बनावटी चेहरे
✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी
बनावटी चेहरा सजाकर,
आइना को झूठा बतलाते हैं,
कुकर्मों की काली बदरी ढककर,
क्या हैं और क्या दिखाते हैं...
कड़कती धूप में तपकर,
कम समझदार पसीना बहाते हैं,
मौसम हो चाहे कितना प्रतिकूल,
फूलों की खूबसूरत बगिया सजाते हैं...
बगिया के खूबसरत फूल,
मिलकर सुंदर माला बनाते हैं,
किसी के चरणों के स्पर्श की इच्छा,
अफसोस बनावटी चेहरे को सजाते हैं...
इत्र का मनमोहक सुगंध,
पसीने को बदबूदार बताते हैं,
निज स्वार्थ में फुलवारी रौंद कर,
बनावटी लोग बनावटी आंसू बहाते हैं...
पसीना बहाने वाले को मूर्ख समझकर,
ये लोग उनका उपहास उड़ाते हैं,
आंसू बहाना इन मूर्खों को नहीं आता,
मजबूर होकर ये लोग खून की नदियां बहाते हैं...
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें