गाँव के चौपाल पर आज रघु काका की बड़ी चर्चा थी। अपनी इकलौती बेटी की शादी उन्होंने क्या धूम-धाम से की थी। गाँव में ऐसा भोज तो मुखियाजी भी अपने बेटी की शादी में नही कर सके थे। रघु काका को गाँव के सभी लोग दिल खोल कर दुआ दे रहे थे।
अंजुमन काका बोले भाई पैसा तो बहुतों को अल्लाह ने दिया है लेकिन रघु बाबू जैसा दिल अल्लाह बहुत कम लोगों को देते हैं।
मन्ती काकी ने भी दोनों हाथ उठा कर आशीष दिया, बोली अरे अंजुमन मियाँ अमीर को तो हर कोई पूछता है, लेकिन गाँव के सब गरीब लोग को भी रघु बाबू उतना ही आदर-सम्मान से निभा दिये। देखना उनकी बेटी भी रानी बन कर रहेगी।
लठैत ने मुखिया जी पर तंज कसा, बोले मुखिया जी का तो, पत्तल पर सामान देख कर ही दिमाग चकरा गया। बोले रघु पगला गया है बेटी की शादी में कोई ऐसे पैसा लुटाता है। अरे भाई मुखिया हो कर सब-समाज के बीच कोई ऐसा बोलता है। जिसका जैसा श्रधा हुआ किया, मदद तो किसी का करेंगे नही, लेकिन कोई बढ़िया अगर कुछो कर रहा है तो टाँग अराने ज़रूर पहुँच जायेगा। तभी मन्ती काकी का बेटा किशन भी बोल उठा, अरे ठग-ठुग के मुखिया बन जाना अलग बात है, और गाँव समाज में इज्जत कमाना अलग बात है। देखते नही हैं, मुखिया जी का बेटा क्या करता है???
गंगुआ ने भी चुटकी ली, बोला "का करेगा, कॉलेज में कृष्ण बने के चक्कर में तीन-चार बार सरकारी ससुराल जा चुका है। कई बार मुखिया जी प्रिन्सिपल का हाथ-पाँव जोड़ कर बेटा को कॉलेज से निकाले जाने से बचाए हैं, और गाँव में डींग हाकेंगे कि मेरा बेटा दिल्ली में ये करता है और ये करके वो बनेगा।
और सबलोग अत्यंत घृणा से अभिभूत हो कर खिलखिला पड़े
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अचानक चौपाल पर मुखिया जी को देख कर सबके होश उड़ गये। आते ही मुखिया जी गुस्सा से तमतमाते हुए बोले "अरे भाई, सौ दिन लूट कर एक दिन गाँव में बड़का भोज करना हो तो हम भी हर साल ऐसा भोज कर सकते हैं।"
मल्लूह काका ने मुखिया जी को समझाया, "अरे मुखिया जी, आप भी कौन गंवार लोगों के मुँह लगते हैं। ई लोग को क्या पता कि रघु कौन-कौन कर्म करता है। यहाँ तो पेट क्या भरा, गधा के तरह खाली ई लोग को चारों ओर हरियाली दिखता है।"
मन्ती काकी ने मल्लूह काका को टोका "बोली बढ़िया आदमी के बारे में मल्लूह ऐसे बोलोगे तो रोटी पर नमक नसीब नही होगा।"
गाँव की औरतें भले कितनी भी अनपढ़ हो लेकिन अक्सर उनकी बातों के मतलब बहुत गम्भीर होते हैं।
मल्लूह काका ने भी बड़ा घुमावदार जवाब दिया। अरे मन्ती भौजी रोटी अगर नसीब हो गया तो नमक तो तुम्ही से माँग लेंगे। और तुम इतनी दयालु हो कि नमक क्या अपना बेटा के हिस्सा दूध भी तुम हमको हांडी से निकाल कर दे दोगी।
मन्ती काकी कुछ बोलती कि उससे पहले मुखिया जी बोल उठे हाँ मल्लूह जी, आप भी सिंथेटिक दूध पी कर किशन के तरह जिंदगी भर डाक्टर का चक्कर लगाते रहियेगा।
"सिंथेटिक दूध" और "किशन की लम्बी बीमारी" की बात सुनते ही चौपाल पर बैठे सभी लोगों का होश उड़ गया
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गँगुआ ने हैरत से पूछा "ए मुखियाजी जो बोलना है खुल कर बोलिये"
मुखिया जी ने अपना ज्ञान बघारने वाले अंदाज़ में बोलना शुरू किया, "अरे भाई रघु मौत का सौदागर है, मौत का सौदागर....., आज तक इस गाँव में कितना आदमी दूध से ज्यादा पानी मिला कर शहर में बेचा है, लेकिन रघु जैसा तरक्की कौन किया है, जरा किसी का नाम बताओ"
लठैत हैरत से बात तो बिल्कुल सही बोलेते हैं मुखिया जी !!!!
मुखिया जी आगे बोलना शुरू किया "अरे रघु कपड़ा धोने वाला सरफ (डिटरजेंट), खेत में डालने वाला यूरिया, मकान रंगने वाला सफेद पेंट, कीटनाशक फोर्मेलीन, और केमिकल मिला कर दूध बनाता है। इसी को बोलते हैं "सिंथेटिक दूध"। जानते हो सिंथेटिक दुध से क्या-क्या होता है:-
अल्सर, पीलिया, बी पी का बीमारी, किडनी और लीवर का प्राब्लम, लीवर कैंसर और बहुत कुछ।
बुढवा लोग कमजोरी दूर करने के लिये दूध पिता है, लेकिन सिंथेटिक दूध तो आदमी का हड्डी ही गला देता है। समय से पहले आँख खराब होना, बाल सफेद होना, दिल और दिमाग कमजोर होना अरे मत पूछो रघु के सिंथेटिक दूध का क्या-क्या फायदा है।
मल्लूह काका ने मुखिया जी को टोका "अरे चलिये मुखिया जी, हम आपसे ही नमक माँग कर खा लेंगे!!!
तभी गंगुआ ने मुखिया जी को टोका "ए मुखिया जी आप इस तरह से बेवजह रघु काका को बदनाम मत कीजिये!!!! अरे ऊ मल्टीनेशनल कम्पनी का पॉकेट वाला दूध बेच कर आगे बढ़े हैं। अगर कोई दोष है तो मल्टीनेशनल कम्पनी वाला का है!!!!!
अब तो मल्लूह काका बिल्कुल बमक गये, "बोले शहर में चार अक्षर पढ़ के बड़का ज्ञानी बनता है!!! अरे बुरबक रघु डाक्टर कहिया से बन गया जो इंजेक्शन का कार्टून का उसको हर सप्ताह ज़रूरत पड़ता है।"
मुखिया जी गाँव वालों को समझाते हुए "अरे गाँव वालों रघु इंजेक्शन से कम्पनी का पॉकेट से ऑरिजिन दूध निकाल कर सिंथेटिक दूध डाल कर गाँव के बढ़िया-बढ़िया डाक्टर-इंजिनियर को मूर्ख बना दिया। तुमलोग कहाँ का विद्वान बने फिरते हो। अगर विश्वास नही होता है तो गाँव के महेंद्र डाक्टर से खुद पूछ लो।
महेंद्र डाक्टर चौपाल पर ही मौजूद था "बोला, भाई हमको माफ करो, लेकिन रघु जी बोले कि गाँव का लोग जल्दी बीमार नही पड़ेगा, और बीमार पड़ेगा तो तुम्हारा भी आमदनी बढेगा। इसलिए हम आपलोग को कुछ नही बताये थे।"
चारों ओर सन्नाटा पसर चुका था। कल रघु काका के बेटी में भोज खा कर जो लोग उनका गुणगान कर रहे थे, उनकी काली करतूत जान कर सभी उतना ही भयभीत थे। दरअसल गाँव में शायद बहुत कम लोग ऐसे थे जिन्होंने रघु काका से सिंथेटिक दूध नही खरीदा हो। गाँव ही क्या इस देश में भी बहुत कम ऐसे लोग हैं जिन्होंने किसी ना किसी रघु काका से जहरीला सिंथेटिक दूध नही खरीदा हो, ऐसा मैं नही 16 मार्च 2016 को केंद्र सरकार खुद कहती है कि भारत का हर तीसरा आदमी किसी ना किसी रूप में जहरीला दूध का सेवन कर रहे हैं। पर पैसे के लिये रघु काका जैसे कुछ लोग इतना गिर चुके हैं कि उन्होंने दूध जैसे अमृत को ज़हर बना दिया है। आज दूध के लिये गाँव में एक फेमस लोकोक्ती प्रचलित है :-
"गाँव में मिलता नही, शहर में बिकता नही"
गम्भीर सन्नाटे को ख़त्म करते हुए रघु काका का भाई जग्गू काका बोल उठे कि ऑरिजिन दूध आजकल के लोग को पचता कहाँ है। हम शहर जब भी ऑरिजिन दूध ले कर गये हैं सब बोलता है कि पौडर डाल कर लाया है लेकिन पॉकेट वाला सिंथेटिक दूध पी कर सबका दिल स्टाइल से बोलता है -"दिल मांगे मोर....,
लठैत ने जग्गू काका को बीच में ही रोकते हुए बोला समझ गये जग्गू काका, हमलोग बिल्कुल समझ गये
"जिनको जल्दी मरना है, तो पियो ब्राण्डेड दूध"
- बिपिन कुमार चौधरी
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