✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी
लेकर नाम धर्म का,
छिपाते काज कुकर्म का,
कैसा यह ज्ञान बांटते हैं,
धर्म का विरोधी, लोग धर्म को मानते हैं,
परमात्मा की तलाश में,
ज्ञान प्राप्ति की उल्लास में,
जिन्हें हम भगवान का डाकिया मानते हैं,
मिथ्याडंबरों से धर्म को कुरूप बनाते हैं।
हमारी श्रद्धा का कर नृशंस हत्या,
नफ़रत फैलाना जिनकी तपस्या,
भीड़ को उन्मादी उपदेशों से बरगलाते हैं,
धर्मगुरुओं का ऐसा भीड़ आम जन को रुलाते हैं,
धर्म की आड़ में,
निज स्वार्थ के जुगाड़ में,
राष्ट्रहित से भी विरोध करना सिखलाते हैं,
ऐसे पाखंडी देशभक्तों के क्रोधाग्नि को जलाते हैं
लाख टके का एक सवाल,
धर्म के नाम पर क्यों है बबाल,
सृष्टि को चाहे जिसने भी बनाया है,
हमने अपनी रचना में कौन सा भेद पाया है...
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