नारी अस्मिता की विजयी
✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी
अय्याशो की महफ़िल में मर्दानगी की बाज़ी लगी थी,
अबला के चीख़ से पत्थरों की चारदीवारी भी सहमी थी,
दानवी ठहाकों के बीच लाचार क्रंदन था,
रावण दहन वाली सभ्यता में नारी अस्मिता का अभिनंदन था...
आँखो की अश्रुधारा को कृष्ण का इंतिजार था,
सभ्यताओं के संस्कृति में सुदर्शन चक्र लाचार था,
हवस के हब्शियों को अपनी शक्ति पर विश्वास था,
नारी शक्ति को भी अपनी दुर्बलता का एहसास था...
अचानक हीं अबला को देवी शक्ति की अनुभूति हुई,
शक्ति प्रदर्शन को लालायित हब्शियों की ख़ूब दुर्गति हुई...
एक झटके में नग्न वदन को पंजे से छुड़ाया था,
मौत भी काँप जाये क़हर उसने ऐसा मचाया था...
कोमल हथेलियों ने जब कटार को थाम लिया,
मर्दानगी ठोंकने वाले कईयों का जान लिया,
अंतिम शख़्स नारी शक्ति के इस अद्भुत पराक्रम से अनजान था,
क़रीब आने पर पता चला यह उसकी ख़ास सखी का भाईजान था ...
ऐसे भाइयों के शव पर उसकी बहन ने भी थूका था,
हब्शियों के दुःसाहस पर नारी अस्मिता के विजयी का सुनहरा मौका था ...
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