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व्यंग्य // सबसे बढ़िया टियूशनिया मास्टर......!

      गाँव के चौपाल पर आज काफी गहमा-गहमी थी। लठैत सिंह गुस्सा से आग-बबूला था बोला "ए  बनारसी काका, ई देखिए तो कॉन्वेंट वाला प्रिन्सिपल साहब का केतना जुल्म है। कल मेरा बेटा फेंकना गाय को घास- पुआल देने गया था। गाय माता ना जाने क्यों पहले से बहुत  गुस्सा में थी। बस उसने फेंकना को अपने सींग  के बल पर उठा के पटक दिया। फेंकना मेरा बेटा है, लठैत सिंह का, इसलिए उसको कुछ खास चोट तो नही लगा लेकिन शनिचर वाला उसका स्कूल-ड्रेस का सत्यानाश हो गया। भोर में जब स्कूल का टेम्पो-गाड़ी आया तो फेंकना बहुत रो रहा था। उसकी माँ ने बहुत समझा-बुझा के सोमवार-मंगल वाला ड्रेस पहना कर, बढिया से तैयार कर स्कूल-गाड़ी पर बैठा दिया। अरे हम दोनों जन यही सोच कर अप्पन पेट काट कर उसको पढ़ा रहे हैं कि पढ़-लिख लेगा तो हमलोग के तरह खेती किसानी में अप्पन जिंदगी के मुरव्वत नही करेगा। अभी एक महीना पहले का बात है, मकई बेच कर सबसे पहले फेंकना का "टिप-टॉप पब्लिक स्कूल" में हम अड्मिशन करवा दिये। जानते हैं काका साला दो हजार अड्मिशन फीस लगा। नर्सरी का बच्चा का साढ़े-आठ सो रुपया किताब में लग गया। तीन सेट स्कूल-ड्रेस लेना पड़ा, साला उसमें करीब चौबीस सो रुपया लग गया, मरदे तनी-गो लम्बा जैसन एगो कपड़ा गला में लटकाने के लिये दिया, ऊ क्या बोलते हैं टाई  उसके साथ में एगो बेल्ट दिया, उसका भी ढाई सो रुपया लगा। दस दिन भी फेंकना स्कूल नही गया होगा कि तीन महीना का अड्वान्स स्कूल फीस का इक्कीस सो रुपया का बिल भेज दिया, और जानते हैं ऊ बिल पर लिखा था कि अगर दस दिन के अंदर बिल जमा नही हुआ तो प्रतिदिन पाँच रुपया के हिसाब से लेट फाइन देना होगा।  मरदे यूरिया खेत में छिटने के लिये जो थोड़ा बहुत पैसा बचा कर रखे थे, ऊ भी जा के जमा कर आये हैं।

         ऐतना लम्बा चौड़ा भाषण सुन-सुन के चौपाल पर सबका कान पकने लगा था। गँगुआ ने बीच में ही टोकते हुए बोला "अरे लठैत  कॉन्वेंट में ई सब खर्चा तो लगबे करता है!!!!  तुम अप्पन बड़प्पन और वाहवाही लूटने के लिये ई डींग-पतरा हाँकना बंद करो!!! और सीधा-सीधा ई बताओ कि 'टिप-टॉप पब्लिक स्कूल' के प्रिन्सिपल क्या जुल्म किया है!!! पढ़ा तुम अपना बेटा को रहा है, और समूचे गाँव वाले को फालतू का राम कहानी काहे सुना रहा है!!!"
            गँगुआ की बात सुनते ही चौपाल पर सभी खिलखिला कर हँसने लगे। लठैत जो पहले से ही गुस्सा में था और भी ज्यादा गुस्सा हो गया और अपनी लाठी ले कर गँगुआ को मारने दौड़ा, "बोला साला हम्मर बेटा को कल दिन-भर प्रिन्सिपल क्लास के बाहर खड़ा रखा। फेंकना को बोला शेड्यूल के हिसाब से अगर स्कूल-ड्रेस पहन कर नही आओगे तो क्लास में बैठने नही मिलेगा।
स्कूल का रुल का पालन करो नही तो स्कूल मत आओ। अनुशासन के बगेर पढ़-लिख कर भी कुछ नही कर पाओगे। तुम्हारे जैसे ही कुछ बच्चों के कारण बड़े-बड़े स्कूल की प्रतिष्ठा समाप्त हो जाती है, अरे प्राइवेट स्कूल के कारण ही आज बिहार में शिक्षा बचा हुआ है। मेरे जैसे प्रिन्सिपल लोग किसी भी शर्त पर स्कूल के नियम-कानून से मजाक बिल्कुल पसंद नही करते हैं। जब तक नया ड्रेस नही सिलवा लेना स्कूल नही आना, और आज स्कूल का ड्रेस-कोड तोड़ने के लिये पापा को पाँच सो रुपया फाइन तीन दिन के अंदर जमा कर देने बोलना नही तो स्कूल से निकाल दिये जाओगे!!!!
और एतना बड़ा बात  गँगुआ तुमको डींग-पतरा लग रहा है!!!

