघु काका का भाई जग्गू काका बोल उठे कि ऑरिजिन दूध आजकल के लोग को पचता कहाँ है। हम शहर जब भी ऑरिजिन दूध ले कर गये हैं सब बोलता है कि पौडर डाल कर लाया है लेकिन पॉकेट वाला सिंथेटिक दूध पी कर सबका दिल स्टाइल से बोलता है -"दिल मांगे मोर....,
लठैत ने जग्गू काका को बीच में ही रोकते हुए बोला समझ गये जग्गू काका, हमलोग बिल्कुल समझ गये
"जिनको जल्दी मरना है, तो पियो ब्राण्डेड दूध"
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९.व्यंग्य // बिजली बिल करेगा टैक्स चोरी का जासूसी
मल्लूह काका विश्व का नम्बर वन अखबार "दैनिक जागरण" पढ़ रहे थे। सात अप्रैल 2017 का पुराना अखबार था, तभी गँगुआ बगल से गुजरा बोला "ए मल्लूह काका, क्या आप पुराना अखबार पढ़ रहे हैं। कल हम ही तो फेंक के गये थे।
मल्लूह काका ने डाँटते हुए बोला "धत्त बुरबक , अखबार पुराना है तो क्या हुआ, न्यूज़ देखता नही है कितना नया है!!!!"
लठैत भी वहीं खड़ा था "बोला का हुआ हो मल्लूह काका आठ महीना से जो हमलोग का ट्रांसफार्मर गाँव वाला खराब है, ऊ ठीक होने वाला है क्या ??? साला फेंकना और ओकर माय ढेर दिन से टी.बी. नही देख पाया है!!!! हम भी डी.डी.वन पर फिल्म और रंगोली देखते थे। सबका सत्यानाश हो गया है!!!!
गँगुआ ने लठैत को डांटा "भक्क बुरबक, हम्मर मोबाइल चार्ज के बगेर खराब हो गया और तुमको रंगोली और फिल्म सूझता है। अरे कितना शौक से मोबाइल लिये थे लेकिन जब से ट्रांसफार्मर खराब हुआ है बच्चा के खेलने वाला खिलौना बन कर रह गया है। शुरू में दो-चार दिन मुखिया जी के यहाँ जेनेटर पर चार्ज करने गये तो एक दिन मुखियाइन गुस्सा कर बोली कि का रे गँगुआ रोज़-रोज़ कौन तमाशा लगा के रख दिया है। जेनेटर में डीजल जलता है। मोबाइल चार्ज करना है तो रोज़ बीस रुपया देना होगा!!!
हम्मर मेहरारू मुखियाइन से झगड़ा करने चल गयी, जा कर बोली का हो मुखियाइन तनको शर्म नही आता है जो अप्पन जेनेटर के डीजल का सब खर्चा मोबाइल चार्ज करे वाला से वसूलना चाहती हो!!!! तब जानता है लठैत, मुखियाइन क्या बोली??? बोली कि एतना दाम का जेनेटर पूरे गाँव का मोबाइल चार्ज करने के लिये मुखिया जी नही खरीदे हैं। जेनेटर चलता है तो खाली डीजल ही नही जलता है, उसका इंजन भी खीयाता है, उसका चार्ज के देगा???
क्या बातायें मल्लूह काका!!!! हमार मेहरारू को एतना गुस्सा आया कि घर आ कर मोबाइल हम्मर सामने में पटक दी। मेरा तो सब अरमान ही ख़त्म हो गया !!!!"
एतना सुनते ही सबके मुँह से अनायास ही ठहाका निकल पड़ा.....
😅😅😅😅😅😅😅😅😅😅😅😅😅😅😅😅
मल्लूह काका ने सबको चुप करते हुए बोला "अरे ई एकदम नया न्यूज़ हम आज पढ़ रहे हैं। सरकार अब होल्डिंग टेक्स चोरी रोकने के लिये नगर विकास एवं आवास विभाग को निर्देश दिया है कि होल्डिंग टेक्स वसूलने में बिजली बिल को आधार बनाये। दरअसल नगर परिषद और नगर पंचायत क्षेत्र में व्यापारी लोग होल्डिंग टेक्स घरेलू दर से चुकाता है लेकिन बिजली बिल शहरी दर से....। अब इस कानून से जो भी व्यापरी आवासीय परिसर में दुकान चलायेगा, ऊ लोग का अब खैर नही है। इस कानून को लागू करने का आदेश मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद ही दिये हैं......।
नीतीश कुमार का नाम सुनते ही गँगुआ को गुस्सा आ गया, बोला "यही सुशासन बाबू पंद्रह अगस्त 2012 को गाँधी मैदान में बोले थे कि जब तक बिहार के प्रत्येक गाँव में बिजली नही पहुँच जायेगा, मैं बिहार की जनता से वोट नही माँगुगा। बिजली तो नही पहुँचा, वोट माँगे खातिर फुल में तीर मार कर लालटेन से दोस्ती कर लिये। जब लोग के शहर में भी शहर के तरह बिजली नही मिलेगा तो होल्डिंग-टेक्स और शहरी रेट से बिजली बिल का भुगतान करने के लिये सुशासन बाबू कौन मुँह से बोलते हैं।
लठैत गँगुआ से बोला , अब एक बात जानता है सरकार जो है बिजली नियम से दे या नही दे बिल सख्ती से वसूलने के लिये प्राइवेट कम्पनी को लगा दिया है। सरकार का कहना है कि शहर में कम से कम अठारह घंटा और गाँव में बारह से चौदह घंटा बिजली देंगे। साथ ही कोई भी ट्रांसफार्मर अगर खराब होता है तो बहत्तर घंटा के अंदर ठीक करवायेंगे। अगर सरकार ऐसा करने में असफल हो जाती है तो बिजली बिल किस चीज़ का....। लेकिन तुम देखो आठ महीना से ट्रांसफार्मर खराब है, उसके बारे में पूछने वाला कोई नही है लेकिन बिजली बिल हर महिने एकदम टाईम से फाइन जोड़ कर प्राइवेट कम्पनी वाला भेज देता है।
तभी उधर से गाँव के स्कूल का हेड मास्टर शुशील बाबू गुजर रहे थे। उनलोगों की बात सुन कर बोले कि अरे का बातायें आपलोग को स्कूल में आठ गो कंप्यूटर भेज दिया है और बिजली का ठिकाना ही नही है। सब कंप्यूटर में रखले-रखले जंग लग जायेगा तो सरकार हमसे स्पष्टीकरण मांगेगी। इधर गाँव का लड़का सब अलगे कंप्यूटर सीखने के लिये माथा खाये रहता है। अरे शाम में उत्प्रेरण केंद्र का बच्चा जो लालटेन जला कर पढ़ता है उसका पैसा तो सरकार देती ही नही है और ई लोग जेनेटर जला कर कंप्यूटर चलाने बोलता है। हम करें तो क्या करें। साला मास्टर तो हर तरफ़ से जाता है.....!!!
बनारसी काका ने शुशील बाबू को समझाया "अरे आपका तो सरकारी समान है, हम जो एतना महँगा बिजली वाला मोटर और पम्प सेट लाये हैं उसका का होगा सोच-सोच कर दिमाग खराब है। बिजली अगर समय से मिले तो देश के कितना किसान आत्महत्या नही करेगा।
तभी गँगुआ बोला "देखिये बिजली नही मिल पाने में सिर्फ सरकार का ही दोष नही है। अपने गाँव में ही जितना कन्जूमर है उससे ज्यादा तो चोरी से जलाने वाला है। अब लठैत को ही देखिये जब तक लाइन रहेगा इसका टी.बी. बल्ब और पंखा बंद होता ही नही है।"
लठैत ने बीच में टोका कि "अरे स्विच खराब है...., तुमको कितना बार समझाये हैं!!!"
मल्लूह काका ने सबको डाँटते हुए बोला कि अपना-अपना गलती तो कोई मानोगे नही। बिजली आयेगा तो भर-मन बरबाद करोगे लेकिन नही आयेगा तो सरकार को दोष दोगे। अरे भाई सरकार बिजली पर बहुत पैसा सब्सिडी देती है। सरकार तुमसे बिजली का कीमत थोड़े लेती है, ऊ तो तुम्हारे घर के पास पोल और तार जो लटक रहा है उसी का हर महिने बिल आता है। अब रहा बात ट्रांसफार्मर ठीक कराने का तो गाँव का सब लोग दो-दो सो चंदा लगा कर मेरे पास जमा करो, देखो हम अपना पैरवी से काम कराते हैं कि नही.....!!!!
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१०. व्यंग्य // हम तो अनाथालय के शिक्षक हैं : नियोजित शिक्षक
मध्यावधि चुनाव का समय था। अचानक लम्बी बीमारी के कारण विधायक जी की मौत हो जाने से यह सीट खाली हो गया था। नेताजी गाँव के चौपाल पर भाषण दे रहे थे :-
"मुफ्त किताब, दोपहर में हर दिन बदल-बदल कर मध्याह्न-भोजन, सभी छात्र-छात्राओं को पोशाक, छात्रवृति, साईकल, सैनेटरी-पैड अब सरकारी विद्यालय में बच्चों को क्या नही मिलता है।"
यह सब हमारे सुशासन का ही तो देन है। इनता ही नही गरीब से गरीब बच्चा को भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलता है। आपके बच्चे का सुंदर भविष्य बनाने के लिये हमारे सुशासन में बहुत कुछ हो रहा है.....
तभी बीच में ही गाँव के हेडमास्टर निखिल बाबू बिल्कुल बिगड़ गये। बोले ए नेताजी आपके सुशासन का सबसे बड़ा खासियत जानते हैं :-
"समाज और देश के भविष्य को बनाने वाला मास्टर को समय से वेतन नही मिलता है। आठ-आठ महीना बिना वेतन के सरकारी मास्टर लोग को किराना दुकान में राशन नही मिलता है। अरे राशन क्या कंट्रोल में खाली सरकारी मास्टर होने के कारण हमलोग BPL और किरासन नही मिलता है। बिना राशन-किराशन वाला घर में जब सरकारी मास्टर लोग शाम में पहुँचता है, तो बिना सौ -बात सुनाये बीबी के हाथ का भोजन नही मिलता है। अरे घर में जब कई बार टेंशन बहुत बढ़ जाता है, तो सरकारी मास्टर का बच्चा लोग अप्पन माय को जा कर बोलता है, ए माय हम पढ़-लिख के ई मास्टर वाला नौकरी एकदम नही करेंगे।"
नेताजी निखिल बाबू के इस प्रकार सार्वजनिक विरोध से बिल्कुल तिलमिला गये, लेकिन चुनाव का समय था, इसलिये गुस्सा करने से नुकसान हो सकता था। राजनीतिक दाव खेला, दोनों हाथ जोड़ कर दंडवत प्रणाम करते हुए बोले:-
गुरु गोविंद दोनों खड़े,
काकौ लागू पाऊँ,
बलिहारी गुरु आपनो,
गोविंद दियो बताय....."
अरे भाई आपलोग थोड़ा धैर्य रखीये। अपना प्रदेश एक बीमारू राज्य है, आपलोग के त्याग और बलिदान के बल पर जब एक-एक गरीब का बच्चा पढ़-लिख कर बड़ा आदमी बनेगा तो लाखों गरीब बच्चे और उसके माता-पिता भी इसी प्रकार दंडवत होकर आपको प्रणाम करेंगे।
अविभावक के द्वारा सम्मान की बात पर तो मास्टर साहब बिल्कुल उखड़ गये। बोले ए नेताजी आपलोग थोड़ा नौटंकी कम ही कीजिये तो ठीक होगा, पिछले बार जब आपलोग को वोट लेना था तो सब विद्यार्थी को धरल्ले से छात्रवृति बँटवा दिये जबकि उसके बाद 75% अटेन्डेनस का लोचा लगा दिये। यही जो लठैत है बुढवा मास्टर का कपार फोड़ने के लिये तैयार हो गया था, अरे भाई छात्रवृति पढ़ने वाला तेज बच्चा को मिलता है तो सरकारी धन का उपयोग होता है, ई क्या सरकार में आते ही सरकारी धन का लूट मचा दिये हैं। अरे भाई , छात्रवृति वाला पैसा का रिपोर्ट बनाने से लेकर बाँटने तक हर हमेशा स्कूल में रोज़ एक से एक नया बखेरा होता है। इस पैसा से विद्यार्थी का माई-बाप मेला घूमता है, मछली-मुर्गा खाता है, स्टेंडर्ड का कपड़ा खरीदता है, लेकिन बहुत कम ही माय-बाप है जो स्कूल-ड्रेस सिलवाता होगा या बच्चा को कोई किताब खरीद कर देता होगा। अरे भाई ई लोग से हमलोग को कोई इज्जत नही चाहिये, बस हमलोग को शांति से काम करने दें और स्कूल में बात -बात पर राजनीति नही करें, यही बहुत है।
नेताजी का दाव उल्टा पड़ गया था, लेकिन उन्होंने एक बार फिर से स्थिति सम्भालने का प्रयास किया। बोले "आपलोगों को शत-शत प्रणाम। यही त्याग और दिन-रात परिश्रम करके भी किसी चीज़ की ईक्षा नही रखना ही तो मास्टर साहब आपलोग की महानता है।"
निखिल बाबू ना जाने फिर क्यों नाराज हो गये। बोले आपलोग कौनो भ्रम में नही रहिये!!!! समान काम का समान वेतन हमलोगों का कानूनी हक है और ऊ तो देना ही होगा और शिक्षको को वाजिब मान-सम्मान दिये बगेर आपलोग शिक्षा विभाग के उपलब्धि का ढोल पीटना हर जगह बंद कीजिये। पीटने पर याद आया कि जब मास्टर लोग अपना वाजिब हक के लिये आंदोलन करता है तो आप उसको सड़क पर पिट्वा कर कौन सा बहादुरी दिखाते हैं। क्या हमलोग गुंडा हैं?? अरे भाई अगर मास्टर का भविष्य बढ़िया नही होगा तो समाज और देश का भविष्य कैसे बढ़िया होगा????? लोगों को बेवकूफ बनाना आप बंद कर दीजिये।
नेताजी को गुस्सा आ गया। "बोले नियोजित मास्टर हो औकाद में रह कर बात करो।"
बस फिर क्या था निखिल बाबू जोर-जोर से ताली बजाते हुए ठहाका लगाने लगे। यही नेताजी आपका असली रूप है, आप रंगा सियार बन कर पब्लिक को बेवकूफ नही बनाइये। जिस तरह आप अभी मास्टर लोग को दंडवत प्रणाम कर रहे थे और तुरंत ओकाद में रहने का नसीहत देने लगे, उसी प्रकार जब पब्लिक का वोट ले लेते हैं तो पब्लिक का भलाई का बात आपको कम और अपना भलाई का बात आपको ज्यादा याद रहता है।
फिर तो चारों ओर से तालियां बजने लगी।
निखिल बाबू ने गाँव वाले को समझाया कि जब भी कोई आम आदमी अपना वाजिब हक माँगता है, हमारे देश के नेता लोग उसे ना जाने क्यों ओकाद में रहने की नसीहत देने लगते हैं, यही हमारे लोकतंत्र का दुर्भाग्य है। जनता हर पाँच वर्ष पर अलग-अलग लोगों द्वारा मूर्ख बनती रहती है, ईसलिए आपलोग चुनाव के टाईम पर नेता जी से इज्जत पा कर खुद को ज्यादा खुशनसीब समझने की गलती नही करें।
निखिल बाबू की बातें सबको बिल्कुल सच लग रही थी। लठैत ने तो निखिल बाबू की जय.... , निखिल बाबू की जय..... के नारे लगाना शुरू कर दिया। सभी गाँव वाले भी उसका साथ दे रहे थे।
तभी निखिल बाबू ने सबको शांत करते हुए बोला, भाइयों शांत हो जाओ मुझे ये शोहरत और वाहवाही नही अपने बीबी बच्चों का सुरक्षित भविष्य चाहिये। आपलोगों के बच्चे का भविष्य हमलोग बनाते हैं, आप अपनी सरकार से सिर्फ इतना बोल दीजिये कि हमें समान काम का समान वेतन दे दें और ढोल पीट कर शिक्षकों का वेतन देने की परम्परा समाप्त करें। सभी लोग भावुक हो गये लेकिन तभी नेताजी गुस्सा से पैर पटकते हुए चले गये। निखिल बाबू भी जाने लगे, लेकिन जाने से पहले उन्होंने गाँव वालों को सिर्फ इतना बोला कि आज सरकारी स्कूल को कुछ लोग अनाथालय बना देना चाह रहे हैं, जहाँ गरीब बच्चों को चाहे जितना खैरात मिल जाता हो एक शिक्षक और उसके परिवार का भविष्य बिल्कुल अनाथ है......
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११. व्यंग्य // कौन संविधान कहता है कि हम गंदगी नही फैला सकते हैं.....????
मल्लूह काका चौपाल पर अपना राजनीतिक ज्ञान झाड़ रहे थे "बोले ए भाई भारत जैसा इतना बड़ा देश में सरकार और सरकारी कर्मचारी को कोई काम नही है, क्या ??? साला सब लोग एगो झाड़ू ले कर जमा हो जाता है, और कभी सड़क पर झाड़ू लगाने लगेगा, कभी स्कूल के मैदान में, कभी स्टेशन पर , कभी कौनो मंदिर केम्पस में, कभी किसी नदी घाट पर, कभी कौनो सरकारी कार्यालय में!!! ई अजीब नौटंकी है भाई। अरे जिसका जो काम है वही अगर मन से कर दो तो देश का झमाझम विकास हो जायेगा। अब आप ही बताईये मुखिया जी ई दरोगा साहब का काम है झाड़ू लगाना, अरे मरदे का दरोगा, का बी.डी.ओ. , का सी.ओ. , का एस.पी., का डी. एम., एतने समझ लीजिये कि एगो संतरी से लेकर बड़का से बड़का मंत्री तक सबका वही हाल है!!!!"
मुखिया जी ने सहमति जताते हुए बोला कि एकदम ठीक बोलते हैं मल्लूह जी!!!! अरे ई कोई तरीका है कि सब लोग मिल के सड़क पर झाड़ू लगाईये और बड़का-बड़का फोटो अखबार में छपवा कर फोकटिया वाहवाही लूटिये!!! इससे देश और पब्लिक का कौन सा भला होगा ??? आज तक हमको समझ नही आया। अरे भाई सब लोग का अपना काम है, अपना काम तो ढंग से निपटाया पार नही लगता। सारा दिन ऑफिस में पान और रजनीगंधा चबा कर कुर्सी के बगल में ही थूक देंगे और फोटो खिंचाने के लिये खूब बढ़िया कपड़ा पहन कर सफाई करने का नौटंकी करेंगे।"
लठैत भी कहाँ चुप रहने वाला था। बोला जानते हैं जिस जगह ई लोग सफाई का नाटक करता है, आप अगले दिन अगर वहाँ चले जाइये तो आपको सब दिन से ज्यादा वही जगह गंदा दीखाई पड़ेगा। कहीं नाश्ता का जूठा पॉकेट... कहीं पानी का बोतल.... कहीं खाना का थैली.... अरे मत पूछिये देख के मन भिनक जायेगा। मन करेगा कि साला ई लोग अगर कल झाड़ू पकड़ के यहाँ सफाई नही करता तो आज यहाँ एतना गंदा नही रहता।
मुखिया जी ने ठहाका लगाते हुए बोला "बिल्कुल सही बोल रहा है लठैत!!! एक बार तो हम ब्लॉक के चपरासी मैकू को इसी बात पर डांटे तो जानता है मैकूवा क्या बोला??? बोला क्या करे मुखिया जी कल हम खूब बढ़िया से सफाई किये थे, लेकिन साहब लोग खूब डाँटने लगे!!!! हमको बोले अरे मूर्ख-गंवार जब पुरा ब्लॉक जानता है कि यहाँ आज विधायक जी "स्वच्छ भारत अभियान" का प्रोग्राम करने वाले हैं तो एतना सफाई करने का क्या ज़रूरत था??? आगे मैकूवा बताया कि कुछ साहब लोग तुरंत बहरना फेकने वाला टोकरी ले कर गया और जहाँ हम कचरा फेंक कर आये थे, वहाँ से भर टोकरी कचरा उठा के ले आया और पुरा ऑफिस में छिरिया दिया। मैकू बोला क्या बताये मुखियाजी हमको तो कुछो समझ में नही आ रहा था कि तभी विधायक जी बीस-पच्चीस आदमी के साथ अप्पन गाड़ी से उतरे!!!! सबके हाथ में एकदम नया-नया झाड़ू था। ऊ लोग के साथ मिल कर ऑफिस का सबलोग पुरा ऑफिस में झाड़ू लगाया, अरे ऑफिस क्या सड़क और ई आगे वाला मैदान में भी सब मिलकर खूब झाड़ू लगाया, हमको तो अंदर से बड़ा खुशी हो रहा था।
मुखिया जी ने आगे बताया कि जब मैकूवा से पूछे कि तुम काहे खुश था रे लंपट तो जानता है लठैत, मैकूवा क्या बोला ??? बोला कि अरे मुखिया जी ई सामने वाला मैदान में हजारों आदमी सुबह-सुबह लोटा ले कर जाता है। ऐसन जगह पर तो हम भी झाड़ू नही लगायेंगे जहाँ कल ब्लॉक के सब बाबू लोग झाड़ू लगाया है। मैकूवा खुशी से झूमते हुए बोला कि सच मुखिया जी हमको तो कल लगा रहा था कि केकरो अच्छा दिन आया हो ना आया हो, ऑफिस में झाड़ू-बहारू करने वाला का अच्छा दिन तो जरूर आ गाया है और इसके लिय हम मोदी जी के दिल से शुक्रिया देते हैं। लेकिन साला आज हम जान कर लेट आये तो देखे कि ऑफिस सब दिन से ज्यादा गंदा है और ऑफिस में झाड़ू लगाने के लिये भी कोई तैयार नही है। अभी बड़ा बाबू मिले तो बड़ा बेशर्म के तरह पान का पीक फेंकते हुए बोले, कि का रे मैकूवा एतना लेट आयेगा तो ऑफिस का सफाई का तुम्हारा बाप करेगा???
मैकूवा बोला कि "हम बड़ा बाबू को बातायें कि हम्मर बाबू जी तो मर गये हैं।"
तो बड़ा बाबू और गुस्सा कर बोले कि अरे मर तो साला कल हमलोग गये, ई स्वच्छ भारत अभियान के चक्कर में साला कौन-कौन आदमी के सुबह वाला गंदा हमलोग साफ किये हैं। कल से ई खाना भी नही धँस रहा है, और तुम्हारा तो फुटानि अलगे बढ़ गया है, जा के जल्दी से सफाई करो और सब लोगों को समझा देना कि कल से सामने वाला मैदान में लोटा ले कर नही जायेगा!!! क्या पता फिर कौन दिन सांसद साहब का प्रोग्राम हो जाये और फिर सबका सुबह वाला गंदा फिर से साफ करना पड़ जाये!!!
इतना सुनते ही चौपाल पर बैठे सभी लोग खिलखिला कर हँस पड़े।
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गंगुआ ने सबकी हँसी रुकते ही बोला "और ई बाबू लोग गरीब आदमी का शौचालय वाला पैसा घूस के चक्कर में दबा कर रखे। एकदम मोदी जी सही किये हैं। अरे भाई जब गरीब लोगों का शौचालय बाबू लोग नही बनने देगा तो गरीब लोग मैदान में जायेगा ही, अब स्वच्छ भारत अभियान के बहाना ही सही, बाबू लोग जब गरीब आदमी के सुबह वाला गंदा सड़क और मैदान पर साफ करेंगे तो ई लोग घूम-घूम के गरीब आदमी का शौचालय जरूर बनवायेगा।
और एक बार फिर से चौपाल पर हँसी का फव्वारा फूटने लगा
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बनारसी काका सबकी बात सुन रहे थे। बोले "अरे भाई मोदी जी तो गंदगी के विरुद्ध जागरूकता अभियान लाना चाहते हैं लेकिन सरकारी मशीनरी का आदत ही खराब है। सरकार कितना भी बढ़िया योजना ले कर आये, उसका मजाक बनवा कर रख देता है। काम जमीन पर हो या नही हो बस कागज पर काम हो जाना चाहिये। यही अपने देश का दुर्भाग्य है।
गंगुआ ने बनारसी काका के सुर में सुर मिला कर बोला कि बिल्कुल सही बनारसी काका, सफाई हर आदमी का कर्तव्य है। इससे ना सिर्फ आदमी स्वस्थ रहता है बल्कि स्वस्थ रह कर डाक्टर के चक्कर में नही पड़ने से हमारा पैसा भी बचता है। शास्त्र भी कहता है कि जहाँ सफाई रहता है वहीं भगवान भी वास करते हैं।
तभी मन्ती काकी पूजा की थाली ले कर मंदिर की ओर जा रही थी।
मल्लूह काका ने टोका "का भौजी तुम्हारा बकरी मंदिर का पुरा बरामदा भेनारी से घिना दिया है, पहले उसको साफ तो करो तब भोला बाबा का पूजा करना!!!"
मन्ती काकी का पूजा के समय मल्लूह काका का इस तरह टोकना ठीक नही लगा, गुस्सा से बोली हम कौनो तोहार गुलाम नही हैं। थोड़ा बातचीत तमीज से किया करो। नही तो अप्पन बेट्वा किशन को बोल कर हाथ-पाँव तोड़वा देंगे। मन्ती काकी ये बोल कर तो चली गयी लेकिन चौपाल पर सन्नाटा छा गया।
काफी देर बाद बनारसी काका बोले इस देश में लोग आजादी के नाम पर क्या-क्या नही कर रहे हैं। कोई अपने घर का सारा कचरा सुबह में सड़क पर फेक रहा है। सड़क पर घर के बच्चों से लोग शौच करा रहे हैं। घर का गंदा पानी खुले में बहा कर जहरीला मच्छर-मक्खी को फैला रहे हैं। पिकनिक मनाने जायेंगे तो ट्रेन-स्टेशन से लेकर पर्यटनस्थल को कूड़ा का अड्डा बना रहे हैं। इसी गंदगी के कारण ही देश के लोग अनेकों भयानक बीमारी का शिकार हो कर सरकारी हॉस्पिटल की व्यवस्था को नष्ट कर रहे हैं। खुद तो गंदगी फैलाने की आदत सुधारेँगे नही और बोलेंगे सरकार नही सुधरने वाली है।
तभी लठैत बोला "इसका मतलब योगी जी मुख्यमंत्री बनते ही सरकारी ऑफिस में पान-गुटका खाने पर पाबंदी लगा कर सही किये हैं"
गंगुआ ने समझाया "हाँ रे लठैत, योगीजी भी ठीक किये हैं और मोदीजी भी ठीक किये हैं लेकिन जब तक एक एक देशवासी सफाई के लिये अपने स्तर से प्रयास नही करेगा तो इस देश में किसी सरकारी योजना से सफाई का कुछ नही होने वाला है"
तभी मन्ती काकी पूजा करके लौट रही थी। उन्हें देखते ही मल्लूह काका बोले कि यही बात अगर अभी तुम मन्ती भौजी को समझाने जाओ तो उल्टे तुमसे पूछेगी कि ढेर पढ़ लिया है, बताओ भारत का कौन सा संविधान कहता है कि हम गंदगी नही फैला सकते.....????????
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१२. व्यंग्य // अब सियासत ने पाल ली है गायें; आदमीयत ने ख़ुदकुशी कर ली है.....!!!!
मल्लूह काका आज सुबह से ही बहुत ही खुश थे। मल्लूह काका ने लठैत को देखते ही टोका "सुना रे लठैत, अब अप्पन गाय-माता का बढ़िया दिन आ गया है!!!" लठैत का मल्लूह काका से ज्यादा बनता नही था, सो वो उनसे ज्यादातर परहेज़ करके ही चलता था। लठैत ही क्या गाँव का शायद ही कोई ऐसा आदमी हो, जो मल्लूह काका के जाल में फँस कर अपना धन और किमती समय के साथ-साथ मानसिक शांति का नुकसान नही झेला हो। किसी ने ठेकेदारी के लिये पैसा दिया, किसी ने अपने जमीन के केश की पैरवी के लिये, किसी ने के.सी.सी. लोन पास कराने के लिये, कोई अपने बच्चे के मेट्रिक का कॉपी का पैरवी के लिये, कोई ब्लॉक से जाति-आवासीय बनाने के लिये, तो किसी ने इन्द्रा आवास के लालच में, तो कोई वृद्धा पेंशन के उम्मीद में, कई बेरोजगार युवा ने मास्टर और अन्य नौकरी के लिये तो किसी ने किसी और काम के लिये......, फेहरिस्त बहुत लम्बी है, बस इतना समझ लीजिये कि आलराउंडर दलाल टाइप के आदमी थे !!!
गाँव-समाज में ऐसे लोगों की बहुत इज्जत होती है। हर तरह के वक्त-बेवक़्त में ऐसे ही लोग गाँव का नेतृत्व करते हैं, इसी कारण कई-कई बार अलग-अलग ढंग से ठगे गये लोग भी खुल कर ना तो इनका विरोध करते हैं, और ना ही ऐसे लोगों से रिश्ता खराब कर बेवजह मुसीबत मोल लेने की गलती करते हैं। हाँ, ऐसा नही कि मल्लूह काका ने सिर्फ लोगों को ठगा ही हो, अपने शरण में आये करीब दस फीसदी लोगों के वो मुसीबत में काम भी आये हैं, अब आजकल कोई किसी के लिये बेवजह कहाँ अपना समय और दिमाग खराब करता है!!! सो वो अपना वाजिब मेहनताना, (जिसे आजकल कुछ पढ़े-लिखे लोग दलाली भी कहते हैं) अवश्य लेते थे, और डंके की चोट पर लेते थे!!! हर तरह के काम के लिये उनका एक रेट फिक्स था, जिसे वो हमेशा अड्वान्स में ही ले लेते थे लेकिन कई बार किसी के मजबूरी पर तरस खा कर, अपना मेहनताना बाद में भी लेने को तैयार हो जाते थे लेकिन ऐसे में अगर किसी ने जरा भी होशियारी की तो उस पर मानो मुसीबतों का पहाड़ टूटना तय था। इसलिए लोग अपना बहुत कुछ लूटा कर भी अक्सर सामने पड़ जाने पर उनकी बहुत इज्जत करते थे। ये अलग बात है कि पीठ-पीछे लोग दबी जुबान ही सही पर अपना भड़ास निकालने के लिये दुनियाँ का शायद ही कोई ऐसा अपशब्द हो जिसका इस्तेमाल मल्लूह काका के लिये नही करते हों!!! ऐसा नही कि मल्लूह काका को इसकी जानकारी नही होती थी, पर जब कोई उनका शुभचिंतक उन्हें इसकी सूचना देता तो वो बड़े उदार हो कर बोलते कि अरे भाई !!! इस दुनियाँ में तो लोग महात्मा गाँधी को भी गाली देते हैं, तो महात्मा गाँधी कोई बुरे आदमी थोड़े हो गये। नीच-बुद्धि के लोग ऐसा करते रहते हैं, लेकिन क्या इससे महात्मा गाँधी के महानता में क्या कोई कमी आई जो किसी के पीठ पीछे गाली देने से मेरा मान-सम्मान कम होगा। अभी सामने वो शख्स आ जाये तो तुम देखना किस तरह हाथ-जोड़ कर प्रणाम करेगा। वैसे भी यह कलयुग है, आप किसी का कितना भी भलाई क्यों ना कर दो, पीठ-पीछे वो आपको गाली देगा ही, अतः निश्चिंत हो कर अपना काम करने पर ध्यान लगाओ!!! ठीक वैसे ही जैसे मैं बिना किसी चिंता के समाज-सेवा में निरंतर खुद को समर्पित रखता हूँ!!!
मल्लूह काका का लगभग हर तरह के राजनीतिक लोगों से भी बढ़िया सम्पर्क था, सबसे बड़ी खासियत उनकी यह थी कि पंचायत से लेकर लोकसभा तक चाहे जो भी जीते, वो उसी की ना सिर्फ प्रशंसा के पुल बाँधने में माहिर थे बल्कि जीते प्रत्याशी को वो इस बात का पुरा-पुरा विश्वास भी दिलाने में सफल रहते थे कि उनकी जीत में मल्लूह काका ने बहुत बड़ा योगदान दिया है। उनके मोटर-साइकल पर किसी भी चुनाव में रोज़ अलग-अलग प्रत्याशी का झंडा और बेनर दिख जाना मामूली बात है, और कोई भी प्रत्याशी अंत तक यह समझ नही पाता था कि आखिर वो किसका चुनाव प्रचार कर रहे हैं। हाँ रिजल्ट के तुरंत बाद उनका स्टेंड बिल्कुल क्लियर होता था और इसलिए सभी छोटे-बड़े नेता उन्हें राजनीति का माहिर खिलाड़ी मानते थे।
दरअसल मल्लूह काका जैसे लोगों की इस भारत देश में कोई कमी नही है। भारतीय लोकतंत्र का मजाक उड़ाने में मल्लूह काका जैसे धूर्त लोगों की अहम भूमिका रही है। आम जनता हर चुनाव में बार-बार ऐसे नकाब-पौष लोगों को पहचानने की कोशिश करता है, कई बार ऐसे लोगों को आम जनता ने जम कर सबक भी सिखाया है लेकिन जन-प्रतिनिधी के पोस्ट की गरिमा ही कुछ ऐसी है कि आजादी के इतने दिनों बाद भी भारत का आम आदमी खुद को ठगा महसूस करता है। चुनाव के समय हर बार ये आम-आदमी इस उम्मीद में मतदान करता है कि अबकी उसकी किस्मत जरूर बदलेगी लेकिन सत्ता और शक्ति के केन्द्र चाहे जितनी बार बदल गये हों, जमीन पर उनका संचालन मल्लूह काका जैसे लोगों के हाथ में ही रहता है और यही कारण है कि आज भी केन्द्र से चलने वाला पैसा जमीन पर आते-आते अपनी तीन-चौथाई उपयोगिता खो चुकी होती है। सूचना का अधिकार आया, भ्रष्टाचार को रोकने के लिये एक से एक कठोर कानून बने,जन-लोकपाल के लिये कुछ कथित ईमानदार लोगों ने बड़े-बड़े आंदोलन किये लेकिन ना तो एक आम आदमी की किस्मत बदली और ना मल्लूह काका जैसे लोगों के रुतबा और शान-शौकत में कोई कमी आई !!!!
लठैत अपने नाम के अनुसार बिल्कुल सीधी बात करता था और मल्लूह काका का सुबह-सुबह उसे इस तरह टोकना बिल्कुल भी अच्छा नही लगा। गुस्सा से बोला "क्या हुआ हो मल्लूह काका!!! सुबह-सुबह काहे बौराईल हैं???? गाँव में कोई गौशाला खुलने वाला है क्या या लालू जी बिहार में फिर से चरवाहा स्कूल शुरू करने वाला हैं ???"
मल्लूह काका ने उन्हें टोका "धत्त बुरबक!!! चरवाहा स्कूल से किसका फायदा हुआ तुम्ही बताओ तो, जो हम चरवाहा स्कूल के फिर से खुलने से एतना खुश होंगे!!! गाँव में गौशाला खुले के अभी बात मत करो, काहे कि खोलने वाला एक समय था,जिस समय नीतीश कुमार को काम करने का मन था तो सब पंचायत में शराब दुकान खुलवाए थे कि नही, अभी उनका पुरा फोकस बंद करने पर है!!! सबसे पहले शराब बंद करवाये, नशा को भी पुरा बंद करवाने का बात चल रहा है!!! स्कूल, कॉलेज और आँगनबारी में कोर्ट के आदेश "समान काम का समान वेतन वाला" माँग नही मान कर पढाई-लिखाई भी पूरे बिहार में पहले से बंद है। केन्द्र-सरकार बिहार को वाजिब पैसा नही दे रहा है, इसलिये बिहार में विकास काम भी साफ बंद है। बेरोजगार लोगों के लिये लगभग सब विभाग में सरकारी वेकेंसी भी बंद है। देखा-देखी मोदी जी भ्रष्टाचार बंद करने के लिये पुराना नोट बंद कर ही दिये। लेकिन सबसे बड़का काम तो योगी किया है!!!"
लठैत झल्लाते हुए "ए काका, अब ई योगी कौन है हो??? ई योगी जी क्या बंद कर दिये???"
मल्लूह काका समझाते हुए "अरे बुरबक, एकदम गंवार है तुम!!! अरे योगी जी यू.पी. के नया मुख्यमंत्री हैं, और शपथ लेते ही सबसे पहले गाय काटे पर पाबंदी लगा दिये हैं!!! तब ही ना हम तुमको बोले कि गाय-माता का बढ़िया दिन आ गया, लेकिन पढ़ने के टाईम में तो तुम स्कूल छोड़ कर गुल्ली-डंडा खेलने में जिंदगी बरबाद कर दिया!!! हम भी भैंस के आगे बीन बजा कर अपना माथा खराब कर रहे हैं !!! जो अप्पन काम कर, फालतू सुबह-सुबह माथा नही खाओ !!!
मल्लूह काका का ये व्यवहार लठैत को बिल्कुल अच्छा नही लगा। गुस्सा में तमतमाते हुए बोला "ए मल्लूह काका ज्यादा अपना ज्ञान मत बघारिये!!! हमको भी पता है कि आप कितना बड़ा ज्ञानी हैं !!! अप्पन बूढ़ी माय को तो दोनों टाईम ढंग से खाना देवे नही करते हैं!!! और हमको यू.पी. का ख़बर सुना रहे हैं कि गाय माता का बढ़िया दिन आ गया!!! अरे आप ढेर ज्ञानी हैं तो हमको पहले ई न बताईये कि आपका अप्पन बुढ़ी माँ का बढ़िया दिन कब आयेगा ??? बड़ा ज्ञानी बनते हैं !!!
मल्लूह काका लठैत से सीधे भीड़ना मुनासिब नही समझते थे। इसलिए अपमान का कड़वा घुट पी कर रह गये।
लठैत भी अपनी मोटी लाठी पटकते हुए अपने खेत की ओर चला गया।
अभी लठैत कुछ ही दूर चला था कि सामने से गँगुआ आता दिखा। गँगुआ को लठैत ने सारा हाल कह सुनाया।
गँगुआ मुस्कुराते हुए बोला "अरे लठैत, ई तो बढ़िया बात है कि योगी जी गाय मारने पर पाबंदी लगा दिये। मुस्लिम भाई लोग को भी चाहिये कि अप्पन हिन्दु भाई के मान-सम्मान के खातिर गाय-माय को मार के खाना छोड़ दे। वैसे भी दुनियाँ में खाने-पीने के समान का कोई कमी नही है, लेकिन हमको ई बात आज तक समझ में नही आया कि साला हिन्दु के कौन धर्म ग्रंथ में ई लिखा है कि मुर्गा खाओ, बकरी-बकरा खाओ, मछली खाओ। अरे भाई, सनातन धर्म का तो यही कहना है कि दुनियाँ के प्रत्येक जीव में भगवान का वास है। इसलिए आदमी को किसी भी जीव के प्रति हिंसा नही करना चाहिये, नही तो भगवान नाराज हो जाता है, लेकिन साला यहाँ तो स्थिति ई है कि हिन्दु लोग दुर्गा पूजा के टाईम में दस दिन बोलेंगे जय जय दुर्गा..... जय जय दुर्गा..... और उसके बाद बोलेंगे लाओ जी मुर्गा..... लाओ जी मुर्गा....,
हमारे विचार से तो योगी जी को इस बात पर भी पाबंदी लगा कर हिन्दु धर्म का रक्षा करना चाहिये।"
उसी समय वहाँ से पंडित काल भैरव गुजर रहे थे, उन्होंने गँगुआ की बात से सहमति जताते हुए बोला कि बिल्कुल तुम ठीक बोल रहे हो गँगुआ। लेकिन आज कल नया ज़माना में सबलोग अपन ढंग से अपना नियम-कानून बना लिया है।"
लठैत को पंडीतजी की बात बिल्कुल भी नही जंची। गुस्साते हुए बोला "ए भैरो बाबा आप ई सब बात मत बोलिये। आप भी हमरा साथ बैठ कर कई बार मुर्गा और तारी का मजा ले चुके हैं। अभी आप गँगुआ के साथ मिलकर ज्ञान नही झारीये। आप तो ऐसन आदमी हैं कि फोकट में अगर आपको कुत्ता का भी माँस लोग खिला देगा तो आप दारू के साथ हज़म कर जायेंगे। बड़ा हिंसा नही करने का उपदेश देने आये हैं। नया साला के पार्टी में मन्ती काकी का बड़का खस्सी चूरा कर काटने में भी आप हमलोग के साथ ही थे। भैरो बाबा अपना भारी बैज्जती देख वहाँ से चुप-चाप खिसकने में ही अपनी भलाई समझी।
लेकिन लठैत चुप नही हुआ और अपनी धुन में बोलता रहा "जिसको जो करना है भाई करे हमको तो एक दिन बाद एक दिन बीना माँस-मछली के रहा नही जाता है। दुध-दही थोड़ा कम मिले लेकिन माँस-मछली के बगैर खाना में स्वाद नही बुझाता है।"
गँगुआ ने लठैत को समझया "देख भाई लठैत,लोकतंत्र में किसी को वैसे तो कुछ भी खाने-पीने की सामान्यतः कोई पाबंदी नही होती है, लेकिन देश के किसी भाई-बंधु के धार्मिक आस्था को चोट पहुँचा कर कुछ खाना-पीना उचित भी नही है। योगी जी गाय का बीफ पर पाबंदी लगा कर बेशक कोई गलत काम नही किये हैं लेकिन जब बुढ़ी और कमजोर गाय को हमारे हिन्दु भाई ही कुछ रूपये के लालच में कसाइयों के हाथ में बेच देते हैं तो गाय-माय के रक्षा कैसे होगा।"
लठैत ने सहमति में सर हिलाते हुए बोला "बिल्कुल गँगुआ तुम ठीक बोलता है। अरे भाई सब हिन्दु-परिवार को चाहिये कि कम से कम एक गाय-माता की सेवा ज़रूर करे। हिन्दु लोग को गाय-माय का अंत तक सेवा कर उसे मरने के बाद दफना देना चाहिये। योगी जी को बुढ़ा-गाय और बैल के खरीद-बिक्री पर भी पाबंदी लगा देना चाहिये। अब परसों की ही बात है, मल्लूह काका अप्पन बुढिया गाय को मंसुर मियाँ को बेच दिये। अब तुम ही बताओ कि मल्लूह काका को पता नही था कि जो गाय काका के अब कोई काम के लायक नही रहा है, उसको मंसुर मियाँ खरीद के क्या करेगा???
तभी बनारसी काका वहाँ पहुँच गये, उनलोगों की बात को सुन कर दुखी होते हुए बोले कि बेटा सच पूछो तो गाय-माय की रक्षा का उचित जिम्मेदारी उठाने के लिये इस देश में बहुत कम लोग तैयार है। एक योगीजी या कोई और क्या कर सकता है....??? अरे भाई गाय को माय बोलने वाला इस देश में सबसे गरीब लोग ही गाय का सेवा करता है। गरीब लोगन के लिये पैसा का बहुत बड़ा महत्व होता है, योगी जी को चाहिये कि सब पंचायत में एक ऐसा गौशाला बना दे, जहाँ लोग बुढ़ी और बेकार गाय को जा कर बेच आयें। इस गौशाला का खर्च हिन्दु संगठन और सरकार को उठाना चाहिये, जिससे कोई गाय माय अंत समय में कत्ल-खाना तक नही पहुँच पाये लेकिन ऐसा करना बहुत मुश्किल है !!!!!"
लठैत को बनारसी काका का बात एकदम ठीक लगा बोला "गाय-माय के रक्षा के लिये अगर हिन्दु लोग को सनका के दंगा करवाया जा सकता है तो ऐसा गौशाला काहे नही खोला जा सकता है???"
बनारसी काका ने समझाया "अरे लठैत, इस देश में मल्लूह जैसा बहुत लोग है, जो अप्पन बुढ़ी माँ का सेवा नही करता है, बुढ़ी गाय-माय को दो पैसा के लालच में बेच देता है, लेकिन साम्प्रदायिक तनाव फैला कर, लोगों की धार्मिक भावना को उकसा कर घटिया किस्म की राजनीति करता है!!! अरे भाई सबसे बड़ा धर्म मानवता और इंसानियत का है!!! उससे बड़ा धर्म इस दुनियाँ में कुछ नही !!! गाय-माय का रक्षा तो होना ही चाहिये लेकिन किसी भी शर्त पर देश के लोगों के आपसी प्रेम और साम्प्रदायिक-सदभाव को नुकसान नही पहुँचना चाहिये। नही तो हमें ना भगवान माफ करेगा, ना ही अल्लाह और ना ही कोई गॉड!!!
गँगुआ बोला बिल्कुल सही बनारसी काका "इस देश में सबसे ज्यादा ऊ लोग खतरनाक है जो आदमी के रूप में भेरिया बन कर अप्पन राजनीतिक रोटी सेक रहा है, जो समय-समय पर भेड़ बन जाता है तो कभी गाय-माय का खाल ओढ़ लेता है। ई लोग इस देश में ना गाय माय को बचने देगा, ना मानवता को और ना इस देश को ही बचने देगा.....
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१३. व्यंग्य // सबसे बढ़िया टियूशनिया मास्टर......!
गाँव के चौपाल पर आज काफी गहमा-गहमी थी। लठैत सिंह गुस्सा से आग-बबूला था बोला "ए बनारसी काका, ई देखिए तो कॉन्वेंट वाला प्रिन्सिपल साहब का केतना जुल्म है। कल मेरा बेटा फेंकना गाय को घास- पुआल देने गया था। गाय माता ना जाने क्यों पहले से बहुत गुस्सा में थी। बस उसने फेंकना को अपने सींग के बल पर उठा के पटक दिया। फेंकना मेरा बेटा है, लठैत सिंह का, इसलिए उसको कुछ खास चोट तो नही लगा लेकिन शनिचर वाला उसका स्कूल-ड्रेस का सत्यानाश हो गया। भोर में जब स्कूल का टेम्पो-गाड़ी आया तो फेंकना बहुत रो रहा था। उसकी माँ ने बहुत समझा-बुझा के सोमवार-मंगल वाला ड्रेस पहना कर, बढिया से तैयार कर स्कूल-गाड़ी पर बैठा दिया। अरे हम दोनों जन यही सोच कर अप्पन पेट काट कर उसको पढ़ा रहे हैं कि पढ़-लिख लेगा तो हमलोग के तरह खेती किसानी में अप्पन जिंदगी के मुरव्वत नही करेगा। अभी एक महीना पहले का बात है, मकई बेच कर सबसे पहले फेंकना का "टिप-टॉप पब्लिक स्कूल" में हम अड्मिशन करवा दिये। जानते हैं काका साला दो हजार अड्मिशन फीस लगा। नर्सरी का बच्चा का साढ़े-आठ सो रुपया किताब में लग गया। तीन सेट स्कूल-ड्रेस लेना पड़ा, साला उसमें करीब चौबीस सो रुपया लग गया, मरदे तनी-गो लम्बा जैसन एगो कपड़ा गला में लटकाने के लिये दिया, ऊ क्या बोलते हैं टाई उसके साथ में एगो बेल्ट दिया, उसका भी ढाई सो रुपया लगा। दस दिन भी फेंकना स्कूल नही गया होगा कि तीन महीना का अड्वान्स स्कूल फीस का इक्कीस सो रुपया का बिल भेज दिया, और जानते हैं ऊ बिल पर लिखा था कि अगर दस दिन के अंदर बिल जमा नही हुआ तो प्रतिदिन पाँच रुपया के हिसाब से लेट फाइन देना होगा। मरदे यूरिया खेत में छिटने के लिये जो थोड़ा बहुत पैसा बचा कर रखे थे, ऊ भी जा के जमा कर आये हैं।
ऐतना लम्बा चौड़ा भाषण सुन-सुन के चौपाल पर सबका कान पकने लगा था। गँगुआ ने बीच में ही टोकते हुए बोला "अरे लठैत कॉन्वेंट में ई सब खर्चा तो लगबे करता है!!!! तुम अप्पन बड़प्पन और वाहवाही लूटने के लिये ई डींग-पतरा हाँकना बंद करो!!! और सीधा-सीधा ई बताओ कि 'टिप-टॉप पब्लिक स्कूल' के प्रिन्सिपल क्या जुल्म किया है!!! पढ़ा तुम अपना बेटा को रहा है, और समूचे गाँव वाले को फालतू का राम कहानी काहे सुना रहा है!!!"
गँगुआ की बात सुनते ही चौपाल पर सभी खिलखिला कर हँसने लगे। लठैत जो पहले से ही गुस्सा में था और भी ज्यादा गुस्सा हो गया और अपनी लाठी ले कर गँगुआ को मारने दौड़ा, "बोला साला हम्मर बेटा को कल दिन-भर प्रिन्सिपल क्लास के बाहर खड़ा रखा। फेंकना को बोला शेड्यूल के हिसाब से अगर स्कूल-ड्रेस पहन कर नही आओगे तो क्लास में बैठने नही मिलेगा।
स्कूल का रुल का पालन करो नही तो स्कूल मत आओ। अनुशासन के बगेर पढ़-लिख कर भी कुछ नही कर पाओगे। तुम्हारे जैसे ही कुछ बच्चों के कारण बड़े-बड़े स्कूल की प्रतिष्ठा समाप्त हो जाती है, अरे प्राइवेट स्कूल के कारण ही आज बिहार में शिक्षा बचा हुआ है। मेरे जैसे प्रिन्सिपल लोग किसी भी शर्त पर स्कूल के नियम-कानून से मजाक बिल्कुल पसंद नही करते हैं। जब तक नया ड्रेस नही सिलवा लेना स्कूल नही आना, और आज स्कूल का ड्रेस-कोड तोड़ने के लिये पापा को पाँच सो रुपया फाइन तीन दिन के अंदर जमा कर देने बोलना नही तो स्कूल से निकाल दिये जाओगे!!!!
और एतना बड़ा बात गँगुआ तुमको डींग-पतरा लग रहा है!!!
गँगुआ ने एक बार फिर मजाकिया लहजे में पूछा "ए लठैत, हमको कुछ समझे में नही आया!!! एक बार फिर से समझाओ !!!! "
लठैत अब बिल्कुल गरजते हुए बोला "ए बनारसी काका इसको समझा दीजिये!!! हमसे अभी मजाक नही करेगा!!! हम पहले से बहुत टेंशन में हैं !!! मेरी पत्नी कल शाम से खाना नही खायी है, जब घर जाते हैं एकै बात का रट्टा लगाये है कि बेटा का नाम कॉन्वेंट से अगर कट गया तो हम ज़हर-माहुर खा लेंगे। ऐसन जिंदगी जी कर हम क्या करेंगे जो अप्पन बेटा को भी ढंग से पढ़ा लिखा नही सके!!! ए फेंकना-बाबू किसी तरह फेंकना का नाम स्कूल से नही कटने दीजिये!!! नही तो हम जिंदा नही रह पायेंगे!!! फेंकना अलग कल से हमसे बात नही कर रहा है कि जब आपको बोले थे कि बिना शेड्यूल वाला स्कूल ड्रेस पहने हम स्कूल नही जायेंगे तो आप हमको स्कूल काहे भेजे??? अब आप ही बताईये बनारसी काका खेत में अभी यूरिया भी नही पड़ा है, वर्षा नही हुआ तो महँगा डीजल खरीद के पानी भी पटाना पड़ेगा। स्कूल ड्रेस सिल्वाने का पैसा रहता तो हम ड्रेस सिलवा नही देते। मान लीजिये अगर ड्रेस किसी से कर्ज़ा-बयान कर सिलवा भी दिये तो ई टिप-टॉप का प्रिन्सिपल को हम पाँच सो का फाइन किस बात का दें????? अब आप ही बताईये बनारसी काका ई प्रिन्सिपल का जुल्म है कि नही!!!!
गँगुआ अब लठैत के कंधे पर हाथ रखते हुए बोला कि देख लठैत हम तुम्हारा मुसीबत खूब समझते हैं लेकिन ज्ञान के सौदागर और शिक्षा-माफियाओं ने आज देश में एक ऐसी समांतर-व्यवस्था खड़ी कर दी है जहाँ जिनके पॉकेट में पैसे नही हैं, वो अपने बच्चों के लिये अच्छी शिक्षा भी नही खरीद सकते हैं। गरीब के बच्चों के लिये प्राइवेट स्कूल के टिप-टॉप को मेंटेन करना बहुत मुश्किल होता है। गुरु-शिष्य की संस्कृति वाले इस देश में हर चौराहे पर एक द्रोणाचार्य अपनी दुकान खोल कर बैठा है। फर्क सिर्फ इतना है कि गरीब घर में पैदा होने वाले एकलव्य को गुरुदक्षिणा के रूप में भले अँगूठा देना नही पड़ता हो, लेकिन अपने बच्चे को बढ़िया शिक्षा दिलवाने में गरीब एकलव्य के माँ-बाप और अभिभावकों को रोज़ एक नई परीक्षा देनी पड़ती है। शोषण और दोहन का ये खेल आज अपने चरम पर है। माँ-बाप अगर हर परीक्षा में पास हो भी जाये तो एकलव्य को अपना मुकाम मिलना उतना आसान नही होता है। पैरवी-पहुँच के साथ घुस के लिये मोटी रकम की भी ज़रूरत होती है और यही कारण है कि फेंकना जैसा एकलव्य आज के द्रोणाचार्य के गुरुकुल में हर क़दम पर अपमानित हो कर हीन भावना का शिकार होता रहता है। कितना ही फेंकना और फेंकना माय का जिंदगी इसी खींच-तान में हर वर्ष तबाह हो रहा है। परेशान मत हो, रे लठैत कल हम तुम्हारा बेटा का ड्रेस भी सिलवा देंगे और पाँच सो फाइन भी जमा कर देंगे।
बनारसी काका भी गम्भीर हो कर बोले "गँगुआ बिल्कुल ठीक बोलता है। अरे तुम एगो लठैत के बेटा का फीस जमा कर देगा लेकिन इस देश में ऐसा कितना ही फेंकना है उसका क्या होगा ??? एक हमारा ज़माना था, गुरूजी घर से पकड़ कर ले जाते थे। पेड़ के नीचे ही बौरा बिछा कर बैठते थे। खूब जिद्द करने पर बाबूजी स्लेट-पेंसिल और बाल-पोथी ला देते थे। शहर जा कर मिड्डिल स्कूल में नाम लिखवा लेते थे। बड़ा टाइट पढाई होता था सरकारी स्कूल में। लेकिन आज बिना ट्यूनशन के बच्चा कुछ नही कर पाता है। गरीब आदमी कैसे अपना बच्चा को पढ़ायेगा। सही में सरकारी स्कूल के मास्टर सब को इसके बारे में जरूर सोचना चाहिये !!!!"
ऐतना सुनते ही गाँव के हेड मास्टर शुशील बाबू का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। चौपाल पर सबको सम्बोधित करते हुए बोले
"सरकारी अध्यापक क्या है और इनके आज क्या-क्या कार्य है ? आपलोग को किसी को पता है ??
1:- सरकारी अध्यापक एक अवतार है!!!
2:- उनके दस हाथ और चार दिमाग होते हैं!!!
3:-वो सभी विषय सभी कक्षाओं में एक साथ पढा सकते हैं !!!
4:- वो सभी बच्चों को खाना खिला सकते हैं वो भी हिसाब लिखकर !!!
घर पर माँ भी खाना तो खिलाती है पर हिसाब नहीं रखती कि मेरे लाल ने आज 100 ग्राम खा लिया और बाद मे क्या बचा ?????
5:- वो बच्चों का डाॅक्टर भी है कि बच्चे के पेट मे कीड़े तो नहीं; कहीं आयरन की कमी तो नहीं और वो इसके लिए टेब्लेट भी खिलाते हैं |
6:- वो बिल्डर भी हैं ; विद्यालय सम्बन्धित भवन बनवाता है;
7:- वो एक अकाउंटेंट भी हैं कैश बुक लिखता है; वो एक लीपिक भी है जो दिन भर अपनी आत्मा को मारकर डाक पीटता है;
8:- वो एक मार्केटिंग करने वाला भी है क्योंकि जिस बच्चे को घर वाले नही पढाना चाहते या जो बच्चा पढ़ना नहीं चाहता उसे विद्यालय लाने का जतन करते हैं;
9:- वो एक ऐसी गाय है, जो भी आएगा उसका दूध निकाल ले जाएगा, वो गाय जिसके सिंग काट दिए गए हैं;
10:- वो चित्रगुप्त भी है उसे घर-घर में 6 साल के बच्चों का पता होता है, 18 साल वालों का भी पता होता है, आगमन वाले पलायन वाले सभी का पता होता है ;
11:- वो जनगणना भी करते हैं;
12:- वो निर्वाचन आयोग के लिए वोट भी बनाता है;
13:- देश के सभी चुनाव भी इन्हीं के जिम्मे होते है;
14:- अब नया कार्य बच्चों के आधार कार्ड बनवाने का मिल गया है;
15.शिक्षक ही एक मात्र ऐसा सरकारी व्यक्ति है जिसे कोई भी ग्रामीण कुछ भी आकर कह जाता है यहाँ तक कि मार भी जाता है ; जिससे न तो किसी को भय होता है और जिसकी न ही कोई इज़्ज़त है।
इसके वावजूद भी लोग कहते हैं कि मुफ्त का वेतन लेता है!!!!
16. शिक्षक एक मात्र प्राणी है जिसपर निगरानी के लिए असंख्य विभाग हैं कभी dm कभी dpo कभी deo कभी bdo कभी co कभी beo कभी मुखिया कभी वार्ड सदस्य कभी सरपंच तो कभी ग्रामीण और न जाने कितने पदाधिकारी....????? सबसे बड़ी बात कि कोई भी इसलिए निगरानी नही करता कि शिक्षा व्यवस्था सुदृढ़ हो बल्कि इसलिए कि अधिक से अधिक लूट-खसोट कर सकें ।
कुछ छुट गया हो तो आप लोग लिख लेना डायरी मे आगे आने वाली पीढ़ी जानेगी कि डायनासोर के बाद एक जीव और आया था धरती पर!
सुशील बाबू का भाषण ख़त्म होने से पहले ही आधा आदमी चौपाल छोड़ कर जा चुके थे और जो बचा वो भी तुरंत ही घर को चल दिये। अगले दिन फिर से फेंकना खुशी-खुशी स्कूल जाने लगा था। करीब दो महीना के बाद गँगुआ का साला एक दिन लठैत के यहाँ पहुँचा तो लठैत ने उसकी खूब खातिरदारी की और बोला कि आप अंग्रेजी के बढ़िया जानकर हैं, थोड़ा फेंकना का टेस्ट ले लीजिये??? गँगुआ के साला जीत्तन बाबू ने फेंकना को सब किताब लाने को बोला। किताब देखते ही बोले कि अरे इसी कंपनी का तो मेरे पास एजेंसी है। हमलोग प्राइवेट-स्कूल वाला को इस पर साठ परसेंट कमीशन देते हैं। लठैत की बीबी ने माथा पीट लिया बोले पहले पता रहता तो कितना पैसा बच जाता। खैर इस बार भाईजी नेका क्लास में आप ही किताब ला दीजियेगा। इस पर जीत्तन ने समझाया कि देखो बहन प्राइवेट स्कूल वाला बहुत चालू होता है!!! कमीशन कमाने के लिये हर वर्ष किताब बदल देता है जिससे कोई बच्चा अगला क्लास वाला बच्चा का किताब नही ले सके। कुछ स्कूल तो ड्रेस भी बदल देता है!!! हर वर्ष नये ढंग से बच्चा का अड्मिशन भी करवाना पड़ता है!!! एतना सोचोगी तो बच्चा को कॉन्वेंट में नही पढ़ा सकोगी। बस इतना मनाओ कि खर्चा जो भी हो, बच्चा ठीक से पढ़ ले!!! इसके बाद उन्होंने फेंकना का टेस्ट लिया और फेंकना टेस्ट में बुरी तरह फैल हो गया।
लठैत और उसकी बीबी ने माथा पीट लिया लेकिन अगले ही दिन लठैत सिंह "टिप-टॉप पब्लिक स्कूल" के प्रिन्सिपल के पास झगड़ा करने के ख़याल से पहुँचा तो पता चला कि टीचर-डे का तैयारी चल रहा है। प्रिन्सिपल साहब टीचर डे के कारण दस दिनों तक किसी गार्जियन से नही मिलेंगे। निराश मन से लठैत घर लौट आया लेकिन शाम को फेंकना ने उसे एक बिल ला कर दिया जिसमें टीचर-डे प्रोग्राम के लिये पाँच सो रूपये डोनेशन दो दिन में जमा करने को बोला गया था। फेंकना का नाम नही कट जाये इसलिए उसने मुरली बाबू से सूद पर पैसा उठा कर स्कूल के एकाउंटेंट के पास जमा कर दिया।
दस दिन के बाद जब लठैत फिर प्रिन्सिपल से मिलने पहुँचा तो स्कूल के एक कर्मचारी ने कहा कि आपका जो भी समस्या है आप लिख कर दें। प्रिन्सिपल साहब ज़रूरी समझने पर आपको अंदर बुला लेंगे। बड़ी मुश्किल से लठैत ने स्कूल के बाहर गुमटी में एक एम॰ए. पास पान-दुकान वाले को पचास रुपया दे कर आवेदन लिखवाया। आवेदन जमा करने पर स्कूल के चपरासी ने उसे दो दिन बाद आकर मिलने को कहा। लठैत निराश मन से वापस लौट आया लेकिन दो दिन बाद जब गया तो प्रिन्सिपल ने उसे तुरंत अपने कमरे में बुला लिया। लठैत के सामने ही फेंकना के क्लास टीचर को प्रिन्सिपल ने अंग्रेजी में खूब डांटा!!! लुसी मेम पहले तो चुप रही लेकिन जाते समय अंगेजी में कुछ बोल कर चली गयी। लठैत को दोनों की बात कुछ भी समझ में नही आ रही थी, सो लुसी मेम के कमरे से बाहर जाते ही लठैत गिड़गिड़ाते हुए बोला, ए सर हम अपना बेटा को पढाने में तबाह हो गये हैं, और उस पर भी हमार बेटा फेंकना कुछ काहे नही जानता है ????
प्रिन्सिपल साहब ने लठैत को बड़े प्यार से समझाया कि आपका बेटा को स्कूल का रुल तोड़ने के लिये कई बार फाइन किया गया, इसके बावजूद आपलोग लापरवाह बने रहे!!! ये बताईये कि घर पर उसका होम वर्क कौन पुरा करावाता है ???
लठैत लगभग रोते हुए "ए मरदे हम दोनों मरद-औरत बिल्कुल अनपढ़ हैं, ई होमवर्क क्या होता है हम नही जानते हैं !!! आप जल्दी से उसका स्थिति सुधार दीजिये !!! आपका जिंदगी भर हम आभारी रहेंगे।।।
प्रिन्सिपल साहब ने समझाया कि देखिये फेंकना पढ़ने में बहुत कमजोर है। हमारा टिप-टॉप पब्लिक स्कूल सब बच्चा पर पुरा ध्यान देता है लेकिन अगर कोई गार्जियन हमारा सपोर्ट नही करता है तो हम उसके बच्चे को अगले सेशन में स्कूल से निकाल देते हैं!!!
