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व्यंग्य // मास्टर सब सनक गया है .......!

चैत का महीना था। गर्मी की सुगबुगाहट लोगों को धीरे-धीरे महसूस होने लगी थी। शुरुआती गर्मी होने के कारण लोगों को मौसम सुहावना लग रहा था। गोधूलि बेला के समय सभी किसान-मजदूर अपने-अपने घर को चले जा रहे थे। गंगुआ भी अपने कंधे पर कुदाल लिये घर की ओर लौट रहा था कि तभी उसका सामना अपने लंगोटिया यार लठैत सिंह से हो गया। लठैत सिंह देखते ही जोर से पुकारा का रे गंगुआ चलेगा का बिंजी मेला देखने। सुने हैं बड़ा बढिया नौटंकी आया है।
"नही रे लठैत, तबियत ठीक नही लग रहा है" गंगुआ बोला।
"छोड़ यार!!! अब तू नही जायेगा, तो मैं भी नही जाऊँगा" लठैत ने भी मन बदलते हुए बोला।

लठैत ने फिर अचानक से गँगुआ को रोकते हुए पूछा "अरे गंगुआ, ई  मास्टर सब काहे सनक गया है, सुने पटना में बड़ी लाठी डंडा चल रहा है। कई गो मास्टर लोग घायल हो गया है। एगो सरला बहन अनशन किये है। स्कूल के मास्टर लोग भी बच्चा सब का कॉपी जाँच नही कर रहा है। आखिर ई सब हो क्या रहा है, पढ़-लिख के एतना इज्जतदार आदमी लोग ऐसे काहे कर रहा है।"
गंगुआ थोड़ा गम्भीर हो गया। एक लम्बी साँस लेते हुए बोला "एक बात बताओ लठैत, तुम अभी आ कहाँ से रहा है????"
"मकई खेत से आ रहा हूँ, काहे कोई बात हुआ है क्या ???" लठैत ने चिंता भरे स्वर में पूछा!!!
"खेत में क्या काम अभी करवा रहा है???" गंगुआ ने फिर अगला प्रश्न पूछा।
"धे बुरबक, देख नही रहा है, दस गो मजदूर हाथ में कचीया लिये साथ में लौट रहा है। मतलब साफ है कि मकई कटवा रहा हूँ, और अभी खेत में सब लोग मकई कटवाने में ही परेशान है, बाँकि कौनो  काम का अभी फुरसत किसी को थोड़े है" लठैत ने जवाब दिया।

गंगुआ ने फिर पूछा "ई बताओ कि ई मजदूर लोगन को क्या मज़दूरी देने का बात किये हो"
"अरे यार तुम गाँव में रह के क्या अनाफ-सनाफ पूछ रहा है। ई गाँव के बच्चा-बच्चे जानता है कि ए समय मजदूर लोग का मजदूरी दो सौ रूपया है और साथ में दोपहर में खाना देना पड़ता है" लठैत ने झल्लाते हुए जवाब दिया।
अब गंगुआ ने फिर कहा "आज तुम चार मजदूर को दो सौ के जगह अस्सी रूपया मज़दूरी देना!!!"
लठैत तमतमाते हुए बोला "यार तुम पगला गया है का जी!!!! एकौ कर्म ई लेबर लोग हमारा नही छोड़ेगा!!!! पुरा दुनियाँ जानता है कि दो सौ मजदूरी है अभी मकई कटाई का, सब मजदूर जब समान काम कर रहा है तो सबको समान मज़दूरी का पुरा-पुरा हक है। मजदूर लोगन में बड़ा एकता होता है। जिसको वाजिब मज़दूरी देंगे ऊ भी और जिसको अस्सी रूपया देंगे ऊ भी सब मिलकर मेरा इज्जत उतार देगा। रे बुरबक, ई पागलपन तुम्हारे दिमाग में आया कहाँ से है जी। ई  बुद्धि से चलोगे तो पूरूख-दादा का कमाया सब इज्जत मिट्टी में मिल जायेगा। समान काम का समान मज़दूरी सबका कानूनी हक है। अगर हम मजदूर लोग के साथ ऐसा नाइंसाफी किये तो ना नीचे वाला मुझे माफ करेगा, ना ऊपर वाला!!! एक बात और बोल देते हैं - ऐहे बकलोल वाला अगर बुद्धि तुमको देना है तो आज से हम दोनों का दोस्ती ख़त्म!!! तुम क्या चाहते हो कि अलग-अलग मज़दूरी दे कर सब मजदूर लोग से हम दुश्मनी कर लें, जिससे कल कोई मजदूर मेरा काम करने नही आये। मेरा खेती-बारी, घर-गृहस्थी, मान-सम्मान सब बरबाद हो जाये!!! यही तुम्हारा सोच और तुम्हारी दोस्ती है!!! आज के बाद कभी कौनो मजदूर का वाजिब हक से हकमारी करने का सुझाव हमको नही देना!!! नही तो ऊ दिन हम भूल जायेंगे कि तुम मेरा दोस्त है!!! वही गर्दन मरोड़ देंगे!!! सब होशियारी निकल जायेगा !!! बड़ा आया मजदूर से हमारा झगडा करवाने वाला !!! आ थू.... आ थू..... !!!

गंगुआ इतनी बैज्जती के बाद भी ना जाने क्यों मुस्कुरा रहा था। उसने लठैत को मनाते हुए बोला "यार तुम तो जरा सा बात का बतंगड बना दिया!!! गल्ला मरोड़ने का बात करने लगा!!! अरे हम तो तुमको बस इतना समझाना चाह रहे थे कि जिस तरह मजदूर लोगों  को समान काम के लिये समान मजदूरी का पुरा-पुरा हक है, उसी तरह सब आदमी को समान काम का समान हक है। इसी बात के लिये मास्टर लोग आंदोलन कर रहा है, लेकिन सब बोलता है कि मास्टर लोग सनक गया है।"

लठैत बिल्कुल सकपका गया "रे गंगुआ रे, तुमको पता है ना कि हम ज्यादा पढल-लिखल नही हैं। ज्यादा घुमा फिरा के बात करेगा तो हमार लाठी सीधे माथा पर बजरता है। हम सिर