एक पत्नी पीड़ित की कहानी, मेरी कविता की जुबानी
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#पटरी_से_जरा_भी_उतरूं_बन_जाता_फालतू_और_बेकार
✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी
इस पत्नी नाम की बीमारी का क्या करूं मैं यार ?
नहीं पचता इसका भोजन बिना किये टकरार,
उसकी सुनो, उसी की सुनो, बनो एकदम वफादार,
पटरी से जरा भी उतरूं, बन जाता हूं फालतू और बेकार...
मैं भले कुछ ना बोलूं,
फिर भी बातें उसकी कभी ख़तम नहीं होती है यार,
अगर ध्यान जरा भी भटका मेरा, शुरू हो जाता टकरार,
झगड़ा ख़तम करने को बोलना पड़ता, मैं गलत तुम सही हो सरकार,
पटरी से जरा भी उतरूं, बन जाता हूं फालतू और बेकार...
काम उसे मेरी बिल्कुल पसंद नहीं आये, चाहे रहूं कितना भी खबरदार,
काम अगर नहीं करूं तो, शुरू हो जाता टकरार,
ताने से उसके बच जाऊं, इसलिए साथ ले जाता हूं उसे बाज़ार,
पटरी से जरा भी उतरूं, बन जाता हूं फालतू और बेकार..
रोज रोज की यही है कीच कीच, यह मुश्किल बड़ा कारोबार,
कुछ मित्र पारंगत इस काम में लेकिन भाभीजी करती उस पर भी वार,
तब सोचता मैं नहीं अकेला, पीड़ित सारा संसार,
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