"हाय रे मुखिया...., तोरा कीड़ा लगतौ....,
तोहार वंश नाश हो जाये रे कोढिया....,
तू अन्हरा हो जाओ...., मुखिया के बेटा मर जाये....,
ए दुर्गा मैया..... , ई धरती उलट जाये....,
सब पापी लोग को तू उठा लो .....,
लठैत का कुल नाश हो जाये.....,
बाबू हो बाबू.... , ए भोला बाबा हम केना जीयम....,
हे प्रभु !!! ई कौन दिन तू दिखा रहल ह....,
हमरा के उठा ल हे भोला बाबा....., हमरा के उठा ल....,"
मन्ती काकी की जुबान से ना जाने आज इस तरह के कितने श्रापों का लगातार बौछार हो रहा था लेकिन कलयुग में इस धरती पर भोला बाबा और दुर्गा मैया के पक्के भक्त मन्ती काकी की सुनने वाला कोई नही था। हर किसी के सुख-दुख में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने वाली काकी के दर्द भरी दास्तान को सुनने के लिये भी गाँव में आज कोई तैयार नही था। जर्जर हालत वाली उसकी झोपडी के अंदर टूटी खाट पर उसका जवान बेटा कराह रहा था और खाट के पास ही काकी की बहु के आँखो से लगातार अश्रु की धारा लगातार बह रही थी। आज इस परिवार के घर पर कयामत से पहले ही दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। घर का कमाने वाला इकलौता जवान बेटा गाँव के दबंगों से पैर तुड़वा कर अपनी लाचारी पर आँसू बहा रहा था। काकी की बहु ने जब घर के लोगों का पेट भरने के लिये मज़दूरी करने का निर्णय लिया तो दबंगों ने उसकी आबरू की ही धज्जियां उड़ा दी। अंजुमन काका पंचेति को तैयार नही हैं तो दरोगा साहब घर की बची खुची जमा पूँजी पर हाथ मार कर भी इस तरह बैठे हैं, जैसे कुछ हुआ ही नही हो.....!
गरीब पर हुए जुल्म और सितम का किसी को वैसे भी कोई परवाह नही होता है क्योंकि धरती पर उसका कोई सुनने वाला नही होता है। दरअसल जिस व्यक्ति के पूर्वजन्मों के पापों के कारण माता लक्ष्मी ही उससे नाराज हो, उससे किसी को डरने की कोई ज़रूरत भी नही होती है, इस दुनियाँ में माता लक्ष्मी की कृपा के बगैर किसी को न्याय पाने का भी कोई हक नही है और न्याय भी आपको तभी मिलेगा जब जुल्म करने वाले की अपेक्षा आप पर लक्ष्मी की कृपा ज्यादा हो। नही तो न्याय के दरवाजे पर वर्षों सिर पटकने के बाद भी गरीब आदमी माँ लक्ष्मी को और भी ज्यादा रुष्ट कर देती है और अंत में संदेह के आधार पर जुल्म करने वाले लोग बच जाते हैं। यह वर्तमान संसार के न्याय व्यवस्था का सबसे क्रूर और घिनौना सच है, जिससे कई बार इस उक्ति में संदेह होने लगता है कि क्या वाकई "सत्य की विजय होती है " । मन्ती काकी के दुख और व्यथा की कथा इस बात का सबसे जीवंत उदाहरण था। जहाँ गाँव का बच्चा-बच्चा सच्चाई जानता था लेकिन कोर्ट को सही निर्णय देने के लिये एक अदद गवाह भी नही मिल पा रहा था।
कुछ ही दिनों पहले की बात है, मन्ती काकी कितना खुश थी। मुखियाजी के चुनाव जीत कर आने पर वो सबसे आगे पहुँच कर अपनी दो दिन का मज़दूरी वाला रुपया खर्च कर माला खरीद, मुखिया जी को माला पहनाई थी। मुखिया जी ने भी उनसे कहा था कि मन्ती अब तुम्हारा सब काम हो जायेगा। तुमने जो चुनाव में मेरा इतना मदद किया है, भूखे प्यासे घर-घर जा कर मेरे पतंग छाप का प्रचार किया है, उसका तुमको हम बहुत ईनाम देंगे। अरे तुमको ही क्या अपने पंचायत के एक-एक गरीब को बी.पी.एल. और अंत्योदय मिलेगा। सब आदमी का इन्द्रा आवास बनेगा। बूढ़ा लोग का पेंशन कार्ड बनेगा और गरीब नौजवान का लेबर कार्ड बनेगा। कोई मेरे पंचायत में भूखा नही सोयेगा और किसी को बीमार होने पर इलाज कराने के लिये शहर नही जाना पड़े उसके लिये सबसे पहले हम एक बहुत बड़ा हॉस्पिटल भी बनवायेंगे। अगर शहर जाने का नौबत भी आया तो उसे शहर जाने में दिक्कत नही हो इसके लिये गाँव को पक्की सड़क के द्वारा शहर से जोड़ा जायेगा।भाईयो और बहनों हम अपना एक-एक वादा पुरा करेंगे और सबसे बड़ी बात कि जब तक हम मुखिया हैं किसी को भी कोई काम करवाने के लिये एक रुपया घूस देने की ज़रूरत नही है। फिर क्या था मुखिया जी की जय.... मुखिया जी की जय.... के नारों से धरती और आकाश गूँज उठा। जबकि इस गाँव का पत्ता-पत्ता और मिट्टी के धूल का एक-एक कण इस बात का गवाह थे कि ऐसे कितने ही वादे कितने ही मुखिया द्वारा होता रहा है लेकिन पाँच वर्ष पूरे होने के बाद भी पंचायत ने सिर्फ और सिर्फ मुखिया और उसके परिवार के सदस्यों, उसके चापलूस चमचों, ठेकेदारों, छुटभैया नेताओं और कुछ दबंग टाइप के गाँव के उनके विरोधियों का ही विकास देखा है। गरीबों ने विकास की ये बाते सिर्फ सुनी थी और इसी से वो खुश भी हो जाते थे ठीक उसी प्रकार जैसे गरीब के बच्चे कोई सामान या खिलौना नही मिलने पर दादा-दादी के इसी आश्वाशन से खुश हो जाते हैं कि सो जा बेटा भोला बाबा और परी रानी तुम्हारे सपने में आ कर इससे भी बढ़िया खिलौना और मिठाई देंगे।
अगले ही दिन मन्ती काकी को मुखिया जी का बुलावा आया। पहुँचते ही मुखिया जी ने मन्ती काकी से अपनी दर्द भरी दास्तां सुना डाला। बोले "क्या बोले मन्ती एक तुम ही हरिजन टोला में सबसे समझदार औरत हो!!! अब तुम ही बताओ ई दो महीना से चुनाव प्रचार में मेरा कितना खर्च हुआ ई पुरा इलाका जानता है। रोज़ तो कम से कम दो सो आदमी खाना खाता था, उसमें बहुत खाना खाने वाला हमको वोट भी नही दिया है!!! खैर ऊ लोग को तो हम सबक सीखा देंगे। अब अभी बी.डी.ओ. साहब का फोन आया है कि जीत की खुशी में शपथ ग्रहण से पहले पार्टी देना होगा। मतलब कम से कम पचास हजार का मामला है, अब बताओ क्या करें??? अगर खर्च नही करेंगे तो कल किसी का ग्रामीण आवास और लेबर कार्ड वाला कोई काम नही हो पायेगा। तुम सबको समझा-बुझा के बोलो कि जिसको-जिसको इन्द्रा आवास और लेबर कार्ड बनवाना है, एक-एक हजार रुपया जमा कर दे। अब तुम्ही बताओ जो लोग इस मुसीबत में मेरा मजबूरी समझेगा हम भी सबसे पहले उसी का काम न करवायेंगे।
मन्ती काकी को मुखिया जी कि बात पर दया आ गयी, और उसने मुशहरी टोला के घर-घर जा कर सबको बड़े प्यार से समझया। सब लोग मुखिया की बात पर भरोसा नही भी करते लेकिन मन्ती काकी की बात किसी से काटा नही गया और शाम होते ही मुशहरी टोला के गरीब लोगों ने मुखिया जी को एक लाख बाईस हजार रुपया भेंट कर मुसीबत से निकाल लिया। कुछ ने इन्द्रा आवास के लालच में, कुछ पेंशन के लालच में, कोई लेबर कार्ड के लिये तो कोई किसी और लालच में.......!!! मुखिया जी सभी गरीब लोगों को ना सिर्फ दिल से बहुत-बहुत धन्यवाद दिये बल्कि ये वादा किया कि पंचायत का काम शुरू होते ही उनलोगों का काम करवा देंगे। मन्ती काकी भी दो हजार रुपया किसी प्रकार व्यवस्था करके मुखिया जी को पहुँचा आयी। मुखिया जी ने सबसे पहला इन्द्रा आवास उसी का बनाने का वादा भी कर दिया।
ये दो हजार रुपया में एक हजार तो मन्ती काकी ने दस रुपया महीना सूद पर मुरली काका से उठाया था और एक हजार रुपया गाँव के बड़े लोगों के यहाँ बरतन मांज कर जमा की थी कि इस वार अपने झोपडी का मरम्मत कराकर अपने एकलौते बेटे का शादी करा देगी। मुखिया जी के बातों से आज मन्ती काकी बहुत खुश थी। जिसके खानदान में आज तक किसी ने पक्का मकान में नही रहा हो उसका बेटा-बहु पक्का मकान में रहेगा। बेटा का लेबर कार्ड बन जायेगा और सरकारी काम में मजदूरी करेगा तो मज़दूरी सीधे बेटा का बैंक खाता में आ जायेगा और उसको अपना भी क्या चिंता है, जिसके यहाँ बरतन धोयेगी उसी के यहाँ खाना मिल जायेगा। विधवा पेंशन मिलेगा अलग आराम से जिंदगी काट लेगी।
करीब छः माह हो गये लेकिन मुखिया जी ने मन्ती काकी का कोई काम नही करवाया। मन्ती काकी को मुखिया जी पर बहुत भरोसा था, लेकिन अपने बेटे के बार-बार कहने पर वो एक दिन मुखिया जी से मिलने गयी। मुखिया जी मन्ती को देखते ही रोने सा सूरत बना कर बोले, क्या बातायें मन्ती भलाई का ज़माना नही है!!! कभी-कभी मन करता है कि मुखिया का पोस्ट से रिज़ाइंड कर दें। अरे मूर्ख लोग सरकारी काम धीरे-धीरे होता है। सरकार का अपना नियम-कानून है। सरकारी मुलाजिमों को सब बात सही ढंग से समझ कर कागज बनाना पड़ता है। छोटा सा गलती हो जायेगा तो नौकरी ख़त्म हो जायेगा, लेकिन ई मूर्ख लोग को कौन समझाये कि हमलोग बैठे नही हैं!!! हम कोशिश कर रहे हैं और जितना आदमी तुम्हारे मार्फ़त पैसा दिया है सबका सारा काम जल्द से जल्द करवाने का प्रयास कर रहे हैं। अब तुम ई गंवार लोग को थोड़ा अपने से समझा देना कि सब लोग रोज़ सुबह-शाम भीड़ लगा के मेरा माथा खराब नही करे!!! नही तो मेरा मन गुस्साया तो जो भी काम होने वाला है, ऊ भी नही होने देंगे!!! मन्ती काकी मुखिया जी से कुछ नही बोल सकी और आकर अपने बेटे किशन को सिर्फ इतना ही बोली कि बेटा मुखिया जी लगे हैं!!! किशन थोड़ा गुस्सा हुआ फिर दस दिन बाद माँ को मुखिया से मिलने की हिदायत दे कर गाय को सानी-पानी देने चला गया। इसके बाद मन्ती काकी हर दस दिन पर मुखिया जी के यहाँ जाती थी। घंटों बैठती थी, मुखिया जी के यहाँ अक्सर बरतन धोने और गेहूँ फटकने का बेगारी भी करती थी। दो वर्ष बीत गये लेकिन मन्ती काकी का कोई काम नही हो पाया।
एक दिन किशन भी मन्ती काकी के साथ मुखिया जी से लड़ने के ख्याल से उनके यहाँ पहुँचा तो मुखिया जी ने किशन को बड़े प्यार से समझाया कि बेटा तुम्हारा काम हो गया है जल्दी से तुम अपना और अपने माँ का आधार कार्ड और आवासीय प्रमाण पत्र बनवा लो। किशन को ये दोनों कागज बनवाने में ही दो महीना लग गया। फिर मुखिया जी ने बोला बैंक में खाता खुलवा लो। मनेजर साहब बढिया आदमी थे एक दिन में खाता खोल दिये लेकिन प्रिंटर खराब होने के कारण छः माह तक किशन को पासबुक नही मिल पाया और किशन छः माह तक पासबुक के लिये बैंक का चक्कर लगाता रह गया। जब पासबुक ले कर मुखिया के पास पहुँचा तो मुखिया जी बोले बेटा किशन ज़माना बहुत खराब है। अरे तुम मन्ती का बेटा है इसलिये हम तुमसे एक पैसा नही लेंगे लेकिन अफसर लोग को कौन समझाये, सब टेबल पर कुछ ना कुछ लगता है। कम से कम दस हजार का व्यवस्था करो, तुम्हारा इन्द्रा आवास हम तुरंत बनवा देंगे और हाँ मन्ती को बोल देना उसके पेंशन का फॉर्म हम ले आये हैं कल आकर टिप्पा लगा देगी।
किशन बहुत निराश हो गया कि दस हजार रुपया वो कहाँ से लायेगा और गाँव में मजदूरी करके किसी तरह पेट पाला जा सकता है, दस हजार रुपया दो वर्ष में भी बचा पाना मुश्किल है। तभी उसकी मुलाकात हीरवा से हो गयी जो अगले दिन पंजाब जाने वाला था फिर क्या था किशन भी हीरवा के साथ पंजाब को निकल गया। एक वर्ष तक कठिन मेहनत के बाद वो वहाँ से दस हजार रुपया कमा कर लौटा। आकर देखा तो माँ बहुत बीमार है, उसने मुखिया को पैसे देने के बजाय माँ को शहर के डाक्टर से दिखाने को सोचा लेकिन माँ की जिद्द के आगे उसकी एक ना चली और वो सारा पैसा मुखिया के कदमों में रख आया कि मुखिया जी ई पैसा रख लीजिए और जल्दी से इन्द्रा आवास मेरा बना दीजिये। मुखिया जी ने इत्मीनान से पहले सारा पैसा गिना फिर उसे अपनी पत्नी के हवाले करते हुए बोले कि देखो बेटा किशन हम तुमको एक वर्ष पहले दस हजार बोले थे अभी इन्द्रा आवास का फंड भी बढ़ गया है। इसलिए अफसर लोग का कमीशन भी बढ़ गया है।
किशन बिल्कुल परेशान हो कर बोला "और कितना पैसा लगेगा मुखिया जी "
मुखिया बोले "बेटा ,पैसा तो बहुत लग रहा है!!! साला सब अफसर लोग का मुँह दिन पर दिन बड़ा होते जा रहा है। लेकिन तुम मन्ती का बेटा हो, जाओ तुम दस हजार और जमा कर देना !!! हम तुम्हारा काम करवा देंगे!!!"
किशन ने अपना सर पीट लिया लेकिन वो कर भी क्या सकता था। दुखी मन से घर लौटा तो देखा, माँ की तबियत बहुत ज्यादा ख़राब है। शहर के सरकारी हॉस्पिटल में ले जा कर दिखाया तो पता चला कि माँ को टी.बी. हो गया है।
अगले दिन किशन मुखिया के पास जा कर बोला कि "ए मुखिया जी माय को टी.बी. हो गया है। आप पैसा लौटा दीजिये। हमको अब इन्द्रा आवास नही चाहिये, अब हम माँ का इलाज करवायेंगे !!!"
मुखिया जी इतना सुनते ही गुस्सा से आग-बबूला हो कर बोले "रे गंवार, तुमलोग को कोई काम धंधा नही है जो रोज़-रोज़ मेरा माथा खराब करने आ जाता है!!! पैसा जमा किया तो हम उसको कागज आगे बढ़ाने में लगा दिये!!! पैसा यहाँ फ़ड़ता है कि तुमको लौटा दें !!! भाग यहाँ से..... और अब दस हजार हो जाये तभी हमको अपना मनहूस शक्ल दिखाना !!! चल यहाँ से भाग....., फुट यहाँ से..... !!!
किशन गरीब था लेकिन दिल का बहुत मजबूत था। लेकिन आज वो बहुत रोया !!!! उसने अपने बाप को नही देखा था लेकिन अपनी माँ को वो अपनी जान से भी ज्यादा चाहता था। पैसे का इंतिजाम करना बहुत मुश्किल था और ईलाज के बगेर उसकी माँ टी. बी. से मर जाती और वो अनाथ हो जाता। वैसे भी इस दुनिया में माँ के आलावे उसे और किसका सहारा था। घर जब पहुँचा तो माँ को देख कर वो और भी ज्यादा रोने लगा। माँ ने उसे समझाया कि रो मत बेटा हिम्मत रख!!!!
आज दुख है तो कल सुख भी आयेगा !!! मेरा अब कोई ठिकाना नही है। तुम अब जल्दी से शादी कर लो !!! बहु के लिये मैंने कुछ गहना बनवा कर बक्सा में रखा है। द्वार पर गाय माता है इसको बेच लो कुछ पैसा आ जायेगा । अपना घर बसा लो, बहु का मुँह देख लेंगे तो हमको मरने से पहले बहुत शांति मिल जायेगा।
किशन माँ की बात कभी नही काटता था, सो माँ के कहे अनुसार उसने गाय बेच कर बगल के गाँव के लुखरी से विवाह कर लिया। लुखरी भी गरीब घर की एक मेहनती लड़की थी। सांवली रंग का होने के बावजूद नक्शा-कटिंग बढिया था। सबसे बड़ी बात लुखरी मिलनसार और धार्मिक प्रविर्ति की लड़की थी। शादी के कुछ ही दिन बाद लुखरी ने किशन को अपने बक्से से गहना निकाल कर दिया और बोला इसे बेच कर माँ का ईलाज करा लो। अब तक किशन के दिमाग में ये बात नही आयी थी। उसने गहनों को बेच कर लगभग पच्चीस हजार रुपया पा लिया। पैसा पाते ही सबसे पहले माँ का बढिया डॉक्टर से ईलाज करवाया और जब माँ कुछ ठीक हो गयी तो शेष रुपया ले कर मुखिया जी के पहुँचा और बड़े गुस्सा से मुखिया को बोला कि देखिये मुखिया जी आज आपको हम दस हजार रुपया और भी दे कर जा रहे हैं। अब जल्दी से मेरा इन्द्रा आवास बनवा दीजिए नही तो अब जुल्म हो जायेगा।
मुखिया जी को किशन का ताव हज़म नही हो रहा था, लेकिन उनका एक उसूल था कोई कितना भी बुरा क्यों ना हो लक्ष्मी ले कर आने वाले का वो अपमान कम से कम उस दिन नही करते थे। आज उन्होंने बड़े प्रेम से किशन से बात की और सारा रुपया गिनने के बाद बोले "बेटा इसमें तो एक सो दस रुपया कम है!!! खैर जाने दो तुम मेरे बेटा दाखिल हो !!! अब तुमको एक रुपया देने की ज़रूरत नही है!!! जो पैसा घटेगा-बढेगा हम लगा देंगे!!!! लेकिन अब हम जितना जल्दी हो सके तुम्हारा इन्द्रा आवास बनवा देंगे।"
किशन आज बहुत खुश था कि लुखरी उसके जिंदगी में लक्ष्मी बन कर आयी है। देखते ही देखते सब समस्या ख़त्म होता जा रहा है। इन्द्रा आवास बनते ही वो फिर कुछ दिन के लिये पंजाब चला जायेगा। वहाँ खूब मेहनत करके ढेर पैसा कमा कर लायेगा और लुखरी का सब जेवर बनवा देगा। यही सब सोचते-सोचते वह घर लौट ही रहा था कि रास्ते में उसे हिरवा मिल गया बोला "अरे किशन इस बार पंचायत चुनाव में तुम किसको वोट देगा??? हमलोग तो बनारसी काका को इस बार मुखिया बनायेंगे !!!!! साला अभी का अपना मुखिया बईमान है !!!! पंचायत का सत्यानाश कर दिया !!!! तुम भी बनारसी काका को वोट देना वही तुम्हारा इन्द्रा आवास भी बनवा देंगे !!!!"
किशन आज मुखिया जी के बातचीत के तरीका से बहुत खुश था। बोला ना रे हिरवा अपना मुखिया भी उतना गलत नही है बस हमलोग सिस्टम से नही जाते हैं। आज हम सिस्टम से गये तो मेरा काम तुरंत हो गया।"
हिरवा आश्चर्य से किशन की ओर देखते हुए बोला "ई क्या बोल रहा है रे किशन तुम, पाँच वर्ष में तुम्हारा एगो इन्द्रा आवास नही बना और तुम मुखिया का गुणगान कर रहा है!!! पगला गया है क्या जी !!!!"
गरीब का दिल बहुत साफ होता है। आप अमीरों को लाखों-करोड़ों का चढ़ावा दे कर भी शायद खुश नही कर पायें लेकिन गरीब से दो शब्द प्रेम से अगर बात भी कर लो तो वो आपके लिये जान देने को तैयार हो जाता है। किशन के साथ मुखिया का आज का व्यवहार, किशन के मन में मुखिया के खिलाफ के पुराने सारे मैल को धो चुका था। उसने हिरवा को समझाते हुए बोला "नही रे हिरवा !!! हम ही मुखिया के पास सिस्टम से नही गये थे!!! अब देखना कुछ ही दिन में मेरा इन्द्रा आवास बन कर तैयार हो जयेगा!!!"
घर आ कर ये खुशखबरी उसने अपनी माँ और पत्नी लुखरी को दिया। लुखरी खुश थी लेकिन उसकी माँ किशन की पत्नी के गहने बिक जाने से थोड़ा दुखी थी, लेकिन बेटे और बहु को खुश देख कर वो भी खुश थी ।
कुछ दिनों के बाद मुखिया जी करीब पंद्रह-बीस आदमी के साथ हाथ में ईंट ले कर किशन के घर पहुँचे तो मन्ती को लगा कि आज उसके बेटे के इन्द्रा आवास का शिलान्यास होने वाला है। आज आते ही मुखिया जी ने सबसे पहले मन्ती काकी का पैर छू कर प्रणाम किया।बोले इस बार मन्ती भौजी यही ईंट छाप पर वोट डालना और डलवना है। मन्ती काकी ने अपने इन्द्रा आवास के बारे में मुखिया जी से जब पूछा तो मुखिया जी बड़े ही दुखी स्वर में बोला कि अभी तो आचार-संहिता लागू है।लेकिन हम तुम्हारा कागज बहुत आगे बढ़ा दिये हैं। इस बार सिर्फ चुनाव में जीत जाने दो सबसे पहले मन्ती भौजी तुम्हारा ही इन्द्रा आवास बनेगा। मुखिया जी द्वारा मन्ती काकी का पैर छू कर प्रणाम करने से किशन और लुखरी भी बहुत खुश थे सबने मिल कर ईंट छाप का खूब प्रचार किया।
उधर बनारसी काका भी घर-घर अपने बाल्टी छाप का प्रचार करने में लगे हुए थे। हिन्दु वोट दोनों में बँट जाने के कारण इस बार अंजुमन काका के पतंग ने बाजी मार ली।
पंचायत चुनाव में मुखिया के हारने से किशन और मन्ती काकी के साथ सब हिन्दु लोगों को बहुत दुख हुआ। सब बनारसी काका को दोष दे रहे थे कि अगर ई लोग आपस में नही लड़ते तो कोई मुस्लिम पंचायत का मुखिया कभी नही बनता। खैर चुनाव में हार-जीत होती रहती है। दो-चार महीना बाद सब लोग चुनाव का सारा बात भूल गये। इसी बीच लुखरी ने किशन को पुराने मुखिया के पास जा कर अपने इन्द्रा आवास के स्थिति के बारे में जानकारी मालूम करने को कहा।
अगले दिन सुबह-सुबह जब किशन पूर्व मुखिया के यहाँ पहुँचा तो मुखिया जी उसे देखते ही बमक गये। बोले अब यहाँ क्या लेने आया है रे किशना !!!! वोट दिया सब मिलकर बनारसी बाबू और अंजुमन मियाँ को अब हम्मर जलल पर नमक छिड़कने आया है!!!
किशन ने बड़े प्यार से समझाया "मुखिया जी हमलोग पर कम से कम संदेह ना कीजिये!!!"
मुखिया जी किसी शर्त पर किशन के बात को मानने को तैयार नही थे। गुस्सा से बोले एक मिनट में जो बोलना है बोल कर रास्ता पकड़ !!!!
किशन ने जैसे ही अपने इन्द्रा आवास का बात छेड़ा !!! मुखिया जी का गुस्सा सातवें आसमान पर था, लेकिन किशन भी आज आर-पार के लड़ाई के मूड में था। बोला रे मुखिया, आज या तो मेरा इन्द्रा आवास का कागज दो या मेरा टोटल बाईस हजार रुपया सूद के साथ लौटा दो!!!I
ऐतना सुनते ही बाभण टोली में कोहराम सा मच गया। बाभन टोली के सभी लड़का लोग का खून उबलने लगा कि ई मुशहर टोला का मामूली हरिजन बाभन टोला के बुजुर्ग से इस तरह बात करेगा। फिर क्या था सबने मिल कर उसे खूब पीटा और लठैत के एक जोरदार लाठी के प्रहार से किशन का दायाँ पैर टूट गया। किसी तरह मामला शांत हुआ लेकिन किशन को ना तो रुपया वापस मिला, ना ही उसका इन्द्रा आवास बना और ना ही उसे बुरी तरह पीटने वाले को कोई दंड.....!
इधर बिछावन पर पड़े-पड़े किशन की तबियत और भी खराब हुए जा रही थी कि एक दिन लुखरी भी गाँव की महिलाओ के साथ मजदूरी करने को चली गयी। किशन और पूर्व मुखिया के बीच दुश्मनी का सारा कहर लुखरी पर टूटा और मुखिया के कुछ गुंडो ने बीच सड़क से उसे उठा लिया और उसके आबरू की धज्जियां उड़ा दी......?????
पिछले कई दिनों से मन्ती काकी का ये विलाप अनवरत जारी है, लेकिन कोई उसके दर्द को सुनने और मदद करने को तैयार नही है.....!!!!
वर्तमान मुखिया अंजुमन काका के पास जब मन्ती काकी मदद के लिये पहुँची तो उन्होंने डाँट फटकार लगाते हुए कहा कि "बड़ा उसको वोट देती थी !!! अब भुगतो !!!!!"
- बिपिन कुमार चौधरी
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