मध्यावधि चुनाव का समय था। अचानक लम्बी बीमारी के कारण विधायक जी की मौत हो जाने से यह सीट खाली हो गया था। नेताजी गाँव के चौपाल पर भाषण दे रहे थे :-
"मुफ्त किताब, दोपहर में हर दिन बदल-बदल कर मध्याह्न-भोजन, सभी छात्र-छात्राओं को पोशाक, छात्रवृति, साईकल, सैनेटरी-पैड अब सरकारी विद्यालय में बच्चों को क्या नही मिलता है।"
यह सब हमारे सुशासन का ही तो देन है। इनता ही नही गरीब से गरीब बच्चा को भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलता है। आपके बच्चे का सुंदर भविष्य बनाने के लिये हमारे सुशासन में बहुत कुछ हो रहा है.....
तभी बीच में ही गाँव के हेडमास्टर निखिल बाबू बिल्कुल बिगड़ गये। बोले ए नेताजी आपके सुशासन का सबसे बड़ा खासियत जानते हैं :-
"समाज और देश के भविष्य को बनाने वाला मास्टर को समय से वेतन नही मिलता है। आठ-आठ महीना बिना वेतन के सरकारी मास्टर लोग को किराना दुकान में राशन नही मिलता है। अरे राशन क्या कंट्रोल में खाली सरकारी मास्टर होने के कारण हमलोग BPL और किरासन नही मिलता है। बिना राशन-किराशन वाला घर में जब सरकारी मास्टर लोग शाम में पहुँचता है, तो बिना सौ -बात सुनाये बीबी के हाथ का भोजन नही मिलता है। अरे घर में जब कई बार टेंशन बहुत बढ़ जाता है, तो सरकारी मास्टर का बच्चा लोग अप्पन माय को जा कर बोलता है, ए माय हम पढ़-लिख के ई मास्टर वाला नौकरी एकदम नही करेंगे।"
नेताजी निखिल बाबू के इस प्रकार सार्वजनिक विरोध से बिल्कुल तिलमिला गये, लेकिन चुनाव का समय था, इसलिये गुस्सा करने से नुकसान हो सकता था। राजनीतिक दाव खेला, दोनों हाथ जोड़ कर दंडवत प्रणाम करते हुए बोले:-
गुरु गोविंद दोनों खड़े,
काकौ लागू पाऊँ,
बलिहारी गुरु आपनो,
गोविंद दियो बताय....."
अरे भाई आपलोग थोड़ा धैर्य रखीये। अपना प्रदेश एक बीमारू राज्य है, आपलोग के त्याग और बलिदान के बल पर जब एक-एक गरीब का बच्चा पढ़-लिख कर बड़ा आदमी बनेगा तो लाखों गरीब बच्चे और उसके माता-पिता भी इसी प्रकार दंडवत होकर आपको प्रणाम करेंगे।
अविभावक के द्वारा सम्मान की बात पर तो मास्टर साहब बिल्कुल उखड़ गये। बोले ए नेताजी आपलोग थोड़ा नौटंकी कम ही कीजिये तो ठीक होगा, पिछले बार जब आपलोग को वोट लेना था तो सब विद्यार्थी को धरल्ले से छात्रवृति बँटवा दिये जबकि उसके बाद 75% अटेन्डेनस का लोचा लगा दिये। यही जो लठैत है बुढवा मास्टर का कपार फोड़ने के लिये तैयार हो गया था, अरे भाई छात्रवृति पढ़ने वाला तेज बच्चा को मिलता है तो सरकारी धन का उपयोग होता है, ई क्या सरकार में आते ही सरकारी धन का लूट मचा दिये हैं। अरे भाई , छात्रवृति वाला पैसा का रिपोर्ट बनाने से लेकर बाँटने तक हर हमेशा स्कूल में रोज़ एक से एक नया बखेरा होता है। इस पैसा से विद्यार्थी का माई-बाप मेला घूमता है, मछली-मुर्गा खाता है, स्टेंडर्ड का कपड़ा खरीदता है, लेकिन बहुत कम ही माय-बाप है जो स्कूल-ड्रेस सिलवाता होगा या बच्चा को कोई किताब खरीद कर देता होगा। अरे भाई ई लोग से हमलोग को कोई इज्जत नही चाहिये, बस हमलोग को शांति से काम करने दें और स्कूल में बात -बात पर राजनीति नही करें, यही बहुत है।
