जेठ की दोपहर में मल्लूह काका मुखिया जी के साथ बैठ कर देश दुनियाँ की गप्प हाँक रहे थे कि तभी किशन ने चौपाल पर बैठे मल्लूह काका को टोका "ए काका, सुने मास्टर लोग हड़ताल तोड़ दिया है और अब मेट्रिक का कॉपी मूल्यांकन भी शुरू हो गया है।"
मुखिया जी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया "अरे किशन, ई हड़ताल वगेरह कुछ नही था, ई सब तो नया मास्टर को फुसलाने के लिये पूरनका मास्टर सबका मकर्जाल था"
किशन हैरत से "हम कुछ समझे नही मुखियाजी"
मुखिया जी ने समझाना शुरू किया "देख किशन कल तुम्हारा बेटा गोलूवा जब खेलते खेलते गिर गया और रोने लगा तब तुम्हारा बाबू पोता को चुपाने के लिये क्या किया था????
किशन मुखिया जी के सवाल का कुछ मतलब नही समझा, फिर भी बोला "अरे मुखिया जी आप भी एतना घुमा-फिरा कर बात करते हैं, अरे चिन्ति काकी दरवाजा पर केला का छिलका फेक दी थी। गोलूवा भी वही दरवाजा पर खेल रहा था और केला का छिलका पर जैसे लात पड़ा गिर गया। तब बाबू जी गोलूवा को गोद में उठा लिये और उसको चुपाने के लिये जमीन में दो-तीन लात जोर से मार दिये, गोलूवा को लगा नीचे जमीन पर गिरने से उसको जो चोट लगा है, दादा जी तीन चार लात मार कर जमीन को सजा दे दिये हैं और गोलूवा खुश हो कर खूब हँसने लगा।"
तब मुखिया जी ने समझाया "मूल्यांकन बहिष्कार में भी कुछ वैसा ही हुआ है, इनलोगों का वरिष्ठ नेता लोग, हाईस्कूल के नया मास्टर लोग को गोलूवा के तरह जमीन पर लात मार कर खुश कर दिये हैं, और मूल्यांकन बहिष्कार समाप्त हो गया है।"
मल्लूह काका को भी मुखिया जी का बात कुछ समझ में नही आया। बोले ए मुखिया जी पहेली मत बूझाइये, और थोड़ा क्लियर बात बोलिये।
मुखिया जी ने ठहाका लगाते हुए बोला "एक बात बताईये कि अगर अभी पाँच साल का गोलूवा अप्पन बड़ भाई-बहन के साथ खेलने का जिद्द करेगा तो ऊ लोग क्या करेगा"
मल्लूह काका "धू मरदे, छोटा बच्चा को कहीं बड़ा बच्चा अपने साथ थोड़े खिलायेगा"
मुखिया जी ने फिर सवाल दागा "अगर किशन और उसकी पत्नी काम में बिजी हो और बोल दे कि गोलूवा को थोड़ा देर ओझड़ा कर रखो तब बड़ा बच्चा लोग क्या करेगा????"
मल्लूह काका झल्लाते हुए जवाब दिया "अरे मुखियाजी, माय-बाप के डर से दूध-भात बना कर गोलूवा को खेला लेगा या क्रिकेट के एक्सट्रा खिलाड़ी बना कर ग्राउंड के बाहर जब गेंद जायेगा तो उसको गेंद वापस लाने के लिये दौड़ा देगा।"
मुखिया जी ने एक बार फिर से ठहाका लगाया, बोले "हाईस्कूल का नया मास्टर लोग भी वही दूध-भात और क्रिकेट के एक्सट्रा खिलाड़ी के तरह मैदान में फुदक रहा था और ई लोग सपना देख रहा था कि परी रानी आयेगी और "समान काम का समान वेतन" वाला मिठाई इसको ला कर दे देगी जबकि ई लोग को तो पूरनका मास्टर के वरिष्ठ नेता लोग द्वारा, सरकार के कहने पर एक्सट्रा खिलाड़ी के तरह खेलाया जा रहा था, और ई लोग इस भ्रम में था कि मूल्यांकन बहिष्कार के खेल का मैन खिलाड़ी यही लोग हैं।"
किशन को मुखिया जी का बात पर बिल्कुल भी विश्वास नही हुआ बोला "ए मुखिया जी, गोलूवा और परी रानी का कहानी सुना कर आप हमको सही बात नही बताना चाहते हैं तो नही बताईये लेकिन हाईस्कूल का एम॰ए और बी.ए. पास मास्टर लोग एतना बेवकूफ नही है, जो बिना मतलब का हड़ताल तोड़ देगा।"
मुखिया जी को किशन की बात बिल्कुल भी नही जंची, गुस्सा कर बोले "ढेर होशियार आदमी जो है ना दस जगह महकता है, अरे विश्वास नही हो रहा है तो पूछो हाईस्कूल के किसी नियोजित मास्टर से कि इनका वरिष्ठ नेता लोग , सरकार से इनको क्या दिलवा दिये जो ई लोग मूल्यांकन बहिष्कार वापस ले लिये?????"
तभी चौपाल के बगल से चंदन बाबू गुजरे तो सभी लोगों ने उन्हें काफी आवाज दी लेकिन आज वो सबको सुन कर भी अनसुना करते हुए तेजी से अपने ससुराल वाला मोटर साईकिल दौड़ा कर निकल गये। चंदन बाबू नया-नया हाई स्कूल का मास्टर बने हैं लेकिन उनकी माली हालत बहुत खराब है। कम्पीटीशन वाला परीक्षा पास करके स्कूल जाय्न किये हैं लेकिन वेतन प्राइमरी स्कूल के नियमित मास्टर से भी कम मिलने के कारण हीन भावना के शिकार हैं। अबकी चंदन बाबू और इनके जैसे हजारों शिक्षक एक वरिष्ठ नेता के नेतृत्व में आर-पार की लड़ाई लड़ रहे थे। सरकार द्वारा वेतन रोके जाने के बावजूद अपने चंदन बाबू अपने तमाम साथियों के साथ अपने हक की लड़ाई "समान काम का समान वेतन" हासिल करने के लिये मूल्यांकन केंद्र के बाहर धरने पर डटे थे, लेकिन वरिष्ठ नेता जो इनलोगों के सर्वमान्य नेता थे और इनलोगों के वाजिब हक की लड़ाई के लिये सड़क से कोर्ट तक लड़ाई का नेतृत्व कर रहे थे ने ऐसा रंग बदला कि बेचारी गिरगिट भी शर्म से पानी पानी हो गई।
आज इनका और इनके साथियों का मूल्यांकन बहिष्कार वाला हड़ताल तो ख़त्म हो गया लेकिन इनकी पत्नी ने सुबह-सुबह घर में खाना हड़ताल कर दिया। बार-बार चंदन बाबू से एक ही सवाल पूछ रही थी कि अगर कोर्ट के निर्णय का ही इंतिजार करना था तो एक माह से आपलोग सड़क पर नौटंकी क्यों कर रहे थे???
चंदन बाबू एक ही जवाब दे पा रहे थे कि प्रदेश अध्यक्ष ने हड़ताल तोड़ने को कहा है।
उनकी श्रीमती को उनका ये जवाब ठीक वैसा ही लग रहा था जैसे कोई भैंस के आगे बीन बजा कर उसे नचाना चाह रहा हो जबकि भैंस को कई दिनों से नाद में भोजन नसीब नही हुआ हो।
दरअसल चंदन बाबू बीन बजाने के आलावे कुछ कर भी नही सकते थे क्योंकि जिन लोगों को चंदन बाबू और उनके तमाम साथी उस्ताद मान कर,उनके एक इशारे पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार थे, वो लोग तो ठग तांत्रिक निकला और मूल्यांकन बहिष्कार का ड्रामा उनलोगों ने ठीक उसी सेंस में किया था जिस प्रकार चुनाव के समय भीड़ जमा करने के लिये नेताजी लोग कभी-कभी नौटंकी नाच का आयोजन कर लिया करते हैं। अब इनके वरिष्ठ नेता को जिस नागमणि की तलाश थी वो उन्हें हासिल हो चुका है, हालांकि चंदन बाबू और उनके साथी भी अब बड़े हो चुके हैं और उन्हें ये भी मालूम हो चुका है कि कोई परी रानी "समान काम का समान वेतन" वाला मिठाई ले कर नही आने वाला है, लेकिन घर-परिवार से लेकर सड़क चौराहे पर एक ही बात सब पूछ रहा है कि मूल्यांकन बहिष्कार से मिला क्या ?????
दरअसल हमारे गाँव-समाज में अक्सर देखा जाता है कि कुछ गरीब तबके के लोग अपने भाई से झगड़ा होने पर अपने ऊँची पहुँच और बड़े रसूख वाले दोस्तों का हवाला दे कर घर-परिवार में रौब झाड़ने का प्रयास करते हैं, और तब बिल्ली मौसी बराबर हिस्सों में रोटी बाँटने के नाम पर पुरा रोटी ही खा जाती है, जैसा कि वरिष्ठ नेता खा गये हैं। अब देखना है कि नियोजित भाई अपने अन्य नियोजित भाई से कैसे-कैसे लड़ कर एक दूसरे का सत्यानाश करते हैं......
- बिपिन कुमार चौधरी
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