*मैं शर्मिंदा हूँ*
आजकल उसे ही ढूँढ़ती है मेरी नजरें,
जिससे कभी नजरें छिपाया करता था,
ऐसा नहीं मैं तुमसे प्यार नहीं करता था,
मुझे मेरा हालात डराया करता था,
तुम मुँह से कुछ नहीं बोलती थी,
तेरे चेहरे की मायूसी,
आवाज का भारीपन,
दिल का दर्द,
होठों की उदासी,
सबकुछ बयां करती थी,
मैं भी तुम्हें सीने से लगा कर,
अपना हाले-दिल बताना चाहता था,
तुमने मुझे पागल, देहाती, बेवकूफ और खुदगर्ज कह जताना चाहा .....
मैं गरीब बेरोजगार,
तुम्हे अपनी जान से ज्यादा प्यार करता था,
लेकिन जमाने का डर सताया करता था ...
मैं उतना भी व्यस्त नहीं था,
जितना जताया करता था ...
मुझे जमाने का भी उतना डर नहीं था,
जितना तुम्हें खोने का खौफ,
मुझे व्याकुल बनाया करता था...
तुम सोचती थी,
मेरी जिंदगी में कोई और है ...
मेरी जान, मैं तुम्हारे करीब आने से नहीं ...
दौलत और हैसियत की दीवार,
मुझे तुमसे दूर ले जाया करता था...
तुमने जिस दिन
अपनी दिल की बात बोला था,
मेरा जमीर भी अंदर से डोला था,
मैंने बहुत कोशिश की थी,
तुम्हें पाने के लिये,
अपने रूतबे और शोहरत को बढ़ाने की ...
मेरी जान मैं हार गया,
जीते जी खुद को मार गया ...
तुम्हारी जिंदगी से खुद को अलग कर,
मैं आज भी जिंदा हूँ,
सच कहता हूँ,
साँसे तो अब भी चल रही है,
मैं सच में बहुत शर्मिंदा हूँ ....
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