नेताजी का दाव उल्टा पड़ गया था, लेकिन उन्होंने एक बार फिर से स्थिति सम्भालने का प्रयास किया। बोले "आपलोगों को शत-शत प्रणाम। यही त्याग और दिन-रात परिश्रम करके भी किसी चीज़ की ईक्षा नही रखना ही तो मास्टर साहब आपलोग की महानता है।"
निखिल बाबू ना जाने फिर क्यों नाराज हो गये। बोले आपलोग कौनो भ्रम में नही रहिये!!!! समान काम का समान वेतन हमलोगों का कानूनी हक है और ऊ तो देना ही होगा और शिक्षको को वाजिब मान-सम्मान दिये बगेर आपलोग शिक्षा विभाग के उपलब्धि का ढोल पीटना हर जगह बंद कीजिये। पीटने पर याद आया कि जब मास्टर लोग अपना वाजिब हक के लिये आंदोलन करता है तो आप उसको सड़क पर पिट्वा कर कौन सा बहादुरी दिखाते हैं। क्या हमलोग गुंडा हैं?? अरे भाई अगर मास्टर का भविष्य बढ़िया नही होगा तो समाज और देश का भविष्य कैसे बढ़िया होगा????? लोगों को बेवकूफ बनाना आप बंद कर दीजिये।
नेताजी को गुस्सा आ गया। "बोले नियोजित मास्टर हो औकाद में रह कर बात करो।"
बस फिर क्या था निखिल बाबू जोर-जोर से ताली बजाते हुए ठहाका लगाने लगे। यही नेताजी आपका असली रूप है, आप रंगा सियार बन कर पब्लिक को बेवकूफ नही बनाइये। जिस तरह आप अभी मास्टर लोग को दंडवत प्रणाम कर रहे थे और तुरंत ओकाद में रहने का नसीहत देने लगे, उसी प्रकार जब पब्लिक का वोट ले लेते हैं तो पब्लिक का भलाई का बात आपको कम और अपना भलाई का बात आपको ज्यादा याद रहता है।
फिर तो चारों ओर से तालियां बजने लगी।
निखिल बाबू ने गाँव वाले को समझाया कि जब भी कोई आम आदमी अपना वाजिब हक माँगता है, हमारे देश के नेता लोग उसे ना जाने क्यों ओकाद में रहने की नसीहत देने लगते हैं, यही हमारे लोकतंत्र का दुर्भाग्य है। जनता हर पाँच वर्ष पर अलग-अलग लोगों द्वारा मूर्ख बनती रहती है, ईसलिए आपलोग चुनाव के टाईम पर नेता जी से इज्जत पा कर खुद को ज्यादा खुशनसीब समझने की गलती नही करें।
निखिल बाबू की बातें सबको बिल्कुल सच लग रही थी। लठैत ने तो निखिल बाबू की जय.... , निखिल बाबू की जय..... के नारे लगाना शुरू कर दिया। सभी गाँव वाले भी उसका साथ दे रहे थे।
तभी निखिल बाबू ने सबको शांत करते हुए बोला, भाइयों शांत हो जाओ मुझे ये शोहरत और वाहवाही नही अपने बीबी बच्चों का सुरक्षित भविष्य चाहिये। आपलोगों के बच्चे का भविष्य हमलोग बनाते हैं, आप अपनी सरकार से सिर्फ इतना बोल दीजिये कि हमें समान काम का समान वेतन दे दें और ढोल पीट कर शिक्षकों का वेतन देने की परम्परा समाप्त करें। सभी लोग भावुक हो गये लेकिन तभी नेताजी गुस्सा से पैर पटकते हुए चले गये। निखिल बाबू भी जाने लगे, लेकिन जाने से पहले उन्होंने गाँव वालों को सिर्फ इतना बोला कि आज सरकारी स्कूल को कुछ लोग अनाथालय बना देना चाह रहे हैं, जहाँ गरीब बच्चों को चाहे जितना खैरात मिल जाता हो एक शिक्षक और उसके परिवार का भविष्य बिल्कुल अनाथ है......
- बिपिन कुमार चौधरी
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