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व्यंग्य // मैं अन्नदाता हूँ . . .!

जेठ के दोपहर का समय था। गर्मी अपने परवान पर थी। सूर्य भगवान मानो अपनी क्रोधाग्नी से धरती को भस्म करने के मूड में थे। सड़क पर बिल्कुल सन्नाटा पसरा था। अधिकांश सरकारी और प्राइवेट स्कूल में छुट्टी हो चुकी थी, इसी कारण गाँव और शहर के बच्चे गर्मी छुट्टी का आनंद लेने में मशगूल थे। कई सरकारी बाबुओं ने स्पेशल अर्जी लगा कर जेनेटर का व्यवस्था करवा लिया था। प्राइवेट कार्यालयों में तो बहुत जगह एयर-कंडीशन ऑफिस का मजा उठाने वाले लोग इस जानलेवा गर्मी से बेखबर थे। असली शामत तो भाई किसान-मजदूरों की थी।
            गँगुआ इस भयानक गर्मी में भी अपने सिपाही हिरवा के साथ खेत पर डटा था। हिरवा नाटे कद और साँवला रंग-रूप का एक कमजोर दिमाग वाला मेहनती इंसान था। हिरवा भोजपुरी गाने का बड़ा प्रेमी था, और जब कठिन मेहनत से शरीर टूटने लगता तो अपनी गायकी से अपना और अपने मालिक गँगुआ का मनोरंजन करने लगता था। हिरवा की जरूरतें बहुत कम थी। मोटा-सोंटा खाना खा कर भी खुश रहता था।दो टाईम खाना और दो जोड़ी कपड़ा के अलावे उसे कोई खास चीज की ज़रूरत महसूस नही होती थी।हाँ, एक बार गँगुआ से छोटी बात पर झगड़ा कर कुछ दिन के लिये पंजाब भाग गया था, वहाँ से एगो चायनिज मोबाइल ले आया था। इस मोबाइल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल वो अपने पसंदीदा भोजपुरी गाना सुनने में करता था।
        आज गँगुआ और उसके मालिक का दिन सच में बहुत खराब था। जब शहर के बड़े-बड़े लोगों को बार-बार कोल्ड-ड्रिंक पीने की तलब महसूस हो रही थी, गँगुआ और हिरवा सुबह से भूखे-प्यासे अपने खेत के बीचोबीच कड़कड़ाती धूप में बोरिंग-पंपसेट को चालू करने में परेशान था। सुबह चार बजे से दोनों के काफी मगजमारी के बाद भी जब दोनों को समझ में नही आया कि आखिर मशीन बार-बार पानी क्यों छोड़ रहा है, तब गँगुआ हिरवा से बोला कि अब लगता है मतीनवा को बुलाना ही पड़ेगा। मतीन गाँव का ही आलराउंडर मिस्त्री था जो लगभग हर तरह के गाड़ी-ट्रेक्टर से लेकर मशीन और टीवी-रेडियो, मोबाइल तक ठीक कर लेता था।
       मतीन को बुलाने के लिये जैसे ही गँगुआ निकलने वाला था कि उसका सामना अपने मित्र लठैत सिंह से हो गया। लठैत भी ना जाने क्यों परेशान था। गँगुआ को सामने देखते ही बोला "यार ई खेती-बारी अब हमको एकदम छोड़ देने का मन करता है।"
गँगुआ भी हामी में सर हिलाते हुए बोला "साला ऐहो कोई काम है लठैत, अब हमको ही देखो सुबह से अभी दो बजने को चला है और अभी तक हम मुँह भी नही धोये हैं।"
लठैत ने मजाकिया लहजे में बोला "काहे जी भौजी से झगड़ा हो गया है क्या???"
गँगुआ गम्भीर होते हुए "यार किसान का बीबी केतना झगड़ा करेगी, और झगड़ा करके भी हमलोग से उनका कौन शौक अरमान पुरा होने वाला है??? हमलोग तो बस कोल्हू का बैल हैं जो सिर्फ उम्मीद पर जिंदा हैं और वही  उम्मीद अप्पन घर-परिवार के लोगों को भी बाँटते रहते हैं। पिछला साल ऐसने गर्मी में पानी पटा-पटा कर मकई उपजाये और मकई सुखाने के टाईम में ऐतना वर्षा हुआ कि आधा मकई तो कामत पर ही सड़ गया। आधा मकई जो बाजार ले कर गये उसका भी ऐतना कम रेट मिला कि पूछो मत!!!"
लठैत ने बात काटते हुए बोला "रे, बुरबक जब रेट कम था, तो मकई बेचना कोई ज़रूरी था। मकई स्टॉक काहे नही कर लिया???"


गँगुआ अफसोस जताते हुए "यही तो इस देश का दुर्भाग्य है, रे लठैत !!! किसानी और खेती का मजबूरी ही ऐसा है कि खुब जी-जान से मेहनत करो और जब फसल तैयार हो जाये तो औने-पौने दाम में बेच कर महाजन को दे आओ। आज देश का कौन ऐसा हिस्सा है जहाँ किसान लोग आत्महत्या नही कर रहा है। दिल्ली के जो अभी मुख्यमंत्री  अरविन्द केजरीवाल है, उसके एक आमसभा में सबलोग के सामने एगो किसान भाई पेड़ से लटक के जान दे दिया, लेकिन क्या हुआ?????"
लठैत भी हामी में सिर हिलाते हुए बोला "बात तो एकदम सही है, रे  गँगुआ !!!! आखिर पुरा देश  का पेट भरने वाला किसान इस देश में भूखे क्यों मर रहा है????"
"देख भाई लठैत, हमलोगों को सरकार के तरफ़ से ना तो अपने फसल का वाजिब दाम मिलता है, ना ही आँधी तूफान में फसल नष्ट होने पर कोई सरकारी मुआवजा!!! फसल नष्ट होने पर अगला फसल उपजाने के लिये हमलोग महाजन से जो एक बार कर्ज लेते हैं, ना ओकर मूल भुगतान हो पाता है और ना सूद!!! फिर डीजल, कीटनाशक, बीज, खाद सब कुछ महँगा ही होते जा रहा है" गँगुआ बोला।
"हाँ भाई  गँगुआ!!! लागत बढ़त जा रहा है और मुनाफ साढ़े बाइस !!! बैल के तरह काम करो, दुनिया भर का रिस्क लो, फसल तैयार हो गया तो गर्जूआ बन कर बेच आओ, और पहुँचा दो सूद जोड़ के महाजन को!!! सच में बड़ा दुखदायी जिंदगी है ई किसान लोगों का, मतलब पुरा देश के पेट भरने वाला का परिवार भूखे है या बीमार, इसके बारे में इस देश में सच में सोचने वाला कोई नही है????"
थोड़ी दूर पर खड़े बनारसी काका ई सब बात सुन रहे थे। उनलोगों की नज़र जब उन पर पड़ी तो वो भी अपनी पीड़ा सुनाने लगे  "बेटा कहने को तो सरकार किसान के लिये बहुत योजना चला रही है, लेकिन
     " सब ऊपर ही ऊपर खा जाते हैं,
             जो खाने वाले हैं!!!
       और जिये वाला ऐसे ही जी लेते हैं,
             जो जीने वाले हैं!!!"
अब देखो बेटा पचास हजार का हम के.सी.सी. लोन के लिये साल भर बैंक में दौड़े। बैंक का मनेजर जो-जो कागज  मांगा सब दिये लेकिन जब तक मल्लूह के हाथ से मनेजर को पाँच हजार नही भेज दिये मनेजर हमको लोन नही दिया। अब बताओ कि अगर कोई साल भर लोन के लिये दौड़ेगा तो उसका खेती सत्यानाश होगा कि नही।"
गँगुआ भी सहमति में सिर हिलाते हुए बोला हाँ काका यही कारण है कि हम सीधे मल्लूह काका से पाँच रुपया सैकड़ा (मासिक सूद )पर   बीस हजार रूपया ले लिये लेकिन बैंक नही गये। पर क्या बातायें काका फसल आँधी में खराब हो गया। सत्तर हजार अब तक सूद दे चुके हैं लेकिन साला अब तक कर्ज़ा ख़त्म नही हुआ है।"
बनारसी काका हैरत भरे अंदाज़ में बोले "क्या करोगे गँगुआ, इस देश में विजय माल्या करोड़ों रुपया ले के बैंक का विदेश भाग जाता है तो किसी को कोई तकलीफ नही होती है लेकिन हम किसान लोग अगर बैंक का किस्त भुगतान में थोड़ा भी देरी करें तो नोटीस आ जाता है। कल तो जुल्म हो गया!!! भवानी के दरवाजा से बैंक वाला आके ओकर ट्रेक्टर ले कर चला गया। अब तुम ही बताओ अभी ट्रेक्टर से कमाने का समय था, पैसा होता तो बैंक को दे आता। अब ट्रेक्टर ले कर चला गया। भवानी ऐहे ट्रेक्टर के कारण खेत सब सूद भरना लगाये हुए है। हमको तो डर लगता है कि कहीं भवानी ज़हर-माहुर ना खा  ले।"
लठैत गुस्सा से बोला "ई मनेजर का काका हम कौनो दिन बोलिये तो कपार फोड़ दें, साला बहुत घूसखोर है!!! अब आप ही बताईये ई भवानी बेचारा अब क्या करेगा???"
गँगुआ गम्भीर होते हुए "किस किस का कपार फोरेगा रे लठैत???  पेक्स में यूरिया आया सब मिल कर ब्लेक कर लिया लेकिन जो ओरिजनल किसान है उसको क्या मिला????
        !!!! बाबाजी का ठुल्लुआ !!!!"
बनारसी काका "बेटा गरीब किसान के पास कोई दूसरा उपाय ही नही है!!!! सब लोग मिल कर हमारा ही शोषण करते हैं, लेकिन किसान कि समस्या को सुधारने के लिये कोई मन से प्रयास नही कर रहा है"
लठैत गुस्साते हुए "साला  ई  लोग सिर्फ एलेक्शन के समय जोड़-जोड़ से बोलेंगे कि  ---- आप अन्नदाता हैं.........!!!!!!"

  -बिपिन कुमार चौधरी

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