भेद
✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी
अपनी जान बचाने की खातिर,
आज इंसान कुछ दिनों के लिए कैद है,
असली दर्द हम बेजुबानों से पूछो,
बिना गुनाह आजीवन कैद हैं,
इस कैद से निकल, जीवन नहीं बचा पाओगे,
तेरे कैदी होने का यह मूल भेद है,
तुम्हारे शौक की खातिर आजीवन आंसू बहाता हूं,
क्या तुमलोगों को कोई खेद है...
तुम्हारी तरक्की से हमें शिकवा नहीं,
फिर आपस में क्यों इतना मतभेद है,
अपनी जाति के जीव भी तुम्हारे दुश्मन हैं,
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