✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी
तेरे शहर में आकर रहना शौक नहीं हमारा,
अनकही मजबूरियों का मारा हुआ हूं,
रूखी सूखी खा कर भी खुश रह लेता हूं,
फिर भी बिना गुनाह तेरे शहर से निकाला गया हूं...
अपनी मिट्टी की याद हमें भी साताती है,
अपनों की याद हमें भी रुलाती है,
तेरे टुकड़ों पर पलने का हमें शौक नहीं,
अपनों के पेट की आग हमें यहां लाती है...
हम मेहनतकशों का लहू पीकर,
कुछ बन गए बादशाह, कितनों के सिर ताज है,
अपने प्रदेश में हमारे हाथों को क्यों नहीं मिलता काम,
यह आज भी बहुत बड़ा राज है,
तेरा शहर बेशक बहुत खूबसूरत है,
क्या तेरे शहर वालों ने इसे ऐसा बनाया है,
अपने खून पसीने से इसे सींचा है हम बैगरतों ने,
कभी सोचना हमने तेरे शहर में क्या पाया है,
लगा कर लाख तोहमत हम पर,
तेरे शहर ने इज्जत हमसे बहुत पाया है,
मजबूरियों में अपने शहर से कर दिया बेदखल,
यह सोच हमारा आंख भर आया है...
खुश रहना अपनी जन्नत में,
हम अपनी बदनसीबी जी लेंगे,
हमारे बच्चे भूखे मर गए तो क्या,
खुद अपनों के दर्द का आंसू पी लेंगे...
घूट घूट कर यूं हम लोगों को,
अब जीने की आदत हो गई है,
अख़बार के पन्नों को पढ़ सब खुश हैं,
ईमानदारों के टेक्स से सबको राहत बंटी है...
ना भीख हमें, ना कोई खैरात चाहिए,
अपने प्रदेश में इन हाथों को काम चाहिए,
अपनों के बीच इज्जत की रोटी खा लेंगे,
तेरे शहर से भी सुंदर अपना शहर बना लेंगे,
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