ब्रह्म-बाबा थान गाँव का एक मात्र ऐसा जगह था, जहाँ पूरे गाँव के बच्चे लोग बिना किसी भेदभाव के खेला करते थे। दरअसल ब्रह्म-बाबा थान के एक ओर बाभन टोली थी, जहाँ ब्राह्मणों की संख्या भले अधिक हो लेकिन सभी जाति के लोग वहाँ प्रेम-भाव से रहते थे। कुछ ही दूरी पर मुशहरी-टोला था जहाँ अधिकतर हरिजन और दलित-समुदाय के लोग के लोग निवास करते थे। ब्रह्म-बाबा थान के दूसरी ओर हाजी टोला था। यह एक बंगलादेशी मुसलमान बहुल गाँव था। ब्रह्म-बाबा थान दरअसल एक पीपल के पेड़ के नीचे का चबूतरा था जहाँ बाभन टोली के महिला और पुरुष अक्सर किसी शुभ कार्य से पहले पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद लेने आते थे। ब्रह्म-बाबा थान से बस कुछ ही दूरी पर हाजी साहब का मजार था जहाँ हिन्दु-मुस्लिम दोनों ही सिर नवाते थे। यह कुल दो बीघा का परती जमीन ना सिर्फ हिन्दु-मुस्लिम बच्चों के खेलने और व्यायाम का स्थान था बल्कि हिन्दु-मुस्लिम के साझा पूजा-स्थली और गंगा-यमुनी संस्कॄति और गाँव के लोगों के आपसी भाईचारे का केन्द्र था। दरअसल यह जमीन बाभन-टोली के बनारसी काका का था, जो कुछ वर्षों पहले गंगा-धार में चला गया था। गंगा-धार से बाहर निकलने पर सभी ने इसे ब्रह्म-बाबा का कृपा मान कर इसे ब्रह्म-थान का पूजा-स्थली बना दिया। बनारसी काका भी अत्यंत धार्मिक प्रवृति के व्यक्ति थे, अतः उन्होंने जमीन के बीचोबीच पीपल का पेड़ लगा कर विधिवत ब्रह्म-थान की स्थापना कर दी।
कुछ वर्षों पहले हाजी टोला के मस्जिद हाजी एतूबूर रहमान की अचानक टी.बी. बीमारी के कारण मौत हो गयी। हाजी साहब बनारसी काका के बड़े करीबी मित्र थे। हाजी साहब बड़े भले आदमी थे और थोड़े-बहुत तंत्र-मंत्र के जानकर थे। अतः समाज में उनकी काफी प्रतिष्ठा थी। इसी कारण हाजी टोला के मुसलमान भाई उनका मजार बनाने को इक्षुक थे। बनारसी काका की सहमति से ब्रह्म-बाबा से कुछ दूरी पर उनका मजार बन गया। हालांकि मल्लूह काका, लठैत सिंह और गाँव के मुखिया सहित गाँव के कुछ लोगों ने इस मजार का विरोध किया लेकिन बनारसी काका का जमीन होने के कारण किसी का कुछ नही चला।
कुछ ही दिनों में पंचायत चुनाव होने वाला था। बनारसी काका से 'मुँह की खाकर' मुखियाजी और मल्लूह काका अंदर से बहुत क्रोध में थे। इसी बीच मुखियाजी का सिपाही एक दिन ब्रह्म बाबा थान हो कर ट्रेक्टर ले जा रहा था कि एक अदभूत चमत्कार हो गया। ट्रेक्टर के फाड़े से खुद कर बजरंग-बलि साक्षात प्रकट हो गये। फिर तो चारों ओर से श्रधालुओं का जमावड़े सा लग गया। लठैत सिंह ने मुखियाजी के इशारे पर गाँव के बच्चों का खेल-कूद वहाँ बंद करवा दिया। हिंदू बच्चे तो बजरंग बलि के गाँव में आने से खुश थे लेकिन मुसलमान बच्चों को इस तरह वहाँ खेल बंद होना ठीक नही लगा। ये बच्चे लठैत की शिकायत ले कर अंजुमन काका के पास पहुँच गये। अंजुमन काका जो इस बार खुद भी मुखिया का चुनाव लड़ने को इक्षुक थे, उन्हें लठैत की ये कारस्तानी ना-गवार गुजरी। उन्होंने गाँव के कुछ मौलवी और हाफिज को साथ ले जा कर थाना में रिपोर्ट दर्ज करा दी कि मजार के जमीन पर कुछ कट्टरपंथियों ने कब्जा कर लिया है, जबकि हाजी टोला का एक-एक मुसलमान वहाँ ईदगाह बनाने को लालायित है। अगर प्रशासन ने इस जमीन को तत्काल कट्टरपंथियों से मुक्त नही कराया तो हाजी टोला का एक-एक मुसलमान अपनी जान की बाजी लगा कर अपने ईदगाह की जमीन हासिल करके रहेगा। अल्लाह के इस नेक इनायत को पुरा करने में हाजी टोला का मुसलमान ही क्या पूरे देश का मुसलमान भी अपनी जान की बाजी लगा देगा।
कुछ ही देर में ये ख़बर मुखीयाजी के कान में पहुँची फिर तो मानो कोहराम सा मच गया। आज सबसे ज्यादा मल्लूह काका गुस्सा में थे, गाँव के तमाम लोगों को इकठ्ठा कर बोले कि देखा गाँव वालों इस बनारसी बाबू के जिद्द के के कारण बाभन टोली के लोगों को क्या दुर्दिन देखना पड़ रहा है। ब्रह्म थान, जहाँ साक्षात बजरंगबली प्रकट हुए हैं, ये मुसलमान वहाँ ईदगाह बनाने के लिये थाना में कॉम्प्लैन किया है। अरे भाइयों अगर आज ये लोग हमारे बजरंगबली का जमीन छीन लेंगे तो कल को हमारे हिन्दु भाइयों का क्या होगा???
लठैत तभी गुस्सा से गरजा "ए मल्लूह काका, हमनी भी बजरंग बलि के पक्का भक्त हैं!!! वहाँ सिर्फ और सिर्फ बजरंगबली का भव्य मंदिर बनेगा!!! इसके अलावे और कुछ अगर कोई बनाने की कोशिश किया तो हम लोग खून की नदी बहा देंगे"
चारों ओर से ग्रामीण लोग बजरंगबली का जय... बजरंगबली का जय.... का नारा लगाने लगे!!!
इसी बीच वहाँ बनारसी काका भी पहुँच गये। गाँव वाले के भारी भीड़ और हिंसक माहौल को देख कर वो बिल्कुल घबरा गये। फिर भी उन्होंने हिम्मत से काम लिया बोले "रे मल्लूह रे !!! ई तुम क्या कर रहा है !!! अरे दुष्ट प्यार और भाईचारा की छोटी धारा बहाने के बजाय नफरत का आँधी लाना बहुत आसान होता है। मेरे प्यारे गाँव वालों सबसे बड़ा धर्म इंसानियत का है। इंसानियत का धर्म सबसे प्रेम करना सिखाता है। मंदिर मस्जिद के नाम पर हम आपस में लड़ कर भगवान को खुश करने के बजाय नाराज़ कर देते हैं। साम्प्रदायिक लड़ाई में भले कोई जीत जाये लेकिन मानवता और इंसानियत हार जाता है। इसलिये भाई लोग ब्रह्म थान में मंदिर या ईदगाह जो भी बने शांति से बनना चाहिये। किसी प्रकार का लड़ाई झगड़ा हम लोग आपस में नही करेंगे और अगर मेरी बात मानो तो ब्रह्म थान को दो बराबर भाग में बाँट कर एक भाग में मंदिर और एक भाग में ईदगाह बना कर मामला ख़त्म कर लेना चाहिये।
चारों ओर से गाँव वाले बनारसी काका के इस बात से सहमत दिखे। तभी बजरंगबली का पक्का भक्त लठैत बनारसी बाबू की जय..... बनारसी बाबू की जय.... के नारे लगाने लगा। सभी गाँव वाले भी बनारसी काका के इस विचार से खुश दिखे।
