प्रकृति का बदला
✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी
दहशत के इस माहौल में,
मौत का आतंक छाया है,
मानव तू कितना बुद्धिमान,
प्रकृति ने औकाद बताया है...
चमगादड़ के सूप से भले नहीं,
जैविक हथियार से ही आया है,
अपनी मौज की खातिर तूने,
कितने जीवों का अस्तित्व मिटाया है
अपनी बादशाहत की खातिर,
जिसने धरती पर उत्पात मचाया है,
उस विवेकशील जाति पर ख़तरा देख,
ईश्वर ने भी खूब आंसु बहाया है,
जिंदगी सबकी कैदखाना बन चुकी है,
संक्रमित होते अपनों की भोहें तनी है,
सूक्ष्मजीव कोरोना ने ऐसा कहर बरपाया है,
अपनों ने भी लाशों को गले नहीं लगाया है,
तरक्की का चहुंओर घमासान है,
प्रदूषित वातावरण सब परेशान है,
यह कैसा आफत हमने बुलाया है,
जहां कोई विज्ञान काम नहीं आया है,
अपनी सुविधाओं की खातिर,
सारी सीमाएं हम तोड़ गए हैं,
कई नदियां नाला बन चुका है,
कई जलिय जीव विलुप्त हो गए हैं ...
प्रकृति से इस बेरहम छेड़छाड़ का,
कीमत मानव जाती को चुकाना होगा,
धरती पर मानव जाती की सुरक्षा हेतु,
मानव को अंदर का हैवान मिटाना होगा...
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