✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी
खैरात बांट बांट कर, संपन्न हुआ ना कोय।
संपन्न होता बहुजन, फिर हाथ न फैलाता कोय।।
दोष मढ़ मढ़ कर, किया वोट जो न था देय।
अब जो सत्ता सतावे, नाचो भंग-मदिरा पेय।।
ईमान को सब कोसत हैं, आपन ईमान पूछे ना कोय।
अगर सब आपन ईमान पूछियें, फिर काहे कोई रोय।।
हर डाल पर हंस बैठा, मौका मिलत उल्लू होय।
पांच बरस ढोल बजावत, जनता मन ही मन रोय।।
सत्ता से हमें क्या मतलब, बुद्धिजीवी बेसुध होय सोय।
बुद्धिजीवी बने जब चमचा, लोकतंत्र काहे ना रोय।।
देश खूब तरक्की करे, अचरज जनता खुश ना होय।
जनता जब तरक्की करे, नेता को नीति पसंद ना होय।।
मेधा को मिले सम्मान, जात पात को वोट करे ना कोय।
हर हाथ पाये रोटी सम्मान, दुष्ट, दुर्जन सत्ता से दूर होय।।
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