व्यंग्य : अब सियासत ने पाल ली है गायें; आदमीयत ने ख़ुदकुशी कर ली है...
@ बिपिन कुमार चौधरी
मल्लूह काका आज सुबह से ही बहुत ही खुश थे। मल्लूह काका ने लठैत को देखते ही टोका "सुना रे लठैत, अब अप्पन गाय-माता का बढ़िया दिन आ गया है! " लठैत का मल्लूह काका से ज्यादा बनता नही था, सो वो उनसे ज्यादातर परहेज़ करके ही चलता था। लठैत ही क्या गाँव का शायद ही कोई ऐसा आदमी हो, जो मल्लूह काका के जाल में फँस कर अपना धन और किमती समय के साथ-साथ मानसिक शांति का नुकसान नही झेला हो। किसी ने ठेकेदारी के लिये पैसा दिया, किसी ने अपने जमीन के केश की पैरवी के लिये, किसी ने के.सी.सी. लोन पास कराने के लिये, कोई अपने बच्चे के मेट्रिक का कॉपी का पैरवी के लिये, कोई ब्लॉक से जाति-आवासीय बनाने के लिये, तो किसी ने इन्द्रा आवास के लालच में, तो कोई वृद्धा पेंशन की उम्मीद में, कई बेरोजगार युवा ने मास्टर और अन्य नौकरी के लिये तो किसी ने किसी और काम के लिये......, फेहरिस्त बहुत लम्बी है, बस इतना समझ लीजिये कि आलराउंडर दलाल टाइप के आदमी थे !
गाँव-समाज में ऐसे लोगों की बहुत इज्जत होती है। हर तरह के वक्त-बेवक़्त में ऐसे ही लोग गाँव का नेतृत्व करते हैं, इसी कारण कई-कई बार अलग-अलग ढंग से ठगे गये लोग भी खुल कर ना तो इनका विरोध करते हैं, और ना ही ऐसे लोगों से रिश्ता खराब कर बेवजह मुसीबत मोल लेने की गलती करते हैं। हाँ, ऐसा नही कि मल्लूह काका ने सिर्फ लोगों को ठगा ही हो, अपने शरण में आये करीब दस फीसदी लोगों के वो मुसीबत में काम भी आये हैं, अब आजकल कोई किसी के लिये बेवजह कहाँ अपना समय और दिमाग खराब करता है ! सो वो अपना वाजिब मेहनताना, (जिसे आजकल कुछ पढ़े-लिखे लोग दलाली भी कहते हैं) अवश्य लेते थे, और डंके की चोट पर लेते थे। हर तरह के काम के लिये उनका एक रेट फिक्स था, जिसे वो हमेशा अड्वान्स में ही ले लेते थे लेकिन कई बार किसी के मजबूरी पर तरस खा कर, अपना मेहनताना बाद में भी लेने को तैयार हो जाते थे लेकिन ऐसे में अगर किसी ने जरा भी होशियारी की तो उस पर मानो मुसीबतों का पहाड़ टूटना तय था। इसलिए लोग अपना बहुत कुछ लूटा कर भी अक्सर सामने पड़ जाने पर उनकी बहुत इज्जत करते थे। ये अलग बात है कि पीठ-पीछे लोग दबी जुबान ही सही पर अपना भड़ास निकालने के लिये दुनियाँ का शायद ही कोई ऐसा अपशब्द हो जिसका इस्तेमाल मल्लूह काका के लिये नही करते हों ! ऐसा नही कि मल्लूह काका को इसकी जानकारी नही होती थी, पर जब कोई उनका शुभचिंतक उन्हें इसकी सूचना देता तो वो बड़े उदार हो कर बोलते कि अरे भाई ! इस दुनियाँ में तो लोग महात्मा गाँधी को भी गाली देते हैं, तो महात्मा गाँधी कोई बुरे आदमी थोड़े हो गये। नीच-बुद्धि के लोग ऐसा करते रहते हैं, लेकिन क्या इससे महात्मा गाँधी के महानता में क्या कोई कमी आई जो किसी के पीठ पीछे गाली देने से मेरा मान-सम्मान कम होगा। अभी सामने वो शख्स आ जाये तो तुम देखना किस तरह हाथ-जोड़ कर प्रणाम करेगा। वैसे भी यह कलयुग है, आप किसी का कितना भी भलाई क्यों ना कर दो, पीठ-पीछे वो आपको गाली देगा ही, अतः निश्चिंत हो कर अपना काम करने पर ध्यान लगाओ ! ठीक वैसे ही जैसे मैं बिना किसी चिंता के समाज-सेवा में निरंतर खुद को समर्पित रखता हूँ !
मल्लूह काका का लगभग हर तरह के राजनीतिक लोगों से भी बढ़िया सम्पर्क था, सबसे बड़ी खासियत उनकी यह थी कि पंचायत से लेकर लोकसभा तक चाहे जो भी जीते, वो उसी की ना सिर्फ प्रशंसा के पुल बाँधने में माहिर थे बल्कि जीते प्रत्याशी को वो इस बात का पुरा-पुरा विश्वास भी दिलाने में सफल रहते थे कि उनकी जीत में मल्लूह काका ने बहुत बड़ा योगदान दिया है। उनके मोटर-साइकल पर किसी भी चुनाव में रोज़ अलग-अलग प्रत्याशी का झंडा और बेनर दिख जाना मामूली बात है, और कोई भी प्रत्याशी अंत तक यह समझ नही पाता था कि आखिर वो किसका चुनाव प्रचार कर रहे हैं। हाँ रिजल्ट के तुरंत बाद उनका स्टेंड बिल्कुल क्लियर होता था और इसलिए सभी छोटे-बड़े नेता उन्हें राजनीति का माहिर खिलाड़ी मानते थे।
दरअसल मल्लूह काका जैसे लोगों की इस भारत देश में कोई कमी नही है। भारतीय लोकतंत्र का मजाक उड़ाने में मल्लूह काका जैसे धूर्त लोगों की अहम भूमिका रही है। आम जनता हर चुनाव में बार-बार ऐसे नकाबपोश लोगों को पहचानने की कोशिश करता है, कई बार ऐसे लोगों को आम जनता ने जम कर सबक भी सिखाया है लेकिन जन-प्रतिनिधी के पोस्ट की गरिमा ही कुछ ऐसी है कि आजादी के इतने दिनों बाद भी भारत का आम आदमी खुद को ठगा महसूस करता है। चुनाव के समय हर बार ये आम-आदमी इस उम्मीद में मतदान करता है कि अबकी उसकी किस्मत जरूर बदलेगी लेकिन सत्ता और शक्ति के केन्द्र चाहे जितनी बार बदल गये हों, जमीन पर उनका संचालन मल्लूह काका जैसे लोगों के हाथ में ही रहता है और यही कारण है कि आज भी केन्द्र से चलने वाला पैसा जमीन पर आते-आते अपनी तीन-चौथाई उपयोगिता खो चुकी होती है। सूचना का अधिकार आया, भ्रष्टाचार को रोकने के लिये एक से एक कठोर कानून बने,जन-लोकपाल के लिये कुछ कथित ईमानदार लोगों ने बड़े-बड़े आंदोलन किये लेकिन ना तो एक आम आदमी की किस्मत बदली और ना मल्लूह काका जैसे लोगों के रुतबा और शान-शौकत में कोई कमी आई !
लठैत अपने नाम के अनुसार बिल्कुल सीधी बात करता था और मल्लूह काका का सुबह-सुबह उसे इस तरह टोकना बिल्कुल भी अच्छा नही लगा। गुस्सा से बोला "क्या हुआ हो मल्लूह काका ! सुबह-सुबह काहे बौराईल हैं ? गाँव में कोई गौशाला खुलने वाला है क्या या लालू जी बिहार में फिर से चरवाहा स्कूल शुरू करने वाले हैं ?"
मल्लूह काका ने उन्हें टोका "धत्त बुरबक! चरवाहा स्कूल से किसका फायदा हुआ तुम्ही बताओ तो, जो हम चरवाहा स्कूल के फिर से खुलने से एतना खुश होंगे ! गाँव में गौशाला खुले के अभी बात मत करो, काहे कि खोलने वाला एक समय था,जिस समय नीतीश कुमार को काम करने का मन था तो सब पंचायत में शराब दुकान खुलवाए थे कि नही, अभी उनका पुरा फोकस बंद करने पर है ! सबसे पहले शराब बंद करवाये, नशा को भी पुरा बंद करवाने का बात चल रहा है ! स्कूल, कॉलेज और आँगनबारी में कोर्ट के आदेश "समान काम का समान वेतन वाला" माँग नही मान कर और आवश्यक शिक्षकों की भर्ती नहीं होने से पढाई-लिखाई भी पूरे बिहार में लगभग बंद होने के कगार पर है। केन्द्र-सरकार बिहार को वाजिब पैसा नही दे रहा है, इसलिये बिहार में विकास का काम भी साफ बंद है। बेरोजगार लोगों के लिये लगभग सब विभाग में सरकारी वेकेंसी भी बंद है। देखा-देखी मोदी जी भ्रष्टाचार बंद करने के लिये पुराना नोट बंद कर ही दिये, लेकिन सबसे बड़का काम तो योगीजी किये हैं!"
लठैत झल्लाते हुए "ए काका, अब ई योगीजी कौन है हो ? ई योगी जी क्या बंद कर दिये ?"
मल्लूह काका समझाते हुए "अरे बुरबक, एकदम गंवार है तुम ! अरे योगी जी यू.पी. के नया मुख्यमंत्री हैं, और शपथ लेते ही सबसे पहले गाय काटे पर पाबंदी लगा दिये हैं ! तब ही ना हम तुमको बोले कि गाय-माता का बढ़िया दिन आ गया, लेकिन पढ़ने के टाईम में तो तुम स्कूल छोड़ कर गुल्ली-डंडा खेलने में जिंदगी बरबाद कर दिया। हम भी भैंस के आगे बीन बजा कर अपना माथा खराब कर रहे हैं। जा कर अप्पन काम कर, फालतू सुबह-सुबह माथा नही खाओ।
मल्लूह काका का ये व्यवहार लठैत को बिल्कुल अच्छा नही लगा। गुस्सा में तमतमाते हुए बोला "ए मल्लूह काका ज्यादा अपना ज्ञान मत बघारिये! हमको भी पता है कि आप कितना बड़ा ज्ञानी हैं ! अप्पन बूढ़ी माय को तो दोनों टाईम ढंग से खाना देवे नही करते हैं और हमको यू.पी. का ख़बर सुना रहे हैं कि गाय माता का बढ़िया दिन आ गया। अरे, आप ढेर ज्ञानी हैं तो हमको पहले ई न बताईये कि आपका अप्पन बुढ़ी माँ का बढ़िया दिन कब आयेगा ? बड़ा ज्ञानी बनते हैं...
मल्लूह काका लठैत से सीधे भीड़ना मुनासिब नही समझते थे। इसलिए अपमान का कड़वा घुट पी कर रह गये।
लठैत भी अपनी मोटी लाठी पटकते हुए अपने खेत की ओर चला गया।
अभी लठैत कुछ ही दूर चला था कि सामने से गँगुआ आता दिखा। गँगुआ को लठैत ने सारा हाल कह सुनाया।
गँगुआ मुस्कुराते हुए बोला "अरे लठैत, ई तो बढ़िया बात है कि योगी जी गाय मारने पर पाबंदी लगा दिये। मुस्लिम भाई लोग को भी चाहिये कि अप्पन हिन्दु भाई के मान-सम्मान के खातिर गाय-माय को मार के खाना छोड़ दे। वैसे भी दुनियाँ में खाने-पीने के समान का कोई कमी नही है, लेकिन हमको ई बात आज तक समझ में नही आया कि साला हिन्दु के कौन धर्म ग्रंथ में ई लिखा है कि मुर्गा खाओ, बकरी-बकरा खाओ, मछली खाओ। अरे भाई, सनातन धर्म का तो यही कहना है कि दुनियाँ के प्रत्येक जीव में भगवान का वास है। इसलिए आदमी को किसी भी जीव के प्रति हिंसा नही करना चाहिये, नहीं तो भगवान नाराज हो जाता है, लेकिन साला यहाँ तो स्थिति ई है कि हिन्दु लोग दुर्गा पूजा के टाईम में दस दिन बोलेंगे जय जय दुर्गा, जय जय दुर्गा, और उसके बाद बोलेंगे लाओ जी मुर्गा, लाओ जी मुर्गा,
हमारे विचार से तो योगी जी को इस बात पर भी पाबंदी लगा कर हिन्दु धर्म की रक्षा करनी चाहिये।"
उसी समय वहाँ से पंडित काल भैरव गुजर रहे थे, उन्होंने गँगुआ की बात से सहमति जताते हुए बोला कि बिल्कुल तुम ठीक बोल रहे हो गँगुआ। लेकिन आज कल नया ज़माना में सबलोग अपन ढंग से अपना नियम-कानून बना लिया है।"
लठैत को पंडीतजी की बात बिल्कुल भी नही जंची। गुस्साते हुए बोला "ए भैरो बाबा, आप ई सब बात मत बोलिये। आप भी हमरा साथ बैठ कर कई बार मुर्गा और तारी का मजा ले चुके हैं। अभी आप गँगुआ के साथ मिलकर ज्ञान नही झारीये। आप तो ऐसन आदमी हैं कि फोकट में अगर आपको कुत्ता का भी माँस लोग खिला देगा तो आप दारू के साथ हज़म कर जायेंगे। बड़ा हिंसा नही करने का उपदेश देने आये हैं। नया साल के पार्टी में मन्ती काकी का बड़का खस्सी चूरा कर काटने में भी आप हमलोग के साथ ही थे। भैरो बाबा अपनी भारी बैज्जती देख वहाँ से चुप-चाप खिसकने में ही अपनी भलाई समझी।
लेकिन लठैत चुप नही हुआ और अपनी धुन में बोलता रहा "जिसको जो करना है भाई करे हमको तो एक दिन बाद एक दिन बीना माँस-मछली के रहा नही जाता है। दुध-दही थोड़ा कम मिले लेकिन माँस-मछली के बगैर खाना में स्वाद नही बुझाता है।"
गँगुआ ने लठैत को समझया "देख भाई लठैत,लोकतंत्र में किसी को वैसे तो कुछ भी खाने-पीने की सामान्यतः कोई पाबंदी नही होती है, लेकिन देश के किसी भाई-बंधु के धार्मिक आस्था को चोट पहुँचा कर कुछ खाना-पीना उचित भी नही है। योगी जी गाय का बीफ पर पाबंदी लगा कर बेशक कोई गलत काम नही किये हैं लेकिन जब बुढ़ी और कमजोर गाय को हमारे हिन्दु भाई ही कुछ रूपये के लालच में कसाइयों के हाथ में बेच देते हैं तो गाय-माय का रक्षा कैसे होगा ?"
लठैत ने सहमति में सर हिलाते हुए बोला "बिल्कुल गँगुआ तुम ठीक बोलता है। अरे भाई सब हिन्दु-परिवार को चाहिये कि कम से कम एक गाय-माता की सेवा ज़रूर करे। हिन्दु लोग को गाय-माय का अंत तक सेवा कर उसे मरने के बाद दफना देना चाहिये। योगी जी को बुढ़ा-गाय और बैल के खरीद-बिक्री पर भी पाबंदी लगा देना चाहिये। अब परसों की ही बात है, मल्लूह काका अप्पन बुढिया गाय को मंसुर मियाँ को बेच दिये। अब तुम ही बताओ कि मल्लूह काका को पता नही था कि जो गाय काका के अब कोई काम के लायक नही रहा है, उसको मंसुर मियाँ खरीद के क्या करेगा ?
तभी बनारसी काका वहाँ पहुँच गये, उनलोगों की बात को सुन कर दुखी होते हुए बोले कि बेटा सच पूछो तो गाय-माय की रक्षा का उचित जिम्मेदारी उठाने के लिये इस देश में बहुत कम लोग तैयार है। एक योगीजी या कोई और क्या कर सकता है ? अरे भाई गाय को माय बोलने वाला इस देश में सबसे गरीब लोग ही गाय का सेवा करता है। गरीब लोगन के लिये पैसा का बहुत बड़ा महत्व होता है, योगी जी को चाहिये कि सब पंचायत में एक ऐसा गौशाला बना दे, जहाँ लोग बुढ़ी और बेकार गाय को जा कर बेच आयें। इस गौशाला का खर्च हिन्दु संगठन और सरकार को उठाना चाहिये, जिससे कोई गाय माय के अंत समय में कत्ल-खाना तक नही पहुँच पाये लेकिन ऐसा करना बहुत मुश्किल है।
लठैत को बनारसी काका का बात एकदम ठीक लगा बोला "गाय-माय के रक्षा के लिये अगर हिन्दु लोग को सनका के दंगा करवाया जा सकता है तो ऐसा गौशाला काहे नही खोला जा सकता है ?"
बनारसी काका ने समझाया "अरे लठैत, इस देश में मल्लूह जैसा बहुत लोग है, जो अप्पन बुढ़ी माँ का सेवा नही करता है, बुढ़ी गाय-माय को दो पैसा के लालच में बेच देता है, लेकिन साम्प्रदायिक तनाव फैला कर, लोगों की धार्मिक भावना को उकसा कर घटिया किस्म की राजनीति करता है। अरे भाई सबसे बड़ा धर्म मानवता और इंसानियत का है। उससे बड़ा धर्म इस दुनियाँ में कुछ नही है। गाय-माय का रक्षा तो होना ही चाहिये लेकिन किसी भी शर्त पर देश के लोगों के आपसी प्रेम और साम्प्रदायिक-सदभाव को नुकसान नही पहुँचना चाहिये। नहीं तो हमें ना भगवान माफ करेगा, ना ही अल्लाह और ना ही कोई गॉड।
गँगुआ बोला बिल्कुल सही बनारसी काका "इस देश में सबसे ज्यादा ऊ लोग खतरनाक है जो आदमी के रूप में भेरिया बन कर अप्पन राजनीतिक रोटी सेक रहा है, जो समय-समय पर भेड़ बन जाता है तो कभी गाय-माय का खाल ओढ़ लेता है। ई लोग इस देश में ना गाय माय को बचने देगा, ना मानवता को और ना इस देश को ही बचने देगा।
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