लठैत फेंकना के स्कूल से निकालने की इस धमकी से बिल्कुल तिलमिला गया। गुस्सा से बोला "ए मरदे सीधा ढंग से ई बताओ कि मेरा फेंकना का स्थिति कैसे सुधरेगा ??? ई हर बात में स्कूल से निकालने का धमकी मत दो!!!
प्रिन्सिपल साहब ने थोड़ा सीरियस हो कर बोला "देखिये लठैत जी आप फेंकना को किसी बढ़िया टीचर से ट्यूशन दिलवा दीजिए।
लठैत हैरत से "मरदे ई ट्युशन क्या होता है ??"
प्रिन्सिपल ने समझाया "फेंकना को कोई बढ़िया टीचर पर्सनली एक घंटा पढ़ाए, तभी कोई उपाय है"
लठैत गुस्सा से "अरे भाई, तो पढाओ ना, जितना मन है पढाओ !!! रोका कौन है ???"
प्रिन्सिपल ने फिर समझाया कि इसके लिये आपको हर महिने एक हजार रुपया अलग से जमा करना होगा!!!
लठैत गुस्सा से अब तक आग-बबूला हो गया था, उसने आव देखा, ना ताव और झट से प्रिन्सिपल का कालर पकड़ कर दस-बीस झापड़ रसीद कर दिया!!!
किसी तरह स्कूल के अन्य स्टाफ ने बीच-बचाव कर लठैत को टिप-टॉप कॉन्वेंट से बाहर किया। लेकिन कई घंटों तक लठैत बड़बड़ाता रहा कि ई साला हमको काहे नही बताया कि सबसे बढ़िया "टियूशनिया मास्टर" होता है....! मेरा फेंकना का जिंदगी बरबाद कर दिया। हमारा पुरा परिवार बरबाद हो गया, हम इसका जान ले लेंगे.... !
फेंकना अब गाँव के स्कूल में ही पढ़ता है। पढ़ने के साथ-साथ गाय-बकरी भी चरा लेता है और सबसे बड़ी बात स्कूल का स्वादिष्ट खीचरी खा कर मस्त रहता है......!
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१४. व्यंग्य // मैं अन्नदाता हूँ . . .!
जेठ के दोपहर का समय था। गर्मी अपने परवान पर थी। सूर्य भगवान मानो अपनी क्रोधाग्नी से धरती को भस्म करने के मूड में थे। सड़क पर बिल्कुल सन्नाटा पसरा था। अधिकांश सरकारी और प्राइवेट स्कूल में छुट्टी हो चुकी थी, इसी कारण गाँव और शहर के बच्चे गर्मी छुट्टी का आनंद लेने में मशगूल थे। कई सरकारी बाबुओं ने स्पेशल अर्जी लगा कर जेनेटर का व्यवस्था करवा लिया था। प्राइवेट कार्यालयों में तो बहुत जगह एयर-कंडीशन ऑफिस का मजा उठाने वाले लोग इस जानलेवा गर्मी से बेखबर थे। असली शामत तो भाई किसान-मजदूरों की थी।
गँगुआ इस भयानक गर्मी में भी अपने सिपाही हिरवा के साथ खेत पर डटा था। हिरवा नाटे कद और साँवला रंग-रूप का एक कमजोर दिमाग वाला मेहनती इंसान था। हिरवा भोजपुरी गाने का बड़ा प्रेमी था, और जब कठिन मेहनत से शरीर टूटने लगता तो अपनी गायकी से अपना और अपने मालिक गँगुआ का मनोरंजन करने लगता था। हिरवा की जरूरतें बहुत कम थी। मोटा-सोंटा खाना खा कर भी खुश रहता था।दो टाईम खाना और दो जोड़ी कपड़ा के अलावे उसे कोई खास चीज की ज़रूरत महसूस नही होती थी।हाँ, एक बार गँगुआ से छोटी बात पर झगड़ा कर कुछ दिन के लिये पंजाब भाग गया था, वहाँ से एगो चायनिज मोबाइल ले आया था। इस मोबाइल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल वो अपने पसंदीदा भोजपुरी गाना सुनने में करता था।
आज गँगुआ और उसके मालिक का दिन सच में बहुत खराब था। जब शहर के बड़े-बड़े लोगों को बार-बार कोल्ड-ड्रिंक पीने की तलब महसूस हो रही थी, गँगुआ और हिरवा सुबह से भूखे-प्यासे अपने खेत के बीचोबीच कड़कड़ाती धूप में बोरिंग-पंपसेट को चालू करने में परेशान था। सुबह चार बजे से दोनों के काफी मगजमारी के बाद भी जब दोनों को समझ में नही आया कि आखिर मशीन बार-बार पानी क्यों छोड़ रहा है, तब गँगुआ हिरवा से बोला कि अब लगता है मतीनवा को बुलाना ही पड़ेगा। मतीन गाँव का ही आलराउंडर मिस्त्री था जो लगभग हर तरह के गाड़ी-ट्रेक्टर से लेकर मशीन और टीवी-रेडियो, मोबाइल तक ठीक कर लेता था।
मतीन को बुलाने के लिये जैसे ही गँगुआ निकलने वाला था कि उसका सामना अपने मित्र लठैत सिंह से हो गया। लठैत भी ना जाने क्यों परेशान था। गँगुआ को सामने देखते ही बोला "यार ई खेती-बारी अब हमको एकदम छोड़ देने का मन करता है।"
गँगुआ भी हामी में सर हिलाते हुए बोला "साला ऐहो कोई काम है लठैत, अब हमको ही देखो सुबह से अभी दो बजने को चला है और अभी तक हम मुँह भी नही धोये हैं।"
लठैत ने मजाकिया लहजे में बोला "काहे जी भौजी से झगड़ा हो गया है क्या???"
गँगुआ गम्भीर होते हुए "यार किसान का बीबी केतना झगड़ा करेगी, और झगड़ा करके भी हमलोग से उनका कौन शौक अरमान पुरा होने वाला है??? हमलोग तो बस कोल्हू का बैल हैं जो सिर्फ उम्मीद पर जिंदा हैं और वही उम्मीद अप्पन घर-परिवार के लोगों को भी बाँटते रहते हैं। पिछला साल ऐसने गर्मी में पानी पटा-पटा कर मकई उपजाये और मकई सुखाने के टाईम में ऐतना वर्षा हुआ कि आधा मकई तो कामत पर ही सड़ गया। आधा मकई जो बाजार ले कर गये उसका भी ऐतना कम रेट मिला कि पूछो मत!!!"
लठैत ने बात काटते हुए बोला "रे, बुरबक जब रेट कम था, तो मकई बेचना कोई ज़रूरी था। मकई स्टॉक काहे नही कर लिया???"
गँगुआ अफसोस जताते हुए "यही तो इस देश का दुर्भाग्य है, रे लठैत !!! किसानी और खेती का मजबूरी ही ऐसा है कि खुब जी-जान से मेहनत करो और जब फसल तैयार हो जाये तो औने-पौने दाम में बेच कर महाजन को दे आओ। आज देश का कौन ऐसा हिस्सा है जहाँ किसान लोग आत्महत्या नही कर रहा है। दिल्ली के जो अभी मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल है, उसके एक आमसभा में सबलोग के सामने एगो किसान भाई पेड़ से लटक के जान दे दिया, लेकिन क्या हुआ?????"
लठैत भी हामी में सिर हिलाते हुए बोला "बात तो एकदम सही है, रे गँगुआ !!!! आखिर पुरा देश का पेट भरने वाला किसान इस देश में भूखे क्यों मर रहा है????"
"देख भाई लठैत, हमलोगों को सरकार के तरफ़ से ना तो अपने फसल का वाजिब दाम मिलता है, ना ही आँधी तूफान में फसल नष्ट होने पर कोई सरकारी मुआवजा!!! फसल नष्ट होने पर अगला फसल उपजाने के लिये हमलोग महाजन से जो एक बार कर्ज लेते हैं, ना ओकर मूल भुगतान हो पाता है और ना सूद!!! फिर डीजल, कीटनाशक, बीज, खाद सब कुछ महँगा ही होते जा रहा है" गँगुआ बोला।
"हाँ भाई गँगुआ!!! लागत बढ़त जा रहा है और मुनाफ साढ़े बाइस !!! बैल के तरह काम करो, दुनिया भर का रिस्क लो, फसल तैयार हो गया तो गर्जूआ बन कर बेच आओ, और पहुँचा दो सूद जोड़ के महाजन को!!! सच में बड़ा दुखदायी जिंदगी है ई किसान लोगों का, मतलब पुरा देश के पेट भरने वाला का परिवार भूखे है या बीमार, इसके बारे में इस देश में सच में सोचने वाला कोई नही है????"
थोड़ी दूर पर खड़े बनारसी काका ई सब बात सुन रहे थे। उनलोगों की नज़र जब उन पर पड़ी तो वो भी अपनी पीड़ा सुनाने लगे "बेटा कहने को तो सरकार किसान के लिये बहुत योजना चला रही है, लेकिन
" सब ऊपर ही ऊपर खा जाते हैं,
जो खाने वाले हैं!!!
और जिये वाला ऐसे ही जी लेते हैं,
जो जीने वाले हैं!!!"
अब देखो बेटा पचास हजार का हम के.सी.सी. लोन के लिये साल भर बैंक में दौड़े। बैंक का मनेजर जो-जो कागज मांगा सब दिये लेकिन जब तक मल्लूह के हाथ से मनेजर को पाँच हजार नही भेज दिये मनेजर हमको लोन नही दिया। अब बताओ कि अगर कोई साल भर लोन के लिये दौड़ेगा तो उसका खेती सत्यानाश होगा कि नही।"
गँगुआ भी सहमति में सिर हिलाते हुए बोला हाँ काका यही कारण है कि हम सीधे मल्लूह काका से पाँच रुपया सैकड़ा (मासिक सूद )पर बीस हजार रूपया ले लिये लेकिन बैंक नही गये। पर क्या बातायें काका फसल आँधी में खराब हो गया। सत्तर हजार अब तक सूद दे चुके हैं लेकिन साला अब तक कर्ज़ा ख़त्म नही हुआ है।"
बनारसी काका हैरत भरे अंदाज़ में बोले "क्या करोगे गँगुआ, इस देश में विजय माल्या करोड़ों रुपया ले के बैंक का विदेश भाग जाता है तो किसी को कोई तकलीफ नही होती है लेकिन हम किसान लोग अगर बैंक का किस्त भुगतान में थोड़ा भी देरी करें तो नोटीस आ जाता है। कल तो जुल्म हो गया!!! भवानी के दरवाजा से बैंक वाला आके ओकर ट्रेक्टर ले कर चला गया। अब तुम ही बताओ अभी ट्रेक्टर से कमाने का समय था, पैसा होता तो बैंक को दे आता। अब ट्रेक्टर ले कर चला गया। भवानी ऐहे ट्रेक्टर के कारण खेत सब सूद भरना लगाये हुए है। हमको तो डर लगता है कि कहीं भवानी ज़हर-माहुर ना खा ले।"
लठैत गुस्सा से बोला "ई मनेजर का काका हम कौनो दिन बोलिये तो कपार फोड़ दें, साला बहुत घूसखोर है!!! अब आप ही बताईये ई भवानी बेचारा अब क्या करेगा???"
गँगुआ गम्भीर होते हुए "किस किस का कपार फोरेगा रे लठैत??? पेक्स में यूरिया आया सब मिल कर ब्लेक कर लिया लेकिन जो ओरिजनल किसान है उसको क्या मिला????
!!!! बाबाजी का ठुल्लुआ !!!!"
बनारसी काका "बेटा गरीब किसान के पास कोई दूसरा उपाय ही नही है!!!! सब लोग मिल कर हमारा ही शोषण करते हैं, लेकिन किसान कि समस्या को सुधारने के लिये कोई मन से प्रयास नही कर रहा है"
लठैत गुस्साते हुए "साला ई लोग सिर्फ एलेक्शन के समय जोड़-जोड़ से बोलेंगे कि ---- आप अन्नदाता हैं.........!!!!!!"
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१५. व्यंग्य // ऐसे तो देश बरबाद हो जायेगा
गाँव की चौपाल पर जमघट लगी थी। तभी मंग्लु काका उधर से गुजर रहे थे। चौपाल के पास पहुँचते ही उन्हें माहौल कुछ ग़मगीन महसूस हुआ। फ़िर क्या था अपने मिलनसार स्वभाव के कारण उन्होंने पूछ दिया " क्या हुआ रे , गंगुआ "
गंगुआ रजनीगांधा का पीक फेंकते हुए बोला " मत पूछिये काका , ई लोग देश को बरबाद कर देगा !!! आप ही बताईये आपके समय मे स्कूल में जो पढाई होता था , अब होता है क्या ??
काका बोले " ना रे गंगुआ , बिल्कुल "
गंगुआ फ़िर तमतमाते हुए बोला "फ़िर ई मास्टर लोग एगो नया ड्रामा शुरू कर दिया है , जानते हैं ई लोगों के चाहिये - सामान काम का सामान वेतन "
काका बोले "अरे गंगुआ ए में तुमको का दिक्कत है। तुम्हारा नेतागिरी कैसा चल रहा है"
गंगुआ नाराज होते हुए बोला "आप जो है न काका बात समझते हैं नही , नेतागिरी हमलोग पंचायत के विकास के लिये करते हैं। गाँव का बच्चा लोग बढ़िया से नही पढ़ पा रहा है , और आपको कोई चिंता ही नही है। कुछ मास्टर पटना गया है विधानसभा घेराव के लिये, कुछ ईमानदार मुख्यमंत्री के पुतला दहन में कलक्टरिएट गेल है। जे लोग बच गया है , उ लोग बच्चा का कॉपी जाँच नही कर रहा है। अब आप बताइए देश बरबाद होगा कि नही। ऐसे भी ई मास्टर लोग कौन काम करता है , जो हर साल वेतन के लिये झंझट करते रहता है।"
काका बोले "बेटा तुम बात तो ठीक बोल रहे हो। खैर ई बताओ कल तुम्हारा मोहना से झगड़ा काहे हो गया।"
गंगुआ बोला " नय जानते हैं काका , अरे साला बैमानी पर उतर गया था। हम सोचे कि मोहना बढिया आदमी है लेकिन ई तो साला बईमान निकला।
काका बोले " बेटा क्लियर बताओ, हम कुछ नही जानते हैं।"
गंगुआ बोला " अरे काका मोहना के साथ पार्टनर में चौक जाने वाला रोड बनाने का ठेका मुखियाजी से लिये थे।
मुखियाजी पहले 10% ले लिये। ब्लॉक का स्टाफ सब मिलकर 15% खा गया। विधायक जी को उद्घाटन के लिये बुलाये, गाँव के लईकन सब पार्टी माँगा। 5% ऊ सबमें भी खर्च हो गया। काम फाइनल होने पर इंजीनियर साहब भी साइन करने का 5% माँग लिया। बड़ा मुश्किल से टेंडर का 15% बचा होगा। मोहना को बोले मेरा हिस्सा दो तो बोला कि तुम ठेकदारी लाइन में अभी नया हो 5% ले लो। हम भी कहाँ कम थे तुरंत कालर पकड़ लिये बोले साला काम जब बराबर किये तो बराबर बाँट नही तो घर भी नही जा पाओगे। अब आप बोलिये काका क्या गलत बोले "समान काम किये तो समान हिस्सा होगा कि नही।"
मंग्लु काका हैरान होते हुए बोले " बात तो ठीक बोलते हो बेटा -समान काम किये तो हिस्सा भी समान मिलना ही चाहिये। नही तो तुम उसको जिंदा घर भी नही जाने दोगे तो क्या गलत है। पर एक बात बताओ बेटा इतना लोग को पैसा बाँट के जो सड़क तुम बनाये उससे क्या देश बरबाद नही होगा????"
गंगुआ जोरदार ठहाका लगाते हुए बोला "क्या काका आप तो कुछ समझते ही नही हैं, नेतागिरी और ठेकेदारी में ई सब चलते रहता है। अरे ऊ मोहना तो समान काम का हिस्सा हमको दे दिया काका नही तो कल गोली चल जाता।"
मंग्लु काका मुस्कुराते हुए चल दिये।
रास्ते में मन ही मन सोचने लगे कि क्या हो गया है इस पीढ़ी को जिसे सरकारी निर्माण में हो रही लूट खसोट नही दिखती है बल्कि उस लूट में भी समान हिस्सा चाहिये और देश के भविष्य का निर्माण करने वाले शिक्षकों के "समान काम के लिये समान वेतन की मांग" पैसे की बरबादी लगती है !!!!!!
शाम के समय यही गंगुआ दारू बंदी के इस सुशासन में तारी के नशे धुत्त हो कर सरेआम हेड मास्टर को MDM वाला पैसा से मुर्गा खिलाने की जिद्द कर रहा था और मास्टर साहब बचत नही होने का रोना रो रहे थे। पर गंगुआ जिद्द पर अड़ा था तभी मंग्लु काका पहुँच कर गंगुआ को समझाये के बेटा मास्टर साहब को परेशान मत करो आठ माह से वेतन नही मिला है और मास्टर साहब का बेटा दस दिन से हॉस्पिटल में एडमिट है।
अब तुम ही बताओ कि तुम्हारे देश के बच्चों को कैसे पढ़ायेंगे . . .
ये सब सुनते ही गंगुआ का नशा टूट चुका था !!!!!
तभी मंग्लु काका समझाते हुए बोले कि बेटा ना सिर्फ तुम्हे बल्कि इस देश के सभी नेता को बहुत जल्द समझना होगा कि इस तरह अगर गुरु का अपमान होता रहा तो ये देश बरबाद हो जायेगा . . .
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१६. व्यंग्य // सरकार को चाहिये फोकटिया कर्मचारी . . .
सुबह का समय था। मंग्लु काका गाय का गोबर उठा कर नाद में दाना-पानी डालने जा रहे थे। तभी उधर से गंगुआ गुजर रहा था, मंग्लु काका को देखते ही बोला "राम ! राम ! काका"
काका भी मंग्लु के सुर में सुर मिलाते बोले "राम! राम ! गंगुआ। इतना सुबह मुँह फुलाये कहाँ चल दिया रे गंगुआ।"
गँगुआ झल्लाते हुए बोला "ए काका, ई बेगारी क्या होता है हो"
काका हँसते हुए "अब क्या हुआ जी! और ई सुबह-सुबह बेगारी के बारे में जानने को तुमको क्यों सूझा???"
का बोले काका "आज सुबह-सुबह बाबूजी इहे बात पर गरिया दिये हैं!!! बोले ज्यादा मुखीयाजी का बेगारी मत किया करो। नेता लोग सिर्फ लोगन के खून चूसना जानता है। ऐसे तुम्हारा जिंदगी नही कटने वाला है। घर में बहु रोते पीटते रहती है कि बाबूजी हमनी के भँसा दिये। अरे हमलोगों का छोड़ो अपन बेटा के बारे में ही सोचो। महँगाई का ज़माना है। उसको कैसे पढाओगे, लीखाओगे। आज बढिया से नही पढ़ाए तो कल तुम्हारे तरह ऊ भी केकरो चमचागीरी करेगा।"
हमको तो काका बहुत गुस्सा आ रहा था। अब आप ही बताईये मुखीयाजी हमको ठेकेदारी दिये हैं कि नही। बाबू जी को बोले त बोलने लगे "भक बुरबक !!! एक साल में एगो ठेकेदारी दे ही दिये तो उससे तुम्हारा पेट थोड़े भर जायेगा। अप्पन खेती-बारी पर ध्यान दो बेटा। कुछ धंधा भी अपना शुरू करो। दो गो पैसा हाथ में रहेगा, तभी ना अप्पन बाल बच्चा को पढाओगे, अपना भी दुख-सुख में सही ढंग से जीवन निर्वाह करोगे। आ एक बात हम बोल देते हैं - ई घर में रहना है तो नेता लोग का बेगारी करना बंद करो। हमसे रोज़-रोज़ बहु का रोना धोना नही देखा जाता है।"
काका सुबह सुबह मूड खराब हो गया, लेकिन हमको ई बात अब तक समझ में.नही आया कि साला ई बेगारी क्या होता है ?????
काका मुस्कुराते हुए बोले "बेटा बाबूजी बात तो ठीक ही बोले हैं। जब किसी को अपने काम का वाजिब मेहनताना नही मिलता है तो उसको बेगारी बोलते हैं। तुम जितना पैसा ठेकेदारी से कमाते हो उससे क्या तुम्हारे बीबी बच्चे का भरण पोषण होगा???
"नही काका" गंगुआ बोला।
"यही बेगारी है बेटा"
तभी गंगुआ का पक्का मित्र लठैत सिंह पहुँच गया "काका को राम! राम! बोल कर बिगड़ते हुए बोला कि काका के हम्मर पार्टनर से बेगारी करवायेगा!!! टाँग तोड़ के हाथ में थमा देंगे॥"
काका समझाते हुए बोले "यही आजकल के लईकन में सबसे बड़ा कमी है। बात समझे नही, आ कपार फोड़ने के लिये तैयार। अरे यार अब पहले वाला ज़माना नही है। राजतंत्र में राजा और जमींदार लोग, मुगलकाल में नवाबलोग, अँगरेज़ के समय अँगरेज़ अफसर लोग गरीब लोग से बड़ा बेगारी करवाता था। बेटा दिन रात बैल के तरह काम करवा कर भी एतना भी मजदूरी लोग के नही देता था कि गरीब लोग अप्पन बीबी बच्चा और अपना पेट ढंग से पाल सके। बहुत जोर-जुल्म का ज़माना था बेटा। अब लोकतंत्र है अब कोई किसी से जबरदस्ती बेगारी नही करा सकता है। सब तरह के काम के लिये वाजिब मेहनताना और सेवाशर्त निर्धारित है। यहाँ तक कि एक मजदूर के लिये भी न्यूनतम मज़दूरी निर्धारित है। अगर कार्यस्थल पर या सेवाकाल में किसी के साथ दुर्घटना हो जाता है तो सरकार मुआवजा देती है। एक आदमी को अनुकम्पा पर नौकरी भी देती है।"
लठेत सिंह अचानक बोल उठा ए काका जब सबका सेवाशर्त और मेहनताना सरकार पहले निर्धारित कर दिया है तो ई मास्टर लोग, होम गार्ड का जवान, आँगनबारी सेविका लोग पटना के सड़क पर एतना हंगामा काहे किये हुए है?????
"यही तो षडयंत्र है बेटा" काका बोले।
आजकल नेतालोग बेगारी का नया नया तरीका खोज लिया है। एगो तरीका है "नियोजन"। अरे मरदे सरकारी विभाग में नियोजन क्या होता है जी। सरकार दो-चार साल में स्कूल बंद कर देगी क्या??? जो मास्टर को नियोजित कर दिया है। ऐहे बात आँगनबारी और होम गार्ड पर भी लागू होता है। नियोजन का साफ मतलब है कि काम तो तुमसे खूब करवायेंगे लेकिन पैसा देंगे मजदूर के बराबर जबकि सुप्रीम कोर्ट भी कह दिया है कि सभी सरकारी कर्मचारी को समान काम का समान वेतन मिलना ही चाहिये। लेकिन नेताजी लोग के अप्पन तर्क है। कुल मिला के एतने समझो बेटा कि नियोजन मतलब बेगारी। आजकल सरकार का होशियारी देखो डाक्टर और इन्गीनीयर भी नियोजित। काहे भाई आज कई गो नेता बिना कमीशन के ठेकेदारी किसी को देता है। जीत्तन मांझी मुख्यमंत्री होकर खुद भी बोले थे कि सब विधायक सांसद कमीशन खाता है। हमको भी कमीशन मिलता है। लेकिन पब्लिक का सेवा करने वाला जमीनी स्तर के सरकारी कर्मचारी से करवायेंगे बेगारी।
अब तुम ही लोग बताओ कि नियोजन का नाटक ग्यारह माह तक ठीक लगता है। सालों साल आप किसी पढ़े लिखें आदमी से काम करवाओ और उसे समान काम का समान वेतन नही दो। ई तो बिल्कुल अन्याय है!!!!!
गंगुआ कुछ देर सोच कर बोला "काका ई लोग कोई कम्पीटीशन से थोड़े आया है।"
काका फ़िर मुस्कुराये "बेटा यही राज़ है। ये बताओ सरकार और नेता को कम्पीटीशन लेने के लिये मना कौन किया था। अगर ई लोग काम के लायक नही है तो अभी तक इसको काम पर रख कर पब्लिक को मूर्ख ही बना रहे हैं। अरे नेता लोगन अब भी शर्म करो और नालायक लोग को सरकारी विभाग से बाहर करो क्योंकि ई नालायक लोग समाज और देश को बर्बाद कर देगा। पर नियोजन के नाम पर लोगों से बेगारी करा कर लोकतंत्र का मजाक मत उड़ाओ।
लठैत सिंह गरजते हुए बोला "बिल्कुल सही काका"
काका फ़िर समझाते हुए बोले कि देख गँगुआ मान लो तुम्हारा बेटा खूब पढ़-लिख लिया। सरकार कम्पीटीशन लेबे नही करेगा तो तुम्हारा बेटा क्या करेगा।
गंगुआ गुस्सा करते हुए "ई तो नाजायज है ना काका।सरकार का काम है कि कॉम्पिटिशन ले के तेज छात्र लोगन को बढिया पोस्ट और वेतन दे।"
काका वही बात है लेकिन कॉम्पिटिशन का क्या हाल है बिहार में "बिहार SSC में देखबे किया। गरीब आदमी के बाल-बच्चा आखिर करेगा क्या ???? सरकार ज्यादा से ज्यादा करेगी क्या "नियोजन"
लठेत सिंह समझ गये, समझ गये, बिल्कुल समझ गये :- "सरकार को चाहिये, फोकटिया कर्मचारी"
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१७. व्यंग्य // अब चीटर को स्मार्ट कहा जाता है . . .।
मल्लूह काका की गाँव में में बड़ी धाक थी। बड़ा आलीशान मकान था। दो-दो चार चक्का था। बेटा दोनों बाहर बढ़का शहर में रह कर टेक्निकल पढाई करता था। काम कुछ खास नही करते थे लेकिन लोग उनके यहाँ बहुत आता जाता था। सब सरकारी ऑफिस में उनका पहुँच था। थाना-ब्लॉक, कलेक्टेरिट, कोर्ट-कचहरी, पंचायत, सरकारी हॉस्पिटल सब जगह हाकिम-मुलाजिम से उनकी काफी दोस्ती थी। सरपंच-मुखिया, विधायक-सांसद, दरोगा-मनेजर सब लोग उनके यहाँ आते जाते थे। यही कारण था गाँव में उनकी बड़ी धाक थी। मुसीबत में जब भी कोई आता था, सबसे पहले मल्लूह काका के दरवाजे पर ही जाता था। आदमी भी बहुत नेक थे, दिल खोल कर सबका मदद करते थे।
एक बार गंगुआ का अप्पन भाई से झगड़ा हो गया। बात कुछ खास नही था, बस गंगुआ की बकरी बगल में उसके भाई के खेत में चली गयी। उसका भाई समझाया कि बकरी बाँध कर रखा करो, हटिया से सब्जी लाने में अखर जाता है। सामने बारी में जब भी नेनुआ और कद्दू लगाते हैं, बकरी सत्यानाश कर देता है। दस दिन पहले बाजार से खरीद कर बैंगन का पौधा लगाये थे सब ई बकरी नाश कर दिया। बस फ़िर क्या था गंगुआ ने बकरी को खुब पीटना शुरू कर दिया। इतने में गंगुआ की पत्नी बकरी को बचाने पहुँची लेकिन गंगुआ का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उसने लगे हाथ अपने पत्नी की भी धुलाई कर दी। चारो तरफ़ से गाँव के लोगों की भीड़ जमा हो गयी। गंगुआ की पत्नी जो पहले से ही बीमार चल रही थी, इस पिटाई से बेहोश हो गयी और उसे दाँत लग गया। बड़ी मुश्किल से लोगों ने उसे उठा कर खाट पर डाला। गाँव की कुछ औरतों ने मुँह पर पानी का छींटा मारा, बुढ़ी काकी जल्दी से चमच ले कर आयी और गंगुआ की पत्नी का दाँत छौराया। गंगुआ का भाई तब तक कम्पोन्डर साहब को बुला लाया। कम्पोन्डर कुछ देर जाँच कर कुछ दवाई दे दिया। गंगुआ का भाई अपने पॉकेट से सौ रुपया कम्पोन्डर को दे कर विदा किया। कुछ देर में सब लोग अपने घर चले गये। माहौल शांत हो गया लेकिन बुरी तरह से पिटाई होने के कारण बकरी अब भी में-में कर रही थी।
गँगुआ भी अंदर से बहुत परेशान था। कर्ज़ा ले कर जो पैसा ठेकेदारी के काम लगा दिया था उसका अलग टेंशन था। काम ठीक ढंग से नही होने के कारण अफसर और इंजिनियर लोग रोज़ किसी ना किसी बात को लेकर झंझट करके जाते थे। पैसा हाथ में रहता तो सब मेनेज हो जाता लेकिन हाथ खाली था। घर पर बीबी रोज़ बेटा को कॉन्वेंट में अड्मिशन का जिद्द किये थी। घर का रोज़ का खर्चा भी बड़ा मुश्किल से चलता था। उस पर उसका अपना भाई भी उसका मजबूरी समझने को तैयार नही था। तभी मुखियाजी और मल्लूह काका उधर से गुजर रहे थे।
मल्लूह काका देखते ही बोले क्या हुआ रे गंगुआ बहुत परेशान है।
गंगुआ "कुछ नही काका"
"अरे बोलो बेटा, वैसे मैं सब जानता हूँ " मल्लूह काका बोले।
'क्या जानते हैं ' गंगुआ हैरान हो कर पूछा।
मल्लूह काका रहस्यमयी मुस्कुराहट के साथ बोले "बेटा सुने तुम्हारा भाई तुम्हारी दुल्हनियां को बहुत पीटा है।"
"कौन बोला मल्लूह काका"
"अरे बेटा गाँव क्या, हम तो पुरा देश दुनियाँ का ख़बर रखते हैं"
"ई बात झूठ है मल्लूह काका" गंगुआ बोला।
"यार छोड़ो, पुरा उमर धूप में सूखा के दाड़ी-बाल नही पकाये हैं" मल्लूह काका ने तंज़ कसा।
गंगुआ झल्लाया बोला "मेरी पत्नी को जो आँख उठा कर देखेगा, हम उसका आँख निकाल लेंगे, ई धरती पर किसका औकाद है जो उसको छू देगा।"
मल्लूह काका भी तमतमा गये बोले "चल यार!!!! भौंकने वाला कुत्ता काटता नही है। उतने औकाद है तो अपना भाई को सबक सीखाओ। कन्या को दिन-दहारे कोई पीट दिया और मरद यहाँ मुँह से शेर बना फ़िर रहा है।"
गँगुआ की पत्नी सब बात सुन रही थी। पति के करीब आ कर कराहते हुए बोली "आप गलत नही हैं जी, लेकिन मल्लूह काका भी क्या गलत बोल रहे हैं। आखिर झगड़ा तो आज उहे लगाया। नही तो आज इतना बड़ा कांड होता क्या???? देखिये बकरी अभी तक में.... में..... कर रही है"
लोहा गर्म था और मुखीयाजी जो अब तक चुपचाप सारी बात सुन रहे थे, उन्होंने समझदारी से चोट किया "देख गँगुआ बात को गहराई से समझने की कोशिश करो। आखिर आज इतना बड़ा कांड किसके कारण हुआ और अगर तुम अब भी उसको सबक नही सिखाये तो तुम्हारा इस पंचायत में क्या इज्जत रह जायेगा।"
मुखियाजी की बात गंगुआ को तीर की तरह लगी। गिड़गिड़ाते हुए बोला "आप तो सब बात जानबे करते हैं मुखीयाजी। कितना मजबूरी में हम गुजर रहे हैं। मेरा हाथ भी खाली है। अब आप ही बताईये हम क्या करें।
मुखीयाजी गम्भीर हो कर बोले "यार हमलोग मर गये हैं क्या ???इज्जत के सामने पैसा क्या है जी!!!! और तुम्हारा इज्जत चला जाये और हमलोग तुम्हारे लिये पैसा का इंतिजाम भी नही कर सकें तो इस दुनिया में जी कर क्या करेंगे। चलो हमारे साथ. . ."
तीनों आदमी साथ चल दिये और पहुँच गये मुरली बाबू के यहाँ। मुरली बाबू की उमर साठ से कुछ ज्यादा होगी। मुखीयाजी को देखते ही बोले "क्या हुआ मुखीयाजी और ई गंगुआ के कन्या को आज कौन मारा हो!!! बड़ा घोर कलयुग आ गया है। लोग औरत पर भी बाते बात में हाथ उठाने लगा है"
मुखीयाजी कुर्सी पर बैठते ही बोले "सही बोल रहे हैं मुरली बाबू लेकिन लोग को पता नही है कि अभी मुखिया कौन है। हम ऐसन दुष्ट लोग को ऐसा सबक सिखायेंगे कि जिंदगी भर याद रखेगा।"
मुरली बाबू पान का पीक फेंकते हुए बोले "बिल्कुल मुखीयाजी!!! नही तो पंचायत बरबाद हो जायेगा। खैर मेरे पास कैसे आना हुआ।"
मुखीयाजी दर्द भरे सुर में बोले "गँगुआ का मुसीबत तो आप जान ही रहे हैं। अभी थाना जाना होगा। मल्लूहजी को साथ में इसलिए ले लिये हैं। बस आप दस हजार रुपया गँगुआ को चला दीजिये। बेचारा मुसीबत में है, इज्जत का सवाल है। इज्जत बच जायेगा तो रह सह के पैसा तो चुका ही देगा।"
मुरली बाबू पहले तो खूब ना-नुकुर किये लेकिन मल्लूह काका का इशारा मिलते ही बोले "पैसा हम मुखीयाजी आपके गारेन्टि पर देंगे और सूद सैकड़ो में दस (10% महीना) लगेगा।"
गँगुआ जो अब इंतिकाम की आग में जल रहा था, दस प्रतिशत महीना सूद पर भी पैसा लेने को झट तैयार हो गया। पैसा ले कर तीनों थाना पहुँचे। दरोगा साहब ने मुखीयाजी को राम !! राम !! बोला और बैठने को कुर्सी दी। मल्लूह काका दरोगा को एक कोने में खींच कर ले गये। कुछ देर बाद दोनों वापस लौटे। तबतक गँगुआ डरा-सहमा बगली झाँक रहा था कि आते ही दरोगा साहब गरजते हुए बोले कि तुही गंगुआ है जी ????
गंगुआ डरते हुए बोला "जी साहब !!! गौर लगते हैं दरोगा साहब "
दरोगा ने अपने चौकीदार को आवाज़ लगाई कि बांधो साले को और लगाओ सौ डंडा!!! साला के खून में ढेर गर्मी चढ़ गया है। मेरे क्षेत्र में गुंडागर्दी करता है!!! आज हम इसका सब नशा उतार देंगे!!!
मल्लूह काका अपनी हँसी छिपाते हुए बोले "अरे दरोगा साहब ई नही, इसका भाई है"
तब जा कर गँगुआ के जान में जान आई ......
अभी गँगुआ को मल्लूह काका भगवान के किसी अवतार से कम नही लग रहे थे।
तभी मुखीयाजी जो अब तक गमछा में मुँह छिपा कर ना जाने क्या कर रहे थे, गम्भीर होते हुए बोले "ए दरोगा साहब आप हमारे पंचायत के इज्जतदार आदमी से ऐसे बात नही कर सकते हैं।"
दरोगा ने अपना पैंतरा बदलते हुए बोला "अरे हमको समझने में गलती हो गया। खैर छोड़िये मुखीयाजी। बोलिये कैसे आना हुआ????"
मुखीयाजी ने गँगुआ की दर्द भरी दास्तान बड़े विस्तार में दरोगा को सुनाया !!!!!
दरोगा जी कानूनी धारा को याद करते हुए बोले "मुखिया जी आपके गँगुआ का इज्जत तो हम बचा लेंगे लेकिन इसमें खर्चा बहुत है। केस बहुत मजबूत बनाना होगा, जिससे जज तुरंत इसके भाई को अरेस्ट करने का ऑर्डर दे दे। बस खर्चा का आप इंतिजाम कर दीजियेगा।"
मुखीयाजी थोड़ा सख्त लहजे में बोले ए दरोगा साहब मेरे सामने घूसखोरी का बात नही कीजिये।
दरोगा भी गुस्सा में आकर बोला तब हम वही आकर इंस्पेक्शन करके केस बनायेंगे। ई गंगुआ का नशा तो हम उतार के रहेंगे मतलब गँगुआ के भाई का।
मल्लूह काका ने आगे आकर मामला सम्भाला "क्या आपलोग भी बच्चा की तरह बहस करने लग गये हैं, यहाँ गँगुआ के इज्जत की पड़ी है और आपलोग घूसखोरी के नाम पर लड़ रहे हैं। ए बेटा गँगुआ दो दरोगा साहब को दस हजार"
गंगुआ जो दरोगा के मुँह से अपना नाम सुन कर ही काँप जाता था। उसे उस समय मल्लूह काका साक्षात भगवान लग रहे थे। बस उनके आदेश का इंतिजार था और गंगुआ ने दस हजार दरोगा के कदमों में रख दिया।
पर ये क्या दरोगा साहब दस हजार देख कर तमतमाते हुए बोले "रे गँगुआ रे !!!! तुमसे भीख माँग रहे हैं जी , उठा पैसा यहाँ से , और चल निकाल यहाँ से"
गंगुआ को मानो 'काटो तो खून नही' की स्थिति थी। लेकिन अबकी मल्लूह काका तमतमा गये बोले ए दरोगा साहब गरीब आदमी है जो लाया है रख लीजिये और जो बच गया वो बाद में पहुँचा देगा। एक बात और गंगुआ मेरा बेटा दाखिल है,इसका इज्जत बचा लीजिए!!!!"
काफी मान मनौव्व्ल के बाद दरोगा जी ने दस हजार रुपया पॉकेट के हवाले किया लेकिन गंगुआ को चेतावनी भी दे दी कि केश का इंस्पेक्शन होने से पहले कम से कम दस हजार और पहुँचा दो....। नही तो केस उल्टा भी लिखा सकता है।
वहाँ से तीनों साथ-साथ वापस लौट आये। गँगुआ को शेष दस हजार की चिंता सता रही थी। घर आ कर देखा तो बीबी अब दर्द से कराह रही है। बकरी अब भी में...में... कर रही थी। तभी गंगुआ के दिमाग में एक आइडिया आया और उसने झट से कसाई बुला कर बकरी को सात हजार में बेच डाला। कसाई जब बकरी को ले जाने लगा तो गंगुआ की पत्नी फ़िर दहाड़ मार कर रोने लगी!!!! उधर दूसरी और गंगुआ का भाई भी मुँह छिपा कर रो रहा था कि आज छोट मोट बात के लिये भाई गाभीन बकरी बेच दिये।
लेकिन गँगुआ इस सबसे बेखबर झट से उस पैसा को दरोगा को दे आया। शाम को मल्लूह काका के यहाँ पंचेति हुआ। दरोगा साहब भी वहाँ मौजूद थे। गंगुआ की पत्नी से जब दरोगा ने मार-पीट के बारे में पूछा तो बोले बकरी बाँधने में गिर गयी थी। इसी गुस्सा से मालिक बकरी भी बेच दिये। गंगुआ कि पत्नी के इस झूठ से गंगुआ का इज्जत बच गया था। सभी लोग अपने अपने घर चले गये थे। सिर्फ दरोगा और मुखीयाजी ना जाने किस खुशी में पार्टी कर रहे थे। एक बात जो मुखीयाजी बार बार बोल रहे थे कि "मल्लूह जी सही में बहुत स्मार्ट हैं"
उधर इस सम्पूर्ण कहानी की जड़ वो बकरी कसाई खाने में बँधी अपने मौत का इंतिजार करते हुए में......में......में......में.... कर रही थी 😅😅😅😅
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१८. व्यंग्य // मास्टर सब सनक गया है .......!
चैत का महीना था। गर्मी की सुगबुगाहट लोगों को धीरे-धीरे महसूस होने लगी थी। शुरुआती गर्मी होने के कारण लोगों को मौसम सुहावना लग रहा था। गोधूलि बेला के समय सभी किसान-मजदूर अपने-अपने घर को चले जा रहे थे। गंगुआ भी अपने कंधे पर कुदाल लिये घर की ओर लौट रहा था कि तभी उसका सामना अपने लंगोटिया यार लठैत सिंह से हो गया। लठैत सिंह देखते ही जोर से पुकारा का रे गंगुआ चलेगा का बिंजी मेला देखने। सुने हैं बड़ा बढिया नौटंकी आया है।
"नही रे लठैत, तबियत ठीक नही लग रहा है" गंगुआ बोला।
"छोड़ यार!!! अब तू नही जायेगा, तो मैं भी नही जाऊँगा" लठैत ने भी मन बदलते हुए बोला।
लठैत ने फिर अचानक से गँगुआ को रोकते हुए पूछा "अरे गंगुआ, ई मास्टर सब काहे सनक गया है, सुने पटना में बड़ी लाठी डंडा चल रहा है। कई गो मास्टर लोग घायल हो गया है। एगो सरला बहन अनशन किये है। स्कूल के मास्टर लोग भी बच्चा सब का कॉपी जाँच नही कर रहा है। आखिर ई सब हो क्या रहा है, पढ़-लिख के एतना इज्जतदार आदमी लोग ऐसे काहे कर रहा है।"
गंगुआ थोड़ा गम्भीर हो गया। एक लम्बी साँस लेते हुए बोला "एक बात बताओ लठैत, तुम अभी आ कहाँ से रहा है????"
"मकई खेत से आ रहा हूँ, काहे कोई बात हुआ है क्या ???" लठैत ने चिंता भरे स्वर में पूछा!!!
"खेत में क्या काम अभी करवा रहा है???" गंगुआ ने फिर अगला प्रश्न पूछा।
"धे बुरबक, देख नही रहा है, दस गो मजदूर हाथ में कचीया लिये साथ में लौट रहा है। मतलब साफ है कि मकई कटवा रहा हूँ, और अभी खेत में सब लोग मकई कटवाने में ही परेशान है, बाँकि कौनो काम का अभी फुरसत किसी को थोड़े है" लठैत ने जवाब दिया।
गंगुआ ने फिर पूछा "ई बताओ कि ई मजदूर लोगन को क्या मज़दूरी देने का बात किये हो"
"अरे यार तुम गाँव में रह के क्या अनाफ-सनाफ पूछ रहा है। ई गाँव के बच्चा-बच्चे जानता है कि ए समय मजदूर लोग का मजदूरी दो सौ रूपया है और साथ में दोपहर में खाना देना पड़ता है" लठैत ने झल्लाते हुए जवाब दिया।
अब गंगुआ ने फिर कहा "आज तुम चार मजदूर को दो सौ के जगह अस्सी रूपया मज़दूरी देना!!!"
लठैत तमतमाते हुए बोला "यार तुम पगला गया है का जी!!!! एकौ कर्म ई लेबर लोग हमारा नही छोड़ेगा!!!! पुरा दुनियाँ जानता है कि दो सौ मजदूरी है अभी मकई कटाई का, सब मजदूर जब समान काम कर रहा है तो सबको समान मज़दूरी का पुरा-पुरा हक है। मजदूर लोगन में बड़ा एकता होता है। जिसको वाजिब मज़दूरी देंगे ऊ भी और जिसको अस्सी रूपया देंगे ऊ भी सब मिलकर मेरा इज्जत उतार देगा। रे बुरबक, ई पागलपन तुम्हारे दिमाग में आया कहाँ से है जी। ई बुद्धि से चलोगे तो पूरूख-दादा का कमाया सब इज्जत मिट्टी में मिल जायेगा। समान काम का समान मज़दूरी सबका कानूनी हक है। अगर हम मजदूर लोग के साथ ऐसा नाइंसाफी किये तो ना नीचे वाला मुझे माफ करेगा, ना ऊपर वाला!!! एक बात और बोल देते हैं - ऐहे बकलोल वाला अगर बुद्धि तुमको देना है तो आज से हम दोनों का दोस्ती ख़त्म!!! तुम क्या चाहते हो कि अलग-अलग मज़दूरी दे कर सब मजदूर लोग से हम दुश्मनी कर लें, जिससे कल कोई मजदूर मेरा काम करने नही आये। मेरा खेती-बारी, घर-गृहस्थी, मान-सम्मान सब बरबाद हो जाये!!! यही तुम्हारा सोच और तुम्हारी दोस्ती है!!! आज के बाद कभी कौनो मजदूर का वाजिब हक से हकमारी करने का सुझाव हमको नही देना!!! नही तो ऊ दिन हम भूल जायेंगे कि तुम मेरा दोस्त है!!! वही गर्दन मरोड़ देंगे!!! सब होशियारी निकल जायेगा !!! बड़ा आया मजदूर से हमारा झगडा करवाने वाला !!! आ थू.... आ थू..... !!!
गंगुआ इतनी बैज्जती के बाद भी ना जाने क्यों मुस्कुरा रहा था। उसने लठैत को मनाते हुए बोला "यार तुम तो जरा सा बात का बतंगड बना दिया!!! गल्ला मरोड़ने का बात करने लगा!!! अरे हम तो तुमको बस इतना समझाना चाह रहे थे कि जिस तरह मजदूर लोगों को समान काम के लिये समान मजदूरी का पुरा-पुरा हक है, उसी तरह सब आदमी को समान काम का समान हक है। इसी बात के लिये मास्टर लोग आंदोलन कर रहा है, लेकिन सब बोलता है कि मास्टर लोग सनक गया है।"
लठैत बिल्कुल सकपका गया "रे गंगुआ रे, तुमको पता है ना कि हम ज्यादा पढल-लिखल नही हैं। ज्यादा घुमा फिरा के बात करेगा तो हमार लाठी सीधे माथा पर बजरता है। हम सिर्फ इतना बात जानते हैं कि दसों मजदूर मकई काटा है और सबको बराबर दो-दो सौ रूपया देना है। अब तुम जो भी बोलना चाहता है एकदम क्लियर बताओ।"
गंगुआ लम्बी साँस लेते हुए बोला "हम सब लोग जानते हैं कि मास्टर लोग का वाजिब क्या वेतन होता है??? अप्पन स्कूल के बुढवा मास्टर को कितना तनख्वाह मिलता है, तुम भी जानता होगा लेकीन ई सरकार नियोजन के नाम पर एतना पढल-लिखल मास्टर लोगों का शोषण कर रही है। जब तुम्हारा मजदूर लोग इस नाइंसाफी को बर्दाश्त नही कर सकता है तो तुम सोच सकता है कि बिहार राज्य का चार लाख शिक्षक लोग क्या कर सकता है। ऐतना ही नही हम्मर सुशासन बाबू सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी मानने को तैयार नही है तब लोग सड़क पर आंदोलन करेगा कि नही !!!!
लठैत बिल्कुल आवाक हो गया "यार ई बात है, तब तो मास्टर सब बिल्कुल ठीक कर रहा है। अब कोई अप्पन हक का लड़ाई भी अगर नही लड़ सकता है तो आदमी में उसका जन्म ही बेकार समझो !!! ऐसन आदमी को तुम मुर्दा ही समझो!!! समान काम के समान वेतन सबके कानूनी हक है, ई दुनियाँ में सबको अप्पन कानूनी हक के लिये जी-जान से लड़ना चाहिये!!! इसपर अगर कोई ई लोग को सनकल कहे तो ऊ एकदम पागल और गँवार है।"
गंगुआ बाजी पलटते देख बोला "एगो गँवार तो हम्मर सामने भी है, जो थोड़ा देर पहले मास्टर लोग को सनकल बोल रहा था"
और दोनों खिल-खिला के हँसने लगे
😆😆😆😆😆😆😆😆😆😆
कुछ देर बाद एकाएक लठैत बोल उठा "यार गंगुआ!!! ई बताओ कि आखिर सरकार मास्टर लोग का बात मान क्यों नही रही है???"
गंगुआ थोड़ा सोच कर बोला "सरकार बोलती है कि राज्य सरकार के पास इतना धन नही है कि सब मास्टर को समान काम का समान वेतन दे सके।"
"भक मरदे!!! एगो मामूली मुखिया अप्पन, पंचायत चुनाव के टाईम में दो बीघा ज़मीन बेच कर चुनाव लड़ा और जीत के पाँच साल में दस बीघा ज़मीन खरीद लिया। मुखीयाजी अप्पन बेटी के शादी में बीस लाख रूपया खर्च किये अलग। ऐसन-ऐसन कितना मुखिया होगा। सरकारी अफसर सब हर साल लाखों-लाख का प्रॉपर्टी खरीद लेता है और मास्टर लोग के लिये पैसा ही नही है !!!! हमको ई बात में बिल्कुल दम नही लगता है। मास्टर लोग के साथ सब गरीब-लोग के बच्चा सब का भविष्य जुड़ा हुआ है। सरकार को चाहिये कि न्यायसंगत तरीके से सबकी परेशानी समझे और सब मास्टर लोग को समान काम का समान वेतन और ऊ क्या बोलते हैं समान सेवशर्त दे के सब मामला ख़त्म करे।"
"बात तो तुम अबकी एकदम होशियारी वाला किया है रे लठैत" गँगुआ बोला।।।
लठैत ने फिर अपनी जिज्ञासा जाहिर की "अरे गँगुआ!!! तुम्हारे ख्याल से और क्या कारण हो सकता है ????
गंगुआ बोला "देख भाई !! बात बोलेंगे तो बहुत लोग को बुरा लगेगा !!! लेकीन हकीकत हम ज़रूर बोलेंगे। सरकार जितना भी निर्माण कार्य करती है उसमे नेता-अफसर-इंजिनियर-ठेकेदार सबका कुछ ना कुछ हिस्सा होता है। सब मिलजुल कर बंदरबांट करते हैं, लेकिन मास्टर के वेतन में किसी को कोई हिस्सा नही मिलता है। इसलिए सरकार के साथ-साथ सब लोग चाहते हैं कि मास्टर का वेतन जितना कम से कम हो। पर सब नेता और अफसर लोग ऐसा नही है कुछ लोग शिक्षक के कानूनी हक का समर्थन भी करते हैं। हम तो एक बात ज़रूर बोलेंगे कि समान काम का समान वेतन सब लोग का कानूनी हक है और ई हर हाल में सरकार को देना होगा। इसके लिये सब मास्टर लोग मिल कर लड़ाई भी शुरू कर दिये हैं, जो हमको बिल्कुल जायज लगता है।"
कुछ देर सोचने के बाद लठैत सिंह फ़िर बोला "यार सुने हैं कि मास्टर लोग में भी कई ग्रुप है। सबका अपना डपली अपना राग है !!!"
गंगुआ हँसते हुए "तुम भी जो है ना लठैत गंवार का गंवार ही रह गया!!!! अरे यही तो राजनीति है!!! इस बार पंचायत चुनाव में तुम देखा मल्लूह काका भी मुखिया के चुनाव में खड़ा थे, जबकि ऊ खुद भी जानते थे कि ऊ नही जीतेंगे !!! अब तुम ही बताओ ऊ क्यों खड़ा हुए थे???"
"भक्क मरदे !!!! ई तो पुरा गाँव जानता है कि मल्लूह काका वोट काटने के लिये खड़ा हुए थे। उनका इलेक्शन का पुरा खर्चा भी मुखीयाजी ही उठाये थे जिससे बनारसी काका जैसा ईमानदार आदमी का वोट कट गया और ऊ चुनाव हार गये। ई मल्लूह काका के कारण ही ई बार फिर अप्पन पंचायत का मुखिया ऐसन बईमान आदमी बन गया !!! देखा नही रिजल्ट के दिन दोनों आदमी केतना गला मिल रहे थे!!! दोनों बैमानों के कारण बनारसी काका हार गये!!!"
"यही राजनीति है रे बुरबक" गंगुआ ने समझाया।
"मतलब सरकार कुछ दलाल नेता के बल पर मास्टर लोगों को बाँट कर अपना उल्लू सीधा करना चाहती है" लठैत अचानक से बोल पड़ा !!!!
"बिल्कुल !!! एकदम सही पकड़े हो!!! अँगरेज़ चला गया लेकिन अप्पन कुछ नाजायज औलाद सबको यहीं छोड़ के गया है। कोई मस्जिद के नाम पर पब्लिक को लड़ा रहा है!!! कोई धर्म के नाम पर !!! कोई आरक्षण के नाम पर !!!.कोई जाति के नाम पर !!! और तो और कोई अप्पन बड़का नेता होने के नाम पर !!! लेकिन यहाँ तो सुप्रीम कोर्ट भी मास्टर के साथ है। मास्टर क्या होम गार्ड, आँगनबारी सेविका , नियोजित डाक्टर, नियोजित इंजिनियर सबको समान काम का समान वेतन देना सरकार की वाजिब जिम्मेदारी है!!!"
लठैत सिंह ने हामी में सर हिलाया और रहस्यमयी मुस्कान के साथ बोला "अब हमको बिल्कुल समझ में आ गया कि आखिर कौन लोग सनक गया है!!! अबरी विधान सभा चुनाव में पब्लिक सब समझा देगा !!!!
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१९. व्यंग्य // हमारे देश को सिर्फ दुआओं की ज़रूरत है, दवाओं की नही.......!!!!
गाँव के चौपाल पर बड़ी भीड़ लगी हुई थी। हर कोई हाथ जोड़कर बाबा की कृपा पाने को लालायित थे। क्या महिला, क्या बूढे, क्या जवान और तो और गाँव के बच्चे भी इतनी श्रद्धा से बाबा के प्रवचन सुन रहे थे मानो बाबा की अनुकम्पा से आज सबकी सारी मुराद पूरी होने ही वाली थी। बाबा का भेष-भूषा भी कुछ ऐसा था जो उनके दिव्य होने का साक्षात अनुभव करवा रहा था। बाबा के बाल जैसे वर्षों से उसे साबुन-सेम्पू का दर्शन नही हुआ हो, उसकी लम्बी-लम्बी जटायें जैसे गंगा माँ अभी कुछ देर में ही उनकी जटा से गाँव में अवतरित होने वाला हो। ललाट पर लाल-काला-सफेद पेंट उनकी मुखाकृति को एक खास तेज प्रदान कर रहा था। शरीर से एक खास खुशबू आ रही थी लेकिन ना जाने क्यों गाँव की छोटी लड़कियां उनके समीप जाते ही नाक पर हाथ रख कर भौं सिकोड़ने लगती थी। ये अलग बात है कि गाँव की बूढ़ी महिलाएँ इसे बाबा का अपमान समझ कर बच्चों को ऐसा ना करने के लिये डाँट रही थी। दरअसल गाँव के लगभग हर तबके के लोग इस भक्तिमय माहौल में भाव-विभोर हो कर बाबा के एक-एक शब्द को आत्मसात कर रहे थे!!! मानो आज पुरा गाँव का कायापलट और समूल उद्धार होने ही वाला था।
दूसरी ओर गँगुआ की माँ घर के एक कोने में खाट पर तेज ज्वर और सिर के भयानक दर्द से तड़प रही थी। घर का कोई भी आदमी उनकी सेवा के लिये घर पर नही था। पिछले ढाई घंटे से उसे पानी की तलब महसूस हो रही थी, लेकिन बेहद कमजोरी के कारण वो बाबा के कार्यक्रम से उसके बहु बच्चे के वापस लौटने की बाट जोह रही थी। इस सबके बावजूद बुढिया को सबसे ज्यादा दुख इस बात का था कि जरूर उसने भुले-भटके कोई ऐसी बड़ी गलती की होगी, जो उसे आज इतना बड़ा दुर्दिन देखना पड़ रहा है। भेरौ बाबा का इतना बड़ा भक्त "अघोरा बाबा" उसके गाँव में उपदेश दे रहे हैं लेकिन वो बिछावन से भी नही उठ पा रही है। यही सोच-सोच कर उसे और भी ग्लानि हो रही थी और वो शर्मिंदगी से अंदर ही अंदर घुले जा रही थी। दूसरी और बाबा गाँव की सभी समस्याओं की जड़ शैतानी शक्ति को बता रहे थे और जो भी बीमार उनके पास इलाज को पहुँचते, अघोरा बाबा सबसे पहले अपने हाथ में स्थित जादुई झाड़ू से उनका जम कर धुलाई करते थे। कई बार तो कुछ बीमार लोग वहीं पर बदहवास हो कर गिड़गिड़ाने लगता, तब बाबा बोलते कि देखो गाँव वालों मेरे डर से शैतान गिड़गिड़ा रहा है और फिर तो बाबा का गुस्सा भी सातवें आसमान पर चला जाता और जम कर वो उसकी धुलाई करते थे। तब शैतान डर कर उड़न-छू हो जाता!!! हाँ कुछ देर के लिये वो बीमार आदमी बेहोश हो कर नीचे जमीन पर धम्म् से निस्तेज पड़ जाता तो बाबा उसे भूत-भभूत मल कर कुछ देर में खड़ा कर देते और फिर कराहता हुआ वो अपने परिजन के साथ अपने घर चला जाता था। उनके तत्काल चमत्कार करने के कारण ही इलाके के लोगों को उन पर बहुत ज्यादा भरोसा था।
इसी बीच गँगुआ का बेटा कुंदन दौड़ते हुए आ कर मुखिया जी को बोला ए दादा, दादी कुछ नही बोल रही है!!!! फिर क्या सबलोग बाबा को साथ लेकर गँगुआ के घर दौड़ पड़े!!! वहाँ गँगुआ की पत्नी जोर-जोर से दहाड़ मार कर रो रही थी!!! अघोरा बाबा ने बुढिया को देखते ही बोले राहु की काली दृष्टि और शनि के प्रभाव के साथ काली भूतनी ने भी अपना जादू चला रखा है!!!! गँगुआ की पत्नी बाबा के पैरों में गिरते हुए बोली कृपा करो महराज !!! बाबा ने पहले तो ना-नुक्कड़ किया लेकिन मुखिया जी के आग्रह पर बोले मैं प्रयास करता हूँ, हालांकि अब बहुत लेट हो चूका है!!! फिर तो उसने अपने झाड़ू से बुढिया कि ऐसी धुलाई की, कि पूछो मत!!!!! लेकिन काली भूतनी का असर जब कम नही हुआ तो अघोरा बाबा ने एक-दो बार उसे खाट पर ही उठा कर पटक दिया लेकिन सब बेकार!!! बाद में बाबा ने निराश हो कर कहा, माताजी को भैरो बाबा ने अपनी सेवा में बुला लिया है!!! वो तो गनीमत है कि मैं इस गाँव में था वर्ना ये काली भूतनी की छाया में पूरे गाँव को तबाह कर देती!!!! मैंने काली भूतनी और राहु का असर समाप्त कर दिया है लेकिन भैरो बाबा ने इसे अपना दासी बना लिया है!!! सबलोग अघोरा बाबा का जयजयकार करने लगे!!! कुछ देर में ही मुखीयाजी के आदेश से अर्थी उठाने की तैयारी होने लगी....
तभी गँगुआ अपने मित्र लठैत के साथ उसकी पत्नी को टेम्पो में लेकर गाँव पहुँचता है। ये लोग शहर के सरकारी हॉस्पिटल से लठैत की पत्नी जो माँ बनने वाली थी का चेक-अप करा कर लौट रहे थे। आते ही लठैत मुखियाजी से बोला कि मुखीयाजी दो रोटी कम खाना चाहिये लेकिन बाल बच्चा को जरूर पढ़ाना चाहिये। आज गँगुगा पढ़ा-लिखा है तब ना डाक्टर से ऐतना ढंग से बात कर लिया और फ्री में हमको दवाई भी दिला दिया और अपनी माँ के लिये भी दवाई ले कर आया है। हमसे तो साला कम्पोन्डरवा हमेशा पैसा ठग लेता है।
मुखीयाजी अभी कुछ नही बोल पाये थे कि अंदर से गँगुआ की पत्नी के रोने की आवाज़ आई। फिर तो गँगुआ और लठैत सरपट दौड़ा, लेकिन वहाँ का दृश्य देख कर दोनों के पाँव तले जमीन खिसक गयी। गँगुआ की पत्नी ने रो-रो कर सारा वृतांत गँगुआ को सुना दिया!!!! गँगुआ पहले तो खूब रोया फिर जोर से चिल्लाया कि अरे हम अघोरा का मर्डर कर देंगे!!!! ऊ हम्मर माय का जान ले लिया हो बाबू, जान ले लिया!!!
ऐतना सुनते ही चारो ओर खलबली मच गयी!!! सबने गँगुआ को खूब उल्टा सीधा कहा !!!
मुखीयजी आग बबूला हो कर बोले "रे गँगुआ, तुम्हारा बुद्धि भ्रष्ट हो गया है!!! या तुम थोड़ा सा शहर में पढ़ कर पगला गया है जो अघोरा बाबा के बारे में अनाफ-सनाफ बोल रहा है!!! अगर अघोरा बाबा गुस्सा गये तो पुरा गाँव का नाश हो जायेगा !!!!
गँगुआ गुस्सा से "चुप मरदे !!! बड़ा मुखिया बनता है !!!! हर हमेशा कोई ना कोई पूजा का चंदा के लिये ढोल पिटवा देता है लेकिन ई कभी नही हुआ कि गाँव में चंदा माँग के ही एगो अस्पताल खुलवा दें। चंदा के पैसा का तुम अप्पन चमचा-बेलचा के साथ किस प्रकार बंदरबांट करता है, सब हमको पता है। जब मेरी माँ कमजोर और बीमार थी तो अघोरा उसको पीटा काहे.... और पीटने पर जब ऊ बेहोश हो गयी तो खाट पर पटक के जान ले लिया.....!!!
चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था कि तभी लठैत बोला "गँगुआ बिल्कुल सही बोलता है॥ साला एक-एक गाँव में छः - छः मंदिर-मस्जिद मिल जायेगा लेकिन छः गाँव में एगो अस्पताल खोजने पर नही मिलता है। अरे मुखीयाजी मंदिर के दुआ भी तभी काम करता है जब बीमार लोग को सही दवा मिलता है।। लेकिन आपलोग और इस देश का बड़ा महान नेता लोग अस्पताल-स्कूल का बात तो कम करेंगे लेकिन मंदिर-मस्जिद पर हल्ला बहुत करेंगे। सरकारी अस्पताल में सही से दवाई मौजूद नही लेकिन कोई बोलने वाला नही है। स्कूल में बच्चा को टाईम पर किताब नही मिलता है लेकिन कोई जवाब देने के लिये तैयार नही लेकिन जब कोई हम गरीब लोग को सही रास्ता दिखाता है तो आपलोग बोलियेगा कि गँगुआ पगला गया है.....!!!!"
गाँव में भरी सभा में आज मुखीयाजी का फजीहत हुआ था!!! शर्मिंदगी से उनकी जुबान नही खुल रही थी लेकिन अपना खानदानी गुस्सा दिखाते हुए बोले "मैं तो लठैत जा रहा हूँ लेकिन देखते हैं कि अघोरा बाबा के श्राप से तुमलोग को कौन बचाता है।"
लठैत भी गुस्सा से बोला जा मरदे "अब जब तक गाँव में एगो अस्पताल नही बन जाये तुम कौनो पूजा के नाम पर चंदा माँगने आया तो टाँग तोड़ देंगे!!!"
तब तक बनारसी काका भी पहुँच चुके थे। सभी को शांत करते हुए बोले "यार डाक्टर लोग भी आजकल कम लुटेरा नही होता है लठैत!! कमीशन खाने के लिये फालतू जाँच लिखता है!!! ज्यादा कमीशन के लालच में महँगा ब्रांड का दवाई लिख देता है !!! गरीब आदमी को सब लूटने को तैयार है , तुम किस-किस का मर्डर करेगा रे गँगुआ !!!! गरीब आदमी जिसको भगवान का रूप मानता है साला वही गरीब के खून चूस लेता है!!! हम गरीब के पैसा से कुछ लोग विदेश में इलाज कराते हैं लेकिन हम गरीब को कई बार हॉस्पिटल में मरने के बाद घर तक छोड़ने के लिये एगो गाड़ी भी नसीब नही होता है !!! यहाँ डेग-डेग पर अघोरा है!!!
गरीब आदमी को दवा से ज्यादा दुआ की ज़रूरत है जिससे लालची इंसानों से गरीब लोग अपने को बचा सके......!!!
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२०.व्यंग्य // ऐसे तो भगवान और अल्लाह बेघर हो जायेंगे....!!
ब्रह्म-बाबा थान गाँव का एक मात्र ऐसा जगह था, जहाँ पूरे गाँव के बच्चे लोग बिना किसी भेदभाव के खेला करते थे। दरअसल ब्रह्म-बाबा थान के एक ओर बाभन टोली थी, जहाँ ब्राह्मणों की संख्या भले अधिक हो लेकिन सभी जाति के लोग वहाँ प्रेम-भाव से रहते थे। कुछ ही दूरी पर मुशहरी-टोला था जहाँ अधिकतर हरिजन और दलित-समुदाय के लोग के लोग निवास करते थे। ब्रह्म-बाबा थान के दूसरी ओर हाजी टोला था। यह एक बंगलादेशी मुसलमान बहुल गाँव था। ब्रह्म-बाबा थान दरअसल एक पीपल के पेड़ के नीचे का चबूतरा था जहाँ बाभन टोली के महिला और पुरुष अक्सर किसी शुभ कार्य से पहले पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद लेने आते थे। ब्रह्म-बाबा थान से बस कुछ ही दूरी पर हाजी साहब का मजार था जहाँ हिन्दु-मुस्लिम दोनों ही सिर नवाते थे। यह कुल दो बीघा का परती जमीन ना सिर्फ हिन्दु-मुस्लिम बच्चों के खेलने और व्यायाम का स्थान था बल्कि हिन्दु-मुस्लिम के साझा पूजा-स्थली और गंगा-यमुनी संस्कॄति और गाँव के लोगों के आपसी भाईचारे का केन्द्र था। दरअसल यह जमीन बाभन-टोली के बनारसी काका का था, जो कुछ वर्षों पहले गंगा-धार में चला गया था। गंगा-धार से बाहर निकलने पर सभी ने इसे ब्रह्म-बाबा का कृपा मान कर इसे ब्रह्म-थान का पूजा-स्थली बना दिया। बनारसी काका भी अत्यंत धार्मिक प्रवृति के व्यक्ति थे, अतः उन्होंने जमीन के बीचोबीच पीपल का पेड़ लगा कर विधिवत ब्रह्म-थान की स्थापना कर दी।
कुछ वर्षों पहले हाजी टोला के मस्जिद हाजी एतूबूर रहमान की अचानक टी.बी. बीमारी के कारण मौत हो गयी। हाजी साहब बनारसी काका के बड़े करीबी मित्र थे। हाजी साहब बड़े भले आदमी थे और थोड़े-बहुत तंत्र-मंत्र के जानकर थे। अतः समाज में उनकी काफी प्रतिष्ठा थी। इसी कारण हाजी टोला के मुसलमान भाई उनका मजार बनाने को इक्षुक थे। बनारसी काका की सहमति से ब्रह्म-बाबा से कुछ दूरी पर उनका मजार बन गया। हालांकि मल्लूह काका, लठैत सिंह और गाँव के मुखिया सहित गाँव के कुछ लोगों ने इस मजार का विरोध किया लेकिन बनारसी काका का जमीन होने के कारण किसी का कुछ नही चला।
कुछ ही दिनों में पंचायत चुनाव होने वाला था। बनारसी काका से 'मुँह की खाकर' मुखियाजी और मल्लूह काका अंदर से बहुत क्रोध में थे। इसी बीच मुखियाजी का सिपाही एक दिन ब्रह्म बाबा थान हो कर ट्रेक्टर ले जा रहा था कि एक अदभूत चमत्कार हो गया। ट्रेक्टर के फाड़े से खुद कर बजरंग-बलि साक्षात प्रकट हो गये। फिर तो चारों ओर से श्रधालुओं का जमावड़े सा लग गया। लठैत सिंह ने मुखियाजी के इशारे पर गाँव के बच्चों का खेल-कूद वहाँ बंद करवा दिया। हिंदू बच्चे तो बजरंग बलि के गाँव में आने से खुश थे लेकिन मुसलमान बच्चों को इस तरह वहाँ खेल बंद होना ठीक नही लगा। ये बच्चे लठैत की शिकायत ले कर अंजुमन काका के पास पहुँच गये। अंजुमन काका जो इस बार खुद भी मुखिया का चुनाव लड़ने को इक्षुक थे, उन्हें लठैत की ये कारस्तानी ना-गवार गुजरी। उन्होंने गाँव के कुछ मौलवी और हाफिज को साथ ले जा कर थाना में रिपोर्ट दर्ज करा दी कि मजार के जमीन पर कुछ कट्टरपंथियों ने कब्जा कर लिया है, जबकि हाजी टोला का एक-एक मुसलमान वहाँ ईदगाह बनाने को लालायित है। अगर प्रशासन ने इस जमीन को तत्काल कट्टरपंथियों से मुक्त नही कराया तो हाजी टोला का एक-एक मुसलमान अपनी जान की बाजी लगा कर अपने ईदगाह की जमीन हासिल करके रहेगा। अल्लाह के इस नेक इनायत को पुरा करने में हाजी टोला का मुसलमान ही क्या पूरे देश का मुसलमान भी अपनी जान की बाजी लगा देगा।
कुछ ही देर में ये ख़बर मुखीयाजी के कान में पहुँची फिर तो मानो कोहराम सा मच गया। आज सबसे ज्यादा मल्लूह काका गुस्सा में थे, गाँव के तमाम लोगों को इकठ्ठा कर बोले कि देखा गाँव वालों इस बनारसी बाबू के जिद्द के के कारण बाभन टोली के लोगों को क्या दुर्दिन देखना पड़ रहा है। ब्रह्म थान, जहाँ साक्षात बजरंगबली प्रकट हुए हैं, ये मुसलमान वहाँ ईदगाह बनाने के लिये थाना में कॉम्प्लैन किया है। अरे भाइयों अगर आज ये लोग हमारे बजरंगबली का जमीन छीन लेंगे तो कल को हमारे हिन्दु भाइयों का क्या होगा???
लठैत तभी गुस्सा से गरजा "ए मल्लूह काका, हमनी भी बजरंग बलि के पक्का भक्त हैं!!! वहाँ सिर्फ और सिर्फ बजरंगबली का भव्य मंदिर बनेगा!!! इसके अलावे और कुछ अगर कोई बनाने की कोशिश किया तो हम लोग खून की नदी बहा देंगे"
चारों ओर से ग्रामीण लोग बजरंगबली का जय... बजरंगबली का जय.... का नारा लगाने लगे!!!
इसी बीच वहाँ बनारसी काका भी पहुँच गये। गाँव वाले के भारी भीड़ और हिंसक माहौल को देख कर वो बिल्कुल घबरा गये। फिर भी उन्होंने हिम्मत से काम लिया बोले "रे मल्लूह रे !!! ई तुम क्या कर रहा है !!! अरे दुष्ट प्यार और भाईचारा की छोटी धारा बहाने के बजाय नफरत का आँधी लाना बहुत आसान होता है। मेरे प्यारे गाँव वालों सबसे बड़ा धर्म इंसानियत का है। इंसानियत का धर्म सबसे प्रेम करना सिखाता है। मंदिर मस्जिद के नाम पर हम आपस में लड़ कर भगवान को खुश करने के बजाय नाराज़ कर देते हैं। साम्प्रदायिक लड़ाई में भले कोई जीत जाये लेकिन मानवता और इंसानियत हार जाता है। इसलिये भाई लोग ब्रह्म थान में मंदिर या ईदगाह जो भी बने शांति से बनना चाहिये। किसी प्रकार का लड़ाई झगड़ा हम लोग आपस में नही करेंगे और अगर मेरी बात मानो तो ब्रह्म थान को दो बराबर भाग में बाँट कर एक भाग में मंदिर और एक भाग में ईदगाह बना कर मामला ख़त्म कर लेना चाहिये।
चारों ओर से गाँव वाले बनारसी काका के इस बात से सहमत दिखे। तभी बजरंगबली का पक्का भक्त लठैत बनारसी बाबू की जय..... बनारसी बाबू की जय.... के नारे लगाने लगा। सभी गाँव वाले भी बनारसी काका के इस विचार से खुश दिखे।
मुखिया जी इस बात से बिल्कुल नाखुश थे, उन्हे ये भी डर लग रहा था कि इस प्रकार बनारसी बाबू का परचम गाँव में लहराने से उनकी मुखिया की कुर्सी ना चली जाये। फिर क्या था राजनीतिक विरोधी धर्म, (जिसका एक मात्र काम और परम उद्देश्य अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदी का विरोध करना मात्र होता है) का अनुपालन करते हुए बोले "ए बनारसी बाबू !!! बाभन टोली का मान-सम्मान तो आप उसी दिन बरबाद कर दिये, जिस दिन ब्रह्म थान के बगल में हाजी का मजार बनवा दिये। अब वहाँ ईदगाह बनवा के सब हिन्दु का धर्म का सत्यानाश कीजियेगा, तो भगवान घर में बाप-दादा को क्या मुँह दिखाइयेगा, ई भी कभी सोचे हैं। अगर हाजी के दोस्ती में आप मुसलमान बन गये हैं तो हमलोगों को कम से कम अपना धर्म बचाने दीजिये। अबकी अगर आप ज्यादा टें-टें करके उपदेश दिये ना तो लठैत का एक डंडा आपका बुद्धि जगह पर ला देगा!!! समझे कि नही, ब्रह्म थान में सिर्फ और सिर्फ बजरंगबली का भव्य मंदिर बनेगा और कुछ नही !!!!!!"
माहौल में बिल्कुल सन्नाटा छा गया। अपने हिन्दु होने के दावे को चुनौती पा कर बनारसी काका अंदर से तिलमिला गये। मुखिया की बात उन्हे अंदर से झकझोर कर रख दिया, लेकिन कुछ ही पल में उन्होंने खुद को सम्भालते हुए कहा "अगर इस गाँव के सब लोगों का विचार है कि ब्रह्म थान में सिर्फ बजरंगबली का मंदिर बनना चाहीये तो गाँव वालों मुझे कोई आपत्ति नही है। आपलोग सभी कोई कल सुबह ब्रह्म-मूर्हत में अपने-अपने घर से चार-चार ईंट ले कर आईयेगा, कल ही बजरंगबली मंदिर का शिलान्यास होगा।"
सभी ग्रामीण बनारसी काका के बात से खुश थे और सबने एक सुर में सहमति व्यक्त किया और आज की आपातकालीन सभा समाप्त हो गयी।
पर इस सभा के बाद से ही मुखिया जी बहुत परेशान थे। दरअसल बनारसी काका भी इस बार मुखिया का चुनाव लड़ने की योजना बना चुके थे। अगर बनारसी काका के प्रयास से ब्रह्म-थान में बजरंगबली का मंदिर बन जाता है तो उनका राजनीतिक कॅरियर ही समाप्त हो जाने वाला था। यही चिंता उन्हें सता रही थी कि तभी मल्लूह काका वहाँ पहुँच गये। मल्लूह काका मुखिया जी के मिजाज को भांप गये और बोले कुछ करिये मुखिया जी नही तो अबकी आपका मुखीयागीरी का सत्यानाश हो जायेगा।
मुखिया जी ने अपनी लाचारी मल्लूह काका को बताई, तो मल्लूह काका मुस्कुरा के बोले कि आप गाँव वाला पी.सी.सी. सड़क के ठेकेदारी हमको अगर दे दीजिए तो हम कुछ कर सकते हैं।
मुखिया जी ने तत्काल मल्लूह काका की मनोकामना पूरी कर दी।
मल्लूह काका वहाँ से तुरंत हाजी टोला पहुँच कर अंजुमन काका को मंदिर के शिलान्यास सम्बन्धित सारी बात बताई। साथ ही बोले कि अरे अंजुमन मियाँ हम और मुखिया जी तो गाँव वाले को यहाँ तक समझाये कि जमीन दो बराबर हिस्सा में बाँट कर बजरंगबली का मंदिर और ईदगाह दोनों बना लो!!! गाँव के सबलोग तैयार भी थे लेकिन बनारसी बाबू सबको भड़का दिये और ब्रह्म थान में सिर्फ और सिर्फ बजरंगबली का मंदिर बनाने के लिये गाँव वाले को उकसा दिया है। अंजुमन काका के साथ-साथ हाजी टोला के सभी मुसलमानों का भी खून खोलने लगा। अल्लाह हो अकबर के नारे से माहौल गूँज उठा !!!!
अंजुमन काका ने माहौल को समझते हुए राजनीतिक नारा दिया "जो काफिर हमसे टकरायेगा, नेस्तनाबूद हो जायेगा"
अगले दिन सुबह-सुबह ब्रह्म बाबा थान में बाभन टोली के सभी लोग बनारसी काका के अगुवाई में हाथ में चार-चार ईंट ले कर बजरंगबली मंदिर के शिलान्यास के लिये अभी पहुँचे ही थे कि पहले से घात लगाये बैठे हाजी टोला के मुसलमानों ने अंजुमन काका के नेतृत्व में उन पर लाठी-डंडा और तेज हथियार से हमला कर दिया। दोनों ही ओर से जम कर लाठियां भांजी गयी। कई लोग घायल हुए, कुछ हिन्दुओं और मुसलमान भाई की जान भी चली गई। लठैत का दायाँ हाथ टूट गया, सबसे ज्यादा मार अंजुमन काका और बनारसी काका को पड़ी। अधिक उम्र और ज्यादा मार पड़ने के कारण दोनों की जान भले बच गयी हो लेकिन पंचायत चुनाव तक दोनों बिछावन पर ही पड़े रहे। बहुत दिन तक गाँव के साथ-साथ पूरे जिला में प्रशासन को कर्फ्यू लगा कर रखना पड़ा। बाभन टोला से मुखिया जी तो हाजी टोला से मौलवी साहब ने मुकदमा दायर किया। हाईकोर्ट में कई वर्ष से मुकदमा की सुनवाई चल रही है......।
इस बीच कई बार पंचायत चुनाव हो चुके हैं। हर बार मंदिर बनाने के नाम पर ही मुखिया जी चुनाव जीत जाते हैं। मौलवी साहब भी ईदगाह बनाने के नाम पर वोट पा कर सरपंच के पद पर कई वर्षों से सुशोभित हैं। इस बीच ये मामला अब विधान सभा और लोकसभा का मुद्दा भी बन चुका है....! चुनाव के समय हर बार ब्रह्म-बाबा थान मीडिया में बहुत बड़ा मुद्दा बन जाता है लेकिन वहाँ पर खेल-कूद कर बड़ा होने वाला गंगुआ इस बात से बहुत दुखी है कि आज उसके बेटा और गाँव के दूसरे बच्चों को खेलने के लिये कोई मैदान उपलब्ध नही है....!
और ना ही बजरंगबली को ही अपना घर ही मिल पाया है...!!!!
बनारसी काका निराश मन से बोलते हैं कि बेटा यह देश ज़रूर आजाद हो गया है लेकिन जब तक जनता अपने विवेक से ठोस मुद्दा को निर्धारित नही करेगी इस देश में भगवान और अल्लाह बेघर होता रहेगा.....!
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२१. व्यंग्य // वोट दिया तो अब झेलो.....!
"हाय रे मुखिया...., तोरा कीड़ा लगतौ....,
तोहार वंश नाश हो जाये रे कोढिया....,
तू अन्हरा हो जाओ...., मुखिया के बेटा मर जाये....,
ए दुर्गा मैया..... , ई धरती उलट जाये....,
सब पापी लोग को तू उठा लो .....,
लठैत का कुल नाश हो जाये.....,
बाबू हो बाबू.... , ए भोला बाबा हम केना जीयम....,
हे प्रभु !!! ई कौन दिन तू दिखा रहल ह....,
हमरा के उठा ल हे भोला बाबा....., हमरा के उठा ल....,"
मन्ती काकी की जुबान से ना जाने आज इस तरह के कितने श्रापों का लगातार बौछार हो रहा था लेकिन कलयुग में इस धरती पर भोला बाबा और दुर्गा मैया के पक्के भक्त मन्ती काकी की सुनने वाला कोई नही था। हर किसी के सुख-दुख में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने वाली काकी के दर्द भरी दास्तान को सुनने के लिये भी गाँव में आज कोई तैयार नही था। जर्जर हालत वाली उसकी झोपडी के अंदर टूटी खाट पर उसका जवान बेटा कराह रहा था और खाट के पास ही काकी की बहु के आँखो से लगातार अश्रु की धारा लगातार बह रही थी। आज इस परिवार के घर पर कयामत से पहले ही दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। घर का कमाने वाला इकलौता जवान बेटा गाँव के दबंगों से पैर तुड़वा कर अपनी लाचारी पर आँसू बहा रहा था। काकी की बहु ने जब घर के लोगों का पेट भरने के लिये मज़दूरी करने का निर्णय लिया तो दबंगों ने उसकी आबरू की ही धज्जियां उड़ा दी। अंजुमन काका पंचेति को तैयार नही हैं तो दरोगा साहब घर की बची खुची जमा पूँजी पर हाथ मार कर भी इस तरह बैठे हैं, जैसे कुछ हुआ ही नही हो.....!
गरीब पर हुए जुल्म और सितम का किसी को वैसे भी कोई परवाह नही होता है क्योंकि धरती पर उसका कोई सुनने वाला नही होता है। दरअसल जिस व्यक्ति के पूर्वजन्मों के पापों के कारण माता लक्ष्मी ही उससे नाराज हो, उससे किसी को डरने की कोई ज़रूरत भी नही होती है, इस दुनियाँ में माता लक्ष्मी की कृपा के बगैर किसी को न्याय पाने का भी कोई हक नही है और न्याय भी आपको तभी मिलेगा जब जुल्म करने वाले की अपेक्षा आप पर लक्ष्मी की कृपा ज्यादा हो। नही तो न्याय के दरवाजे पर वर्षों सिर पटकने के बाद भी गरीब आदमी माँ लक्ष्मी को और भी ज्यादा रुष्ट कर देती है और अंत में संदेह के आधार पर जुल्म करने वाले लोग बच जाते हैं। यह वर्तमान संसार के न्याय व्यवस्था का सबसे क्रूर और घिनौना सच है, जिससे कई बार इस उक्ति में संदेह होने लगता है कि क्या वाकई "सत्य की विजय होती है " । मन्ती काकी के दुख और व्यथा की कथा इस बात का सबसे जीवंत उदाहरण था। जहाँ गाँव का बच्चा-बच्चा सच्चाई जानता था लेकिन कोर्ट को सही निर्णय देने के लिये एक अदद गवाह भी नही मिल पा रहा था।
कुछ ही दिनों पहले की बात है, मन्ती काकी कितना खुश थी। मुखियाजी के चुनाव जीत कर आने पर वो सबसे आगे पहुँच कर अपनी दो दिन का मज़दूरी वाला रुपया खर्च कर माला खरीद, मुखिया जी को माला पहनाई थी। मुखिया जी ने भी उनसे कहा था कि मन्ती अब तुम्हारा सब काम हो जायेगा। तुमने जो चुनाव में मेरा इतना मदद किया है, भूखे प्यासे घर-घर जा कर मेरे पतंग छाप का प्रचार किया है, उसका तुमको हम बहुत ईनाम देंगे। अरे तुमको ही क्या अपने पंचायत के एक-एक गरीब को बी.पी.एल. और अंत्योदय मिलेगा। सब आदमी का इन्द्रा आवास बनेगा। बूढ़ा लोग का पेंशन कार्ड बनेगा और गरीब नौजवान का लेबर कार्ड बनेगा। कोई मेरे पंचायत में भूखा नही सोयेगा और किसी को बीमार होने पर इलाज कराने के लिये शहर नही जाना पड़े उसके लिये सबसे पहले हम एक बहुत बड़ा हॉस्पिटल भी बनवायेंगे। अगर शहर जाने का नौबत भी आया तो उसे शहर जाने में दिक्कत नही हो इसके लिये गाँव को पक्की सड़क के द्वारा शहर से जोड़ा जायेगा।भाईयो और बहनों हम अपना एक-एक वादा पुरा करेंगे और सबसे बड़ी बात कि जब तक हम मुखिया हैं किसी को भी कोई काम करवाने के लिये एक रुपया घूस देने की ज़रूरत नही है। फिर क्या था मुखिया जी की जय.... मुखिया जी की जय.... के नारों से धरती और आकाश गूँज उठा। जबकि इस गाँव का पत्ता-पत्ता और मिट्टी के धूल का एक-एक कण इस बात का गवाह थे कि ऐसे कितने ही वादे कितने ही मुखिया द्वारा होता रहा है लेकिन पाँच वर्ष पूरे होने के बाद भी पंचायत ने सिर्फ और सिर्फ मुखिया और उसके परिवार के सदस्यों, उसके चापलूस चमचों, ठेकेदारों, छुटभैया नेताओं और कुछ दबंग टाइप के गाँव के उनके विरोधियों का ही विकास देखा है। गरीबों ने विकास की ये बाते सिर्फ सुनी थी और इसी से वो खुश भी हो जाते थे ठीक उसी प्रकार जैसे गरीब के बच्चे कोई सामान या खिलौना नही मिलने पर दादा-दादी के इसी आश्वाशन से खुश हो जाते हैं कि सो जा बेटा भोला बाबा और परी रानी तुम्हारे सपने में आ कर इससे भी बढ़िया खिलौना और मिठाई देंगे।
अगले ही दिन मन्ती काकी को मुखिया जी का बुलावा आया। पहुँचते ही मुखिया जी ने मन्ती काकी से अपनी दर्द भरी दास्तां सुना डाला। बोले "क्या बोले मन्ती एक तुम ही हरिजन टोला में सबसे समझदार औरत हो!!! अब तुम ही बताओ ई दो महीना से चुनाव प्रचार में मेरा कितना खर्च हुआ ई पुरा इलाका जानता है। रोज़ तो कम से कम दो सो आदमी खाना खाता था, उसमें बहुत खाना खाने वाला हमको वोट भी नही दिया है!!! खैर ऊ लोग को तो हम सबक सीखा देंगे। अब अभी बी.डी.ओ. साहब का फोन आया है कि जीत की खुशी में शपथ ग्रहण से पहले पार्टी देना होगा। मतलब कम से कम पचास हजार का मामला है, अब बताओ क्या करें??? अगर खर्च नही करेंगे तो कल किसी का ग्रामीण आवास और लेबर कार्ड वाला कोई काम नही हो पायेगा। तुम सबको समझा-बुझा के बोलो कि जिसको-जिसको इन्द्रा आवास और लेबर कार्ड बनवाना है, एक-एक हजार रुपया जमा कर दे। अब तुम्ही बताओ जो लोग इस मुसीबत में मेरा मजबूरी समझेगा हम भी सबसे पहले उसी का काम न करवायेंगे।
मन्ती काकी को मुखिया जी कि बात पर दया आ गयी, और उसने मुशहरी टोला के घर-घर जा कर सबको बड़े प्यार से समझया। सब लोग मुखिया की बात पर भरोसा नही भी करते लेकिन मन्ती काकी की बात किसी से काटा नही गया और शाम होते ही मुशहरी टोला के गरीब लोगों ने मुखिया जी को एक लाख बाईस हजार रुपया भेंट कर मुसीबत से निकाल लिया। कुछ ने इन्द्रा आवास के लालच में, कुछ पेंशन के लालच में, कोई लेबर कार्ड के लिये तो कोई किसी और लालच में.......!!! मुखिया जी सभी गरीब लोगों को ना सिर्फ दिल से बहुत-बहुत धन्यवाद दिये बल्कि ये वादा किया कि पंचायत का काम शुरू होते ही उनलोगों का काम करवा देंगे। मन्ती काकी भी दो हजार रुपया किसी प्रकार व्यवस्था करके मुखिया जी को पहुँचा आयी। मुखिया जी ने सबसे पहला इन्द्रा आवास उसी का बनाने का वादा भी कर दिया।
ये दो हजार रुपया में एक हजार तो मन्ती काकी ने दस रुपया महीना सूद पर मुरली काका से उठाया था और एक हजार रुपया गाँव के बड़े लोगों के यहाँ बरतन मांज कर जमा की थी कि इस वार अपने झोपडी का मरम्मत कराकर अपने एकलौते बेटे का शादी करा देगी। मुखिया जी के बातों से आज मन्ती काकी बहुत खुश थी। जिसके खानदान में आज तक किसी ने पक्का मकान में नही रहा हो उसका बेटा-बहु पक्का मकान में रहेगा। बेटा का लेबर कार्ड बन जायेगा और सरकारी काम में मजदूरी करेगा तो मज़दूरी सीधे बेटा का बैंक खाता में आ जायेगा और उसको अपना भी क्या चिंता है, जिसके यहाँ बरतन धोयेगी उसी के यहाँ खाना मिल जायेगा। विधवा पेंशन मिलेगा अलग आराम से जिंदगी काट लेगी।
करीब छः माह हो गये लेकिन मुखिया जी ने मन्ती काकी का कोई काम नही करवाया। मन्ती काकी को मुखिया जी पर बहुत भरोसा था, लेकिन अपने बेटे के बार-बार कहने पर वो एक दिन मुखिया जी से मिलने गयी। मुखिया जी मन्ती को देखते ही रोने सा सूरत बना कर बोले, क्या बातायें मन्ती भलाई का ज़माना नही है!!! कभी-कभी मन करता है कि मुखिया का पोस्ट से रिज़ाइंड कर दें। अरे मूर्ख लोग सरकारी काम धीरे-धीरे होता है। सरकार का अपना नियम-कानून है। सरकारी मुलाजिमों को सब बात सही ढंग से समझ कर कागज बनाना पड़ता है। छोटा सा गलती हो जायेगा तो नौकरी ख़त्म हो जायेगा, लेकिन ई मूर्ख लोग को कौन समझाये कि हमलोग बैठे नही हैं!!! हम कोशिश कर रहे हैं और जितना आदमी तुम्हारे मार्फ़त पैसा दिया है सबका सारा काम जल्द से जल्द करवाने का प्रयास कर रहे हैं। अब तुम ई गंवार लोग को थोड़ा अपने से समझा देना कि सब लोग रोज़ सुबह-शाम भीड़ लगा के मेरा माथा खराब नही करे!!! नही तो मेरा मन गुस्साया तो जो भी काम होने वाला है, ऊ भी नही होने देंगे!!! मन्ती काकी मुखिया जी से कुछ नही बोल सकी और आकर अपने बेटे किशन को सिर्फ इतना ही बोली कि बेटा मुखिया जी लगे हैं!!! किशन थोड़ा गुस्सा हुआ फिर दस दिन बाद माँ को मुखिया से मिलने की हिदायत दे कर गाय को सानी-पानी देने चला गया। इसके बाद मन्ती काकी हर दस दिन पर मुखिया जी के यहाँ जाती थी। घंटों बैठती थी, मुखिया जी के यहाँ अक्सर बरतन धोने और गेहूँ फटकने का बेगारी भी करती थी। दो वर्ष बीत गये लेकिन मन्ती काकी का कोई काम नही हो पाया।
एक दिन किशन भी मन्ती काकी के साथ मुखिया जी से लड़ने के ख्याल से उनके यहाँ पहुँचा तो मुखिया जी ने किशन को बड़े प्यार से समझाया कि बेटा तुम्हारा काम हो गया है जल्दी से तुम अपना और अपने माँ का आधार कार्ड और आवासीय प्रमाण पत्र बनवा लो। किशन को ये दोनों कागज बनवाने में ही दो महीना लग गया। फिर मुखिया जी ने बोला बैंक में खाता खुलवा लो। मनेजर साहब बढिया आदमी थे एक दिन में खाता खोल दिये लेकिन प्रिंटर खराब होने के कारण छः माह तक किशन को पासबुक नही मिल पाया और किशन छः माह तक पासबुक के लिये बैंक का चक्कर लगाता रह गया। जब पासबुक ले कर मुखिया के पास पहुँचा तो मुखिया जी बोले बेटा किशन ज़माना बहुत खराब है। अरे तुम मन्ती का बेटा है इसलिये हम तुमसे एक पैसा नही लेंगे लेकिन अफसर लोग को कौन समझाये, सब टेबल पर कुछ ना कुछ लगता है। कम से कम दस हजार का व्यवस्था करो, तुम्हारा इन्द्रा आवास हम तुरंत बनवा देंगे और हाँ मन्ती को बोल देना उसके पेंशन का फॉर्म हम ले आये हैं कल आकर टिप्पा लगा देगी।
किशन बहुत निराश हो गया कि दस हजार रुपया वो कहाँ से लायेगा और गाँव में मजदूरी करके किसी तरह पेट पाला जा सकता है, दस हजार रुपया दो वर्ष में भी बचा पाना मुश्किल है। तभी उसकी मुलाकात हीरवा से हो गयी जो अगले दिन पंजाब जाने वाला था फिर क्या था किशन भी हीरवा के साथ पंजाब को निकल गया। एक वर्ष तक कठिन मेहनत के बाद वो वहाँ से दस हजार रुपया कमा कर लौटा। आकर देखा तो माँ बहुत बीमार है, उसने मुखिया को पैसे देने के बजाय माँ को शहर के डाक्टर से दिखाने को सोचा लेकिन माँ की जिद्द के आगे उसकी एक ना चली और वो सारा पैसा मुखिया के कदमों में रख आया कि मुखिया जी ई पैसा रख लीजिए और जल्दी से इन्द्रा आवास मेरा बना दीजिये। मुखिया जी ने इत्मीनान से पहले सारा पैसा गिना फिर उसे अपनी पत्नी के हवाले करते हुए बोले कि देखो बेटा किशन हम तुमको एक वर्ष पहले दस हजार बोले थे अभी इन्द्रा आवास का फंड भी बढ़ गया है। इसलिए अफसर लोग का कमीशन भी बढ़ गया है।
किशन बिल्कुल परेशान हो कर बोला "और कितना पैसा लगेगा मुखिया जी "
मुखिया बोले "बेटा ,पैसा तो बहुत लग रहा है!!! साला सब अफसर लोग का मुँह दिन पर दिन बड़ा होते जा रहा है। लेकिन तुम मन्ती का बेटा हो, जाओ तुम दस हजार और जमा कर देना !!! हम तुम्हारा काम करवा देंगे!!!"
किशन ने अपना सर पीट लिया लेकिन वो कर भी क्या सकता था। दुखी मन से घर लौटा तो देखा, माँ की तबियत बहुत ज्यादा ख़राब है। शहर के सरकारी हॉस्पिटल में ले जा कर दिखाया तो पता चला कि माँ को टी.बी. हो गया है।
अगले दिन किशन मुखिया के पास जा कर बोला कि "ए मुखिया जी माय को टी.बी. हो गया है। आप पैसा लौटा दीजिये। हमको अब इन्द्रा आवास नही चाहिये, अब हम माँ का इलाज करवायेंगे !!!"
मुखिया जी इतना सुनते ही गुस्सा से आग-बबूला हो कर बोले "रे गंवार, तुमलोग को कोई काम धंधा नही है जो रोज़-रोज़ मेरा माथा खराब करने आ जाता है!!! पैसा जमा किया तो हम उसको कागज आगे बढ़ाने में लगा दिये!!! पैसा यहाँ फ़ड़ता है कि तुमको लौटा दें !!! भाग यहाँ से..... और अब दस हजार हो जाये तभी हमको अपना मनहूस शक्ल दिखाना !!! चल यहाँ से भाग....., फुट यहाँ से..... !!!
किशन गरीब था लेकिन दिल का बहुत मजबूत था। लेकिन आज वो बहुत रोया !!!! उसने अपने बाप को नही देखा था लेकिन अपनी माँ को वो अपनी जान से भी ज्यादा चाहता था। पैसे का इंतिजाम करना बहुत मुश्किल था और ईलाज के बगेर उसकी माँ टी. बी. से मर जाती और वो अनाथ हो जाता। वैसे भी इस दुनिया में माँ के आलावे उसे और किसका सहारा था। घर जब पहुँचा तो माँ को देख कर वो और भी ज्यादा रोने लगा। माँ ने उसे समझाया कि रो मत बेटा हिम्मत रख!!!!
आज दुख है तो कल सुख भी आयेगा !!! मेरा अब कोई ठिकाना नही है। तुम अब जल्दी से शादी कर लो !!! बहु के लिये मैंने कुछ गहना बनवा कर बक्सा में रखा है। द्वार पर गाय माता है इसको बेच लो कुछ पैसा आ जायेगा । अपना घर बसा लो, बहु का मुँह देख लेंगे तो हमको मरने से पहले बहुत शांति मिल जायेगा।
किशन माँ की बात कभी नही काटता था, सो माँ के कहे अनुसार उसने गाय बेच कर बगल के गाँव के लुखरी से विवाह कर लिया। लुखरी भी गरीब घर की एक मेहनती लड़की थी। सांवली रंग का होने के बावजूद नक्शा-कटिंग बढिया था। सबसे बड़ी बात लुखरी मिलनसार और धार्मिक प्रविर्ति की लड़की थी। शादी के कुछ ही दिन बाद लुखरी ने किशन को अपने बक्से से गहना निकाल कर दिया और बोला इसे बेच कर माँ का ईलाज करा लो। अब तक किशन के दिमाग में ये बात नही आयी थी। उसने गहनों को बेच कर लगभग पच्चीस हजार रुपया पा लिया। पैसा पाते ही सबसे पहले माँ का बढिया डॉक्टर से ईलाज करवाया और जब माँ कुछ ठीक हो गयी तो शेष रुपया ले कर मुखिया जी के पहुँचा और बड़े गुस्सा से मुखिया को बोला कि देखिये मुखिया जी आज आपको हम दस हजार रुपया और भी दे कर जा रहे हैं। अब जल्दी से मेरा इन्द्रा आवास बनवा दीजिए नही तो अब जुल्म हो जायेगा।
मुखिया जी को किशन का ताव हज़म नही हो रहा था, लेकिन उनका एक उसूल था कोई कितना भी बुरा क्यों ना हो लक्ष्मी ले कर आने वाले का वो अपमान कम से कम उस दिन नही करते थे। आज उन्होंने बड़े प्रेम से किशन से बात की और सारा रुपया गिनने के बाद बोले "बेटा इसमें तो एक सो दस रुपया कम है!!! खैर जाने दो तुम मेरे बेटा दाखिल हो !!! अब तुमको एक रुपया देने की ज़रूरत नही है!!! जो पैसा घटेगा-बढेगा हम लगा देंगे!!!! लेकिन अब हम जितना जल्दी हो सके तुम्हारा इन्द्रा आवास बनवा देंगे।"
किशन आज बहुत खुश था कि लुखरी उसके जिंदगी में लक्ष्मी बन कर आयी है। देखते ही देखते सब समस्या ख़त्म होता जा रहा है। इन्द्रा आवास बनते ही वो फिर कुछ दिन के लिये पंजाब चला जायेगा। वहाँ खूब मेहनत करके ढेर पैसा कमा कर लायेगा और लुखरी का सब जेवर बनवा देगा। यही सब सोचते-सोचते वह घर लौट ही रहा था कि रास्ते में उसे हिरवा मिल गया बोला "अरे किशन इस बार पंचायत चुनाव में तुम किसको वोट देगा??? हमलोग तो बनारसी काका को इस बार मुखिया बनायेंगे !!!!! साला अभी का अपना मुखिया बईमान है !!!! पंचायत का सत्यानाश कर दिया !!!! तुम भी बनारसी काका को वोट देना वही तुम्हारा इन्द्रा आवास भी बनवा देंगे !!!!"
किशन आज मुखिया जी के बातचीत के तरीका से बहुत खुश था। बोला ना रे हिरवा अपना मुखिया भी उतना गलत नही है बस हमलोग सिस्टम से नही जाते हैं। आज हम सिस्टम से गये तो मेरा काम तुरंत हो गया।"
हिरवा आश्चर्य से किशन की ओर देखते हुए बोला "ई क्या बोल रहा है रे किशन तुम, पाँच वर्ष में तुम्हारा एगो इन्द्रा आवास नही बना और तुम मुखिया का गुणगान कर रहा है!!! पगला गया है क्या जी !!!!"
गरीब का दिल बहुत साफ होता है। आप अमीरों को लाखों-करोड़ों का चढ़ावा दे कर भी शायद खुश नही कर पायें लेकिन गरीब से दो शब्द प्रेम से अगर बात भी कर लो तो वो आपके लिये जान देने को तैयार हो जाता है। किशन के साथ मुखिया का आज का व्यवहार, किशन के मन में मुखिया के खिलाफ के पुराने सारे मैल को धो चुका था। उसने हिरवा को समझाते हुए बोला "नही रे हिरवा !!! हम ही मुखिया के पास सिस्टम से नही गये थे!!! अब देखना कुछ ही दिन में मेरा इन्द्रा आवास बन कर तैयार हो जयेगा!!!"
घर आ कर ये खुशखबरी उसने अपनी माँ और पत्नी लुखरी को दिया। लुखरी खुश थी लेकिन उसकी माँ किशन की पत्नी के गहने बिक जाने से थोड़ा दुखी थी, लेकिन बेटे और बहु को खुश देख कर वो भी खुश थी ।
कुछ दिनों के बाद मुखिया जी करीब पंद्रह-बीस आदमी के साथ हाथ में ईंट ले कर किशन के घर पहुँचे तो मन्ती को लगा कि आज उसके बेटे के इन्द्रा आवास का शिलान्यास होने वाला है। आज आते ही मुखिया जी ने सबसे पहले मन्ती काकी का पैर छू कर प्रणाम किया।बोले इस बार मन्ती भौजी यही ईंट छाप पर वोट डालना और डलवना है। मन्ती काकी ने अपने इन्द्रा आवास के बारे में मुखिया जी से जब पूछा तो मुखिया जी बड़े ही दुखी स्वर में बोला कि अभी तो आचार-संहिता लागू है।लेकिन हम तुम्हारा कागज बहुत आगे बढ़ा दिये हैं। इस बार सिर्फ चुनाव में जीत जाने दो सबसे पहले मन्ती भौजी तुम्हारा ही इन्द्रा आवास बनेगा। मुखिया जी द्वारा मन्ती काकी का पैर छू कर प्रणाम करने से किशन और लुखरी भी बहुत खुश थे सबने मिल कर ईंट छाप का खूब प्रचार किया।
उधर बनारसी काका भी घर-घर अपने बाल्टी छाप का प्रचार करने में लगे हुए थे। हिन्दु वोट दोनों में बँट जाने के कारण इस बार अंजुमन काका के पतंग ने बाजी मार ली।
पंचायत चुनाव में मुखिया के हारने से किशन और मन्ती काकी के साथ सब हिन्दु लोगों को बहुत दुख हुआ। सब बनारसी काका को दोष दे रहे थे कि अगर ई लोग आपस में नही लड़ते तो कोई मुस्लिम पंचायत का मुखिया कभी नही बनता। खैर चुनाव में हार-जीत होती रहती है। दो-चार महीना बाद सब लोग चुनाव का सारा बात भूल गये। इसी बीच लुखरी ने किशन को पुराने मुखिया के पास जा कर अपने इन्द्रा आवास के स्थिति के बारे में जानकारी मालूम करने को कहा।
अगले दिन सुबह-सुबह जब किशन पूर्व मुखिया के यहाँ पहुँचा तो मुखिया जी उसे देखते ही बमक गये। बोले अब यहाँ क्या लेने आया है रे किशना !!!! वोट दिया सब मिलकर बनारसी बाबू और अंजुमन मियाँ को अब हम्मर जलल पर नमक छिड़कने आया है!!!
किशन ने बड़े प्यार से समझाया "मुखिया जी हमलोग पर कम से कम संदेह ना कीजिये!!!"
मुखिया जी किसी शर्त पर किशन के बात को मानने को तैयार नही थे। गुस्सा से बोले एक मिनट में जो बोलना है बोल कर रास्ता पकड़ !!!!
किशन ने जैसे ही अपने इन्द्रा आवास का बात छेड़ा !!! मुखिया जी का गुस्सा सातवें आसमान पर था, लेकिन किशन भी आज आर-पार के लड़ाई के मूड में था। बोला रे मुखिया, आज या तो मेरा इन्द्रा आवास का कागज दो या मेरा टोटल बाईस हजार रुपया सूद के साथ लौटा दो!!!I
ऐतना सुनते ही बाभण टोली में कोहराम सा मच गया। बाभन टोली के सभी लड़का लोग का खून उबलने लगा कि ई मुशहर टोला का मामूली हरिजन बाभन टोला के बुजुर्ग से इस तरह बात करेगा। फिर क्या था सबने मिल कर उसे खूब पीटा और लठैत के एक जोरदार लाठी के प्रहार से किशन का दायाँ पैर टूट गया। किसी तरह मामला शांत हुआ लेकिन किशन को ना तो रुपया वापस मिला, ना ही उसका इन्द्रा आवास बना और ना ही उसे बुरी तरह पीटने वाले को कोई दंड.....!
इधर बिछावन पर पड़े-पड़े किशन की तबियत और भी खराब हुए जा रही थी कि एक दिन लुखरी भी गाँव की महिलाओ के साथ मजदूरी करने को चली गयी। किशन और पूर्व मुखिया के बीच दुश्मनी का सारा कहर लुखरी पर टूटा और मुखिया के कुछ गुंडो ने बीच सड़क से उसे उठा लिया और उसके आबरू की धज्जियां उड़ा दी......?????
पिछले कई दिनों से मन्ती काकी का ये विलाप अनवरत जारी है, लेकिन कोई उसके दर्द को सुनने और मदद करने को तैयार नही है.....!!!!
वर्तमान मुखिया अंजुमन काका के पास जब मन्ती काकी मदद के लिये पहुँची तो उन्होंने डाँट फटकार लगाते हुए कहा कि "बड़ा उसको वोट देती थी !!! अब भुगतो !!!!!"
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