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व्यंग्य // जनता ने हड़काया तो ई.वी.एम. खराब है......😎😎😎

       गाँव के  चौपाल पर आज एक बहुत महत्वपूर्ण गरमागर्म बहस  छिड़ चुका था।  गंगुआ बड़े गुस्से में तमतमाते हुए बोला "देखो भाई ईमानदार होने  का ढोल पीटना बहुत आसान है, लेकिन सचमुच में ईमानदार होना बहुत मुश्किल है। सबसे बड़ी बात एक बेईमान आदमी के नज़र में कोई ईमानदार हो ही नही सकता है और इससे भी बड़ी बात यह है  कि दुनियाँ में अधिकांश लोग इसलिए ईमानदार बनें बैठे हैं क्योंकि उसको बईमानी का अब तक मौका ही नही मिला है।"
      लठैत को भी गुस्सा आ गया, बोला "ज्यादा ज्ञान मत झाड़ो और सबसे पहले तुम्हीं बताओ कि तुम और तुम्हारा नेता लोग किस कोटि में है!!!!"
गंगुआ ने लठैत को समझाया कि देखो भाई हम जानते हैं कि तुम घर से भौजाई से लड़ कर आया है और गुस्सा झुठो हम पर उतार रहा है!!!! अरे ओतने खून में ताव है तो तनी जाके मुखियाजी से लड़ो कि तुम्हारा इन्द्रा-आवास अब तक काहे नही बना है....। ऊ तो तुमसे पार लगेगा नही, बस चौपाल पर बैठ कर चार गो नेता को गरिया के अपने को बड़का शेर समझते हो!!!"
      लठैत की दुखती रग पर चोट पड़ने से लठैत कुछ ज्यादा ही तिलमिला गया। उसने चिल्लाते हुए बोला कि साला किसी नेता को कोई शर्म नही है, चुनाव के समय घर-घर जा कर गोर लगेगा और मुंगेरी लाल का हसीन सपना दिखा कर वोट ले लेगा और जीतने के बाद कभी कहेगा फंड नही है, कभी कहेगा अफसर लोग ज्यादा काबिल है, बिना पैसा के नही सुनता है, जनता का दुख-दर्द नही समझता है, कभी कोई और प्राब्लम बता कर टरकाते रहेगा लेकिन जो लोग लक्ष्मी-दर्शन करवा देगा उसका काम यही लोग तुरंत करवा देता है। आखिर गरीब आदमी करे तो क्या करे????
बनारसी काका  ने समझाया कि अगर सब आदमी लोग मिल कर ईमानदार आदमी का चुनाव करे, तभी इस समस्या का समाधान हो सकता है।
लठैत फिर तिलमिला गया, बोला काका आदमी से ज्यादा ई जो कुर्सी है वही बईमान है, आप कितना भी ईमानदार आदमी को कुर्सी पर बैठा दीजिए, कुर्सी पर बैठते ही साला वो बैमानी का सब वेद-पुराण तुरंत सीख जाता है।
    गंगुआ ने लठैत की बातों का समर्थन करते हुए बोला कि अन्ना हजारे ने इसी कारण से सरकारी कार्यों के निगरानी  के लिये जनलोकपाल की मांग की थी। अन्ना टीम ने  बहुत बड़ा आंदोलन किया था लेकिन सब नेता लोग अपने नाक में नकेल डालने की कोशिश करने वाले अन्ना के आंदोलन को ही नकेल पहना कर साइड कर दिया।
तब तक मुखिया जी पहुँच गये थे।  पहुँचते ही बोले कम  जानकारी हो तो ज्यादा ज्ञानी बनने का कोशिश नही करना चाहिये!!!!! अरे अन्ना टीम का सबसे बड़ा हीरो तो केजरीवाल था, उसको देश की राजधानी दिल्ली की जनता ने सिर-आँखों पर बिठाया लेकिन ई लोग तो सबसे ज्यादा ऐश करने लगा। बारह हजार की थाली वाला पार्टी करने लगा। जितना पैसा का काम करता है, उससे ज्यादा  रुपया तो अखबार और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रचार पर खर्च कर देता है, सबसे बड़ी बात दिल्ली का मुख्यमंत्री अपने छोटे से छोटे काम का दिल्ली से ज्यादा दिल्ली के बाहर ढोल पीटने का कोशिश करता है....!!!!
  

   "ई तो बिल्कुल पागलपन है और जनता के पैसे का बरबादी है" गंगुआ ने हैरान होते हुए बोला।
मुखिया जी ने तब समझाया "अरे भाई यही तो राजनीति है, काम करो कम और ढोल पीटो ज्यादा!!! इसका सबसे बड़ा फायदा यह  है कि आप सरकारी पैसे से पाँच वर्षों तक अपना प्रचार करते हुए जनता के माइंड में ई बात घुसा देना चाहते हैं कि आपसे ज्यादा कर्मठ नेता और कोई नही है । मतलब हारने वाला नेता का प्रचार तो चुनाव के बाद बंद हो जाता है लेकिन जितने वाला नेतालोग पाँच वर्ष तक अपना प्रचार ताबड़तोड़ जारी रखता है। सबसे बड़ी बात विपक्षी लोग सही-गलत सब काम का विरोध और सिर्फ विरोध  करते हुए, जनता को बराबर यह एहसास कराते रहता है कि जनता जो गलती किया है उसका सजा भुगत रहा है। आम आदमी पाँच वर्ष  इसी गफलत में रह जाता है!!!!"
    
       लठैत तभी गुस्सा करते हुए बोलता है  "ए मुखिया जी, आप राजनीति का बात छोड़िये और  आज आपको फ्रेश जवाब देना होगा कि आखिर मेरा इन्द्रा आवास कब बनेगा??? चार दिन से घर में इसी झंझट के कारण खाना नही बन रहा है कि जब आप इलेक्शन में मुखिया जी के लिये ऐतना मेहनत किये तो मुखिया जी इन्द्रा आवास अब तक काहे नही दिये हैं!!!!"
मुखिया जी लठैत का तेवर देख कर  बिल्कुल सकपका गये, लेकिन बहुत जल्दी खुद को सम्भालते हुए बोले "अरे तुम और तुम्हारी घरवाली दोनों पागल हो गया है। पहले वाला मुखिया कागज सब गड़बड़ कर दिया है, सुधारने में समय लग रहा है, औकताने से थोड़े होगा। थोड़ा धेर्य रखो।"
लठैत ने बिल्कुल मारने के ख्याल से लाठी उठाते हुए कहा लेकिन आप तो बोले थे कि  चुनाव अगर जीत गये तो तीन महीना के अंदर तुम्हारा इन्द्रा आवास बन जायेगा और अब  तीन वर्ष से ज्यादा हो गया है।"
मुखिया की तो सिठी-पिठी  गुम हो गयी। काफी मशक्कत के बाद चौपाल पर बैठे लोगों ने मुखिया जी को मार खाने से बचाया। जब मामला कुछ स्थिर हुआ तो मुखिया जी लठैत को धमकी देते हुए बोले "देख लेना  लठैत तुम्हारे गुंडागर्दी का हम तुमको पूरा मजा तुमको  चखा कर रहेंगे।
लठैत एक बार फिर डंडा ले कर दौड़ा, अब तो मुखिया जी अपना जान-प्राण ले कर भागे। सबलोगों ने काफी प्रयास के बाद एक बार फिर लठैत को पकड़ कर बिठाया। लठैत लगातार मुखिया को माँ-बहन की गालियाँ दे रहा था और गाँव वाले को समझा रहा था कि इस बार पंचायत चुनाव में किसी हाल में इस कमीना मुखिया को जीतने नही देना है।
इसी बीच मुखिया जी अपने पाले हुए कुछ गुण्डों को ले कर चौपाल पर पहुँच गये। इसके बाद तो लठैत की जमकर ना सिर्फ चौपाल पर मुखिया के गुण्डों ने पिटाई की बल्कि थोड़ी ही देर में दल-बल के साथ दरोगा जी भी वहाँ  पहुँच गये और थाना में ले जा कर लठैत को इतना ठोका कि वो तीन माह तक खड़ा भी नही हो पाया। वो तो गनीमत ये रही कि थाना पहुँच कर लठैत की बीबी ने दरोगा और मुखिया जी काफी पैर पढ़ा जो लठैत जेल जाने से बच गया। इस सबके बीच लठैत की मदद के लिये पूरे गाँव में कोई तैयार नही हुआ।
   कुछ दिनों बाद चौपाल पर फिर एक बार जमघट लगा था। तभी मुखिया जी भी दरोगा जी के साथ वहाँ पहुँचे तो आज हिम्मत करके गंगुआ ने मुखिया जी को टोक कर बोला कि देखिये मुखिया जी आप जो लठैत के साथ किये, बहुत गलत किये। आपको इस बार पंचायत चुनाव में हमलोग कोई वोट नही देंगे।
    पॉवर और पैरवी की बात ही कुछ और होती है। मुखिया जी पर वो नशा सिर चढ़ कर बोल रहा था, उन्होंने बड़े ही गरुड़ भरे अंदाज में गंगुआ को समझाया "देख गंगुआ अगर हम इस बार चुनाव हार गये तो तुमको और लठैत को बूथ केप्चर्ड करने के आरोप में जिंदगी भर जेल में सड़ा देंगे।
गंगुआ हैरान होते हुए "ए मुखिया जी ये क्या गुंडागर्दी है, आप अपने काम-काज से पब्लिक को तो खुश  रख नही पा रहे हैं और चुनाव हारने पर आप निर्दोष आदमी पर इतना बड़ा आरोप लगा दीजियेगा। आपको शर्म नही आता है।"
मुखिया जी ने ठहाका लगाते हुए बोला "अरे गंगुआ, अभी तुम राजनीति में एकदम बच्चा है। जब बड़ा नेता लोग जनता द्वारा हड़काया जाने पर, चुनाव आयोग और भारतीय लोकतंत्र का मजाक उड़ाते हुए बोल सकते हैं कि ई.वी.एम. खराब है तो हम छोटा नेता लोग दो-चार गो शरीफ लोग को बलि का बकरा तो बना ही सकते हैं। फिर सही-गलत का फैसला दरोगा जी तुमको थाने ले जा कर करेंगे। इसलिए जब तक पंचायत चुनाव हो नही जाता है तुम अपना ज्ञान थोड़ा कम झाड़ो।"
चौपाल पर सभी लोग मुखिया जी की बात सुन कर आवाक थे और हमारे देश के सभी छोटे-बड़े नेताओं की तरह मुखिया जी ठहाका लगाते हुए वहाँ से ब्लॉक की ओर चले गये।

-  बिपिन कुमार चौधरी

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