मुखिया जी इस बात से बिल्कुल नाखुश थे, उन्हे ये भी डर लग रहा था कि इस प्रकार बनारसी बाबू का परचम गाँव में लहराने से उनकी मुखिया की कुर्सी ना चली जाये। फिर क्या था राजनीतिक विरोधी धर्म, (जिसका एक मात्र काम और परम उद्देश्य अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदी का विरोध करना मात्र होता है) का अनुपालन करते हुए बोले "ए बनारसी बाबू !!! बाभन टोली का मान-सम्मान तो आप उसी दिन बरबाद कर दिये, जिस दिन ब्रह्म थान के बगल में हाजी का मजार बनवा दिये। अब वहाँ ईदगाह बनवा के सब हिन्दु का धर्म का सत्यानाश कीजियेगा, तो भगवान घर में बाप-दादा को क्या मुँह दिखाइयेगा, ई भी कभी सोचे हैं। अगर हाजी के दोस्ती में आप मुसलमान बन गये हैं तो हमलोगों को कम से कम अपना धर्म बचाने दीजिये। अबकी अगर आप ज्यादा टें-टें करके उपदेश दिये ना तो लठैत का एक डंडा आपका बुद्धि जगह पर ला देगा!!! समझे कि नही, ब्रह्म थान में सिर्फ और सिर्फ बजरंगबली का भव्य मंदिर बनेगा और कुछ नही !!!!!!"
माहौल में बिल्कुल सन्नाटा छा गया। अपने हिन्दु होने के दावे को चुनौती पा कर बनारसी काका अंदर से तिलमिला गये। मुखिया की बात उन्हे अंदर से झकझोर कर रख दिया, लेकिन कुछ ही पल में उन्होंने खुद को सम्भालते हुए कहा "अगर इस गाँव के सब लोगों का विचार है कि ब्रह्म थान में सिर्फ बजरंगबली का मंदिर बनना चाहीये तो गाँव वालों मुझे कोई आपत्ति नही है। आपलोग सभी कोई कल सुबह ब्रह्म-मूर्हत में अपने-अपने घर से चार-चार ईंट ले कर आईयेगा, कल ही बजरंगबली मंदिर का शिलान्यास होगा।"
सभी ग्रामीण बनारसी काका के बात से खुश थे और सबने एक सुर में सहमति व्यक्त किया और आज की आपातकालीन सभा समाप्त हो गयी।
पर इस सभा के बाद से ही मुखिया जी बहुत परेशान थे। दरअसल बनारसी काका भी इस बार मुखिया का चुनाव लड़ने की योजना बना चुके थे। अगर बनारसी काका के प्रयास से ब्रह्म-थान में बजरंगबली का मंदिर बन जाता है तो उनका राजनीतिक कॅरियर ही समाप्त हो जाने वाला था। यही चिंता उन्हें सता रही थी कि तभी मल्लूह काका वहाँ पहुँच गये। मल्लूह काका मुखिया जी के मिजाज को भांप गये और बोले कुछ करिये मुखिया जी नही तो अबकी आपका मुखीयागीरी का सत्यानाश हो जायेगा।
मुखिया जी ने अपनी लाचारी मल्लूह काका को बताई, तो मल्लूह काका मुस्कुरा के बोले कि आप गाँव वाला पी.सी.सी. सड़क के ठेकेदारी हमको अगर दे दीजिए तो हम कुछ कर सकते हैं।
मुखिया जी ने तत्काल मल्लूह काका की मनोकामना पूरी कर दी।
मल्लूह काका वहाँ से तुरंत हाजी टोला पहुँच कर अंजुमन काका को मंदिर के शिलान्यास सम्बन्धित सारी बात बताई। साथ ही बोले कि अरे अंजुमन मियाँ हम और मुखिया जी तो गाँव वाले को यहाँ तक समझाये कि जमीन दो बराबर हिस्सा में बाँट कर बजरंगबली का मंदिर और ईदगाह दोनों बना लो!!! गाँव के सबलोग तैयार भी थे लेकिन बनारसी बाबू सबको भड़का दिये और ब्रह्म थान में सिर्फ और सिर्फ बजरंगबली का मंदिर बनाने के लिये गाँव वाले को उकसा दिया है। अंजुमन काका के साथ-साथ हाजी टोला के सभी मुसलमानों का भी खून खोलने लगा। अल्लाह हो अकबर के नारे से माहौल गूँज उठा !!!!
अंजुमन काका ने माहौल को समझते हुए राजनीतिक नारा दिया "जो काफिर हमसे टकरायेगा, नेस्तनाबूद हो जायेगा"
अगले दिन सुबह-सुबह ब्रह्म बाबा थान में बाभन टोली के सभी लोग बनारसी काका के अगुवाई में हाथ में चार-चार ईंट ले कर बजरंगबली मंदिर के शिलान्यास के लिये अभी पहुँचे ही थे कि पहले से घात लगाये बैठे हाजी टोला के मुसलमानों ने अंजुमन काका के नेतृत्व में उन पर लाठी-डंडा और तेज हथियार से हमला कर दिया। दोनों ही ओर से जम कर लाठियां भांजी गयी। कई लोग घायल हुए, कुछ हिन्दुओं और मुसलमान भाई की जान भी चली गई। लठैत का दायाँ हाथ टूट गया, सबसे ज्यादा मार अंजुमन काका और बनारसी काका को पड़ी। अधिक उम्र और ज्यादा मार पड़ने के कारण दोनों की जान भले बच गयी हो लेकिन पंचायत चुनाव तक दोनों बिछावन पर ही पड़े रहे। बहुत दिन तक गाँव के साथ-साथ पूरे जिला में प्रशासन को कर्फ्यू लगा कर रखना पड़ा। बाभन टोला से मुखिया जी तो हाजी टोला से मौलवी साहब ने मुकदमा दायर किया। हाईकोर्ट में कई वर्ष से मुकदमा की सुनवाई चल रही है......।
इस बीच कई बार पंचायत चुनाव हो चुके हैं। हर बार मंदिर बनाने के नाम पर ही मुखिया जी चुनाव जीत जाते हैं। मौलवी साहब भी ईदगाह बनाने के नाम पर वोट पा कर सरपंच के पद पर कई वर्षों से सुशोभित हैं। इस बीच ये मामला अब विधान सभा और लोकसभा का मुद्दा भी बन चुका है....! चुनाव के समय हर बार ब्रह्म-बाबा थान मीडिया में बहुत बड़ा मुद्दा बन जाता है लेकिन वहाँ पर खेल-कूद कर बड़ा होने वाला गंगुआ इस बात से बहुत दुखी है कि आज उसके बेटा और गाँव के दूसरे बच्चों को खेलने के लिये कोई मैदान उपलब्ध नही है....!
और ना ही बजरंगबली को ही अपना घर ही मिल पाया है...!!!!
बनारसी काका निराश मन से बोलते हैं कि बेटा यह देश ज़रूर आजाद हो गया है लेकिन जब तक जनता अपने विवेक से ठोस मुद्दा को निर्धारित नही करेगी इस देश में भगवान और अल्लाह बेघर होता रहेगा.....!
- बिपिन कुमार चौधरी
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अति सुंदर महाशय
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