           गँगुआ ने एक बार फिर मजाकिया लहजे में पूछा "ए  लठैत, हमको कुछ समझे में नही आया!!! एक बार फिर से समझाओ !!!! "
लठैत अब बिल्कुल गरजते हुए बोला "ए बनारसी काका इसको समझा दीजिये!!! हमसे अभी मजाक नही करेगा!!! हम पहले से बहुत टेंशन में हैं !!! मेरी पत्नी कल शाम से खाना नही खायी है, जब घर जाते हैं एकै बात का रट्टा लगाये है कि बेटा का नाम कॉन्वेंट से अगर कट गया तो हम ज़हर-माहुर खा लेंगे। ऐसन जिंदगी जी कर हम क्या करेंगे जो अप्पन बेटा को भी ढंग से पढ़ा लिखा नही सके!!! ए फेंकना-बाबू किसी तरह फेंकना का नाम स्कूल से नही कटने दीजिये!!! नही तो हम जिंदा नही रह पायेंगे!!! फेंकना अलग कल से हमसे बात नही कर रहा है कि जब आपको बोले थे कि बिना शेड्यूल वाला स्कूल ड्रेस पहने हम स्कूल नही जायेंगे तो आप हमको स्कूल काहे भेजे??? अब आप ही बताईये बनारसी काका खेत में अभी यूरिया भी नही पड़ा है, वर्षा नही हुआ तो महँगा डीजल खरीद के पानी भी पटाना पड़ेगा। स्कूल ड्रेस सिल्वाने का पैसा रहता तो हम ड्रेस सिलवा नही देते। मान लीजिये अगर ड्रेस किसी से कर्ज़ा-बयान कर सिलवा भी दिये तो ई टिप-टॉप का प्रिन्सिपल को हम पाँच सो का फाइन किस बात का दें????? अब आप ही बताईये बनारसी काका ई प्रिन्सिपल का जुल्म है कि नही!!!!

        गँगुआ अब लठैत के कंधे पर हाथ रखते हुए बोला कि देख लठैत हम तुम्हारा मुसीबत खूब समझते हैं लेकिन ज्ञान  के सौदागर और शिक्षा-माफियाओं ने आज देश में एक ऐसी समांतर-व्यवस्था खड़ी कर दी है जहाँ जिनके पॉकेट में पैसे नही हैं, वो अपने बच्चों के लिये अच्छी शिक्षा भी नही खरीद सकते हैं। गरीब के बच्चों के लिये प्राइवेट स्कूल के टिप-टॉप को मेंटेन करना बहुत मुश्किल होता है। गुरु-शिष्य की संस्कृति वाले इस देश में हर चौराहे पर एक द्रोणाचार्य अपनी दुकान खोल कर बैठा है। फर्क सिर्फ इतना है कि  गरीब घर में पैदा होने वाले एकलव्य को गुरुदक्षिणा के रूप में भले अँगूठा देना नही पड़ता हो, लेकिन अपने बच्चे  को बढ़िया शिक्षा दिलवाने में गरीब एकलव्य के माँ-बाप और अभिभावकों को रोज़ एक नई परीक्षा देनी पड़ती है। शोषण और दोहन का ये खेल आज अपने चरम पर है। माँ-बाप अगर हर परीक्षा में पास हो भी जाये तो एकलव्य को अपना मुकाम मिलना उतना आसान नही होता है। पैरवी-पहुँच के साथ घुस के लिये मोटी रकम की भी ज़रूरत होती है और यही कारण है कि फेंकना जैसा एकलव्य आज के द्रोणाचार्य के गुरुकुल में हर क़दम पर अपमानित हो कर हीन भावना का शिकार होता रहता है। कितना ही फेंकना और फेंकना माय का जिंदगी इसी खींच-तान में हर वर्ष तबाह हो रहा है। परेशान मत हो, रे लठैत कल हम तुम्हारा बेटा का ड्रेस भी सिलवा देंगे और पाँच सो फाइन भी जमा कर देंगे।

      बनारसी काका भी गम्भीर हो कर बोले "गँगुआ बिल्कुल ठीक बोलता है। अरे तुम एगो लठैत के बेटा का फीस जमा कर देगा लेकिन इस देश में ऐसा कितना ही फेंकना है उसका क्या होगा ??? एक हमारा ज़माना था, गुरूजी घर से पकड़ कर ले जाते थे। पेड़ के नीचे ही बौरा बिछा कर बैठते थे। खूब जिद्द करने पर बाबूजी स्लेट-पेंसिल  और बाल-पोथी ला देते थे। शहर जा कर मिड्डिल स्कूल में नाम लिखवा लेते थे। बड़ा टाइट पढाई होता था सरकारी स्कूल में। लेकिन आज बिना ट्यूनशन के बच्चा  कुछ नही कर पाता है। गरीब आदमी कैसे अपना बच्चा को पढ़ायेगा। सही में सरकारी स्कूल के मास्टर सब को इसके बारे में जरूर सोचना चाहिये !!!!"
   

     ऐतना सुनते ही गाँव के हेड मास्टर शुशील बाबू का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। चौपाल पर सबको सम्बोधित करते हुए बोले
"सरकारी अध्यापक क्या है और इनके आज क्या-क्या कार्य  है ? आपलोग को किसी को पता है ??
1:- सरकारी अध्यापक एक अवतार है!!!
2:- उनके दस हाथ और चार दिमाग होते हैं!!!
3:-वो सभी विषय सभी कक्षाओं में एक साथ पढा सकते हैं !!!
4:- वो सभी बच्चों को खाना खिला सकते हैं वो भी हिसाब लिखकर !!!
घर पर माँ भी खाना तो खिलाती है पर हिसाब नहीं रखती कि मेरे लाल ने आज 100 ग्राम खा लिया और बाद मे क्या बचा ?????
5:- वो बच्चों का डाॅक्टर भी है कि बच्चे के पेट मे कीड़े तो नहीं; कहीं आयरन की कमी तो नहीं और वो इसके लिए टेब्लेट भी खिलाते हैं |
6:- वो बिल्डर भी हैं ; विद्यालय सम्बन्धित भवन बनवाता है;
7:- वो एक अकाउंटेंट भी हैं कैश बुक लिखता है; वो एक लीपिक भी है जो दिन भर अपनी आत्मा को मारकर डाक पीटता है;
8:- वो एक मार्केटिंग करने वाला भी है क्योंकि जिस बच्चे को घर वाले नही पढाना चाहते या जो बच्चा पढ़ना नहीं चाहता उसे विद्यालय लाने का जतन करते हैं;
9:- वो एक ऐसी गाय है, जो भी आएगा उसका दूध निकाल ले जाएगा, वो गाय जिसके सिंग काट दिए गए हैं;
10:- वो चित्रगुप्त भी है उसे घर-घर में 6 साल के बच्चों का पता होता है, 18 साल वालों का भी पता होता है, आगमन वाले पलायन वाले सभी का पता होता है ;
11:- वो जनगणना भी करते हैं;
12:- वो निर्वाचन आयोग के लिए वोट भी बनाता है;
13:- देश के सभी चुनाव भी इन्हीं के जिम्मे होते है;
14:- अब नया कार्य बच्चों के आधार कार्ड बनवाने का मिल गया है;
15.शिक्षक ही एक मात्र ऐसा सरकारी व्यक्ति है जिसे कोई भी ग्रामीण कुछ भी आकर कह जाता है यहाँ तक कि मार भी जाता है ; जिससे न तो किसी को भय होता है और जिसकी न ही कोई इज़्ज़त है।
इसके वावजूद भी लोग कहते हैं कि मुफ्त का वेतन लेता है!!!!
16. शिक्षक एक मात्र प्राणी है जिसपर निगरानी के लिए असंख्य विभाग हैं कभी dm कभी dpo कभी deo कभी bdo कभी co कभी beo कभी मुखिया कभी वार्ड सदस्य कभी सरपंच तो कभी ग्रामीण और न जाने कितने पदाधिकारी....?????  सबसे बड़ी बात कि कोई भी  इसलिए निगरानी नही करता कि शिक्षा व्यवस्था सुदृढ़ हो बल्कि इसलिए कि अधिक से अधिक लूट-खसोट कर सकें ।
कुछ छुट गया हो तो आप लोग लिख लेना डायरी मे आगे आने वाली पीढ़ी जानेगी कि डायनासोर के बाद एक जीव और आया था धरती पर!

     सुशील बाबू का भाषण ख़त्म होने से पहले ही आधा आदमी चौपाल छोड़ कर जा चुके थे और जो बचा वो भी तुरंत ही घर को चल दिये। अगले दिन फिर से फेंकना खुशी-खुशी स्कूल जाने लगा था। करीब दो महीना के बाद गँगुआ का साला एक दिन लठैत के यहाँ पहुँचा तो लठैत  ने उसकी खूब खातिरदारी की और बोला कि आप अंग्रेजी के बढ़िया जानकर हैं, थोड़ा फेंकना का टेस्ट ले लीजिये??? गँगुआ के साला जीत्तन बाबू ने फेंकना को सब किताब लाने को बोला। किताब देखते ही बोले कि अरे इसी कंपनी का तो मेरे पास एजेंसी है। हमलोग प्राइवेट-स्कूल वाला को इस पर साठ परसेंट कमीशन देते हैं। लठैत की बीबी ने माथा पीट लिया बोले पहले पता रहता तो कितना पैसा बच जाता। खैर इस बार भाईजी नेका क्लास में आप ही किताब ला दीजियेगा। इस पर जीत्तन ने समझाया कि देखो बहन प्राइवेट स्कूल वाला बहुत चालू होता है!!! कमीशन कमाने के लिये हर वर्ष किताब बदल देता है जिससे कोई बच्चा अगला क्लास वाला बच्चा का किताब नही ले सके। कुछ स्कूल तो ड्रेस भी बदल देता है!!! हर वर्ष नये ढंग से बच्चा का अड्मिशन भी करवाना पड़ता है!!! एतना सोचोगी तो बच्चा को कॉन्वेंट में नही पढ़ा सकोगी। बस इतना मनाओ कि खर्चा जो भी हो, बच्चा ठीक से पढ़ ले!!! इसके बाद उन्होंने फेंकना का टेस्ट लिया और फेंकना टेस्ट में बुरी तरह फैल हो गया।

       लठैत और उसकी बीबी ने माथा पीट लिया लेकिन अगले ही दिन लठैत सिंह "टिप-टॉप पब्लिक स्कूल" के प्रिन्सिपल के पास झगड़ा करने के ख़याल से पहुँचा तो पता चला कि टीचर-डे  का तैयारी चल रहा है। प्रिन्सिपल साहब टीचर डे के कारण दस दिनों तक किसी गार्जियन से नही मिलेंगे। निराश मन से लठैत घर लौट आया लेकिन शाम को फेंकना ने उसे एक बिल ला कर दिया जिसमें टीचर-डे प्रोग्राम के लिये पाँच सो रूपये डोनेशन दो दिन में जमा करने को बोला गया था। फेंकना का नाम नही कट जाये इसलिए उसने मुरली बाबू से सूद पर पैसा उठा कर स्कूल के एकाउंटेंट के पास  जमा कर दिया।
दस दिन के बाद जब लठैत फिर प्रिन्सिपल से मिलने पहुँचा तो स्कूल के एक कर्मचारी ने कहा कि आपका जो भी समस्या है आप लिख कर दें। प्रिन्सिपल साहब ज़रूरी समझने पर आपको अंदर बुला लेंगे। बड़ी मुश्किल से लठैत ने स्कूल के बाहर गुमटी में एक एम॰ए. पास पान-दुकान वाले को पचास रुपया दे कर आवेदन लिखवाया। आवेदन जमा करने पर स्कूल के चपरासी ने उसे दो दिन बाद आकर मिलने को कहा। लठैत निराश मन से वापस लौट आया लेकिन दो दिन बाद जब गया तो प्रिन्सिपल ने उसे तुरंत अपने कमरे में बुला लिया। लठैत के सामने ही फेंकना के क्लास टीचर को प्रिन्सिपल ने अंग्रेजी में खूब डांटा!!! लुसी मेम पहले तो चुप रही लेकिन जाते समय अंगेजी में कुछ बोल कर चली गयी। लठैत को दोनों की बात  कुछ भी समझ में नही आ रही थी, सो लुसी मेम के कमरे से बाहर जाते ही लठैत गिड़गिड़ाते हुए बोला, ए सर हम अपना बेटा को पढाने में तबाह हो गये हैं, और उस पर भी हमार बेटा फेंकना कुछ काहे नही जानता है ????
   

      प्रिन्सिपल साहब ने लठैत को बड़े प्यार से समझाया कि आपका बेटा को स्कूल का रुल तोड़ने के लिये कई बार फाइन किया गया, इसके बावजूद आपलोग लापरवाह बने रहे!!! ये बताईये कि घर पर उसका होम वर्क कौन पुरा करावाता है ???
लठैत लगभग रोते हुए "ए मरदे हम दोनों मरद-औरत बिल्कुल अनपढ़ हैं, ई होमवर्क क्या होता है हम नही जानते हैं !!! आप जल्दी से उसका स्थिति सुधार दीजिये !!! आपका जिंदगी भर हम आभारी रहेंगे।।।
प्रिन्सिपल साहब ने समझाया कि देखिये फेंकना पढ़ने में बहुत कमजोर है। हमारा टिप-टॉप पब्लिक स्कूल सब बच्चा पर पुरा ध्यान देता है लेकिन अगर कोई गार्जियन हमारा सपोर्ट नही करता है तो हम उसके बच्चे को अगले सेशन में स्कूल से निकाल देते हैं!!!
लठैत फेंकना के स्कूल से निकालने की इस धमकी से बिल्कुल तिलमिला गया। गुस्सा से बोला "ए मरदे सीधा ढंग से ई बताओ कि मेरा फेंकना का स्थिति कैसे सुधरेगा ??? ई हर बात में स्कूल से निकालने का धमकी मत दो!!!

      प्रिन्सिपल साहब ने थोड़ा सीरियस हो कर बोला "देखिये लठैत जी आप फेंकना को किसी बढ़िया टीचर से ट्यूशन दिलवा दीजिए।
लठैत हैरत से "मरदे ई ट्युशन क्या होता है ??"
प्रिन्सिपल ने समझाया "फेंकना को कोई बढ़िया टीचर पर्सनली एक घंटा पढ़ाए, तभी कोई उपाय है"
लठैत गुस्सा से "अरे भाई, तो पढाओ ना, जितना मन है पढाओ !!! रोका कौन है ???"
प्रिन्सिपल ने फिर समझाया कि इसके लिये आपको हर महिने एक हजार रुपया अलग से जमा करना होगा!!!
लठैत गुस्सा से अब तक आग-बबूला हो गया था, उसने आव देखा, ना ताव और झट से प्रिन्सिपल का कालर पकड़ कर दस-बीस झापड़ रसीद कर दिया!!!
किसी तरह स्कूल के अन्य स्टाफ ने बीच-बचाव कर लठैत को टिप-टॉप कॉन्वेंट से बाहर किया। लेकिन कई घंटों  तक लठैत बड़बड़ाता रहा कि ई साला  हमको काहे नही बताया कि सबसे बढ़िया  "टियूशनिया मास्टर" होता है....! मेरा फेंकना का जिंदगी बरबाद कर दिया। हमारा पुरा परिवार बरबाद हो गया, हम इसका जान ले लेंगे.... !

     फेंकना अब गाँव के स्कूल में ही पढ़ता है। पढ़ने के साथ-साथ गाय-बकरी भी चरा लेता है और सबसे बड़ी बात स्कूल का स्वादिष्ट खीचरी खा कर मस्त रहता है......!

- बिपिन कुमार चौधरी

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