*प्रयाश्चित*
वो मेरे अपने थे,
जिन्हें मैं कभी खुश नहीं कर सका,
दिल से जिसने मुझे अपना माना,
उसे मैं अपना नहीं सका,
दिल से जिसे अपनाया,
वो हर कदम पर सवाल करती है
कि तेरे अपनों ने मुझे क्या दिया ...
जिसने सच्चा प्यार किया,
उसे अपना कर शायद खुश रहता,
लेकिन उसकी खुशी के लिये
उसे अपना नहीं सका,
जिसकी खुशी के लिये,
उसकी कमी जानकर भी,
उसे दिल से अपना बनाया,
वो हर कदम पर सवाल पूछती है,
तेरे अपनों ने तुम्हें क्या दिया ....
मुझे खुद पर बहुत भरोसा था,
पर जिसे खुद से ज्यादा,
मुझ पर भरोसा था ....
उसे ठुकराने कि सजा पा रहा हूँ! ! !
जो मेरी खुशी थी,
उसे इंतेहा की हद तक इंतिजार करवा कर,
अपने किये का प्रयाश्चित कर रहा हूँ .....
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