एहसास
✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी
बेजुबानों को करके पिंजरे में बन्द,
शौक हमने अपना खूब पूरा किया है,
घरों में कैद होकर फिर क्यों बैचैन हैं,
सोचो बेजुबानों को कितना दर्द दिया है...
दीवारों से टकड़ा टकड़ा कर,
अक्सर परिंदों के पंख टूट जाते हैं,
अपनी बेबसी पर वो छटपटाते हैं,
तब हम मानव खूब खिलखिलाते हैं...
भावनाओं के पैरों में घुंघरू बांध कर,
दूसरों को नचाने में मजा बहुत आता है,
अपनी भावनाओं से जब खिलवाड़ होता है,
घुंघरुओं की आवाज में भी आनंद नहीं आता है...
अपनी जान पर जब आफत आई है,
आज कोई पंख हमारे काम नहीं आई है,
तिलमिला कर खुद पर खीझ जाते हैं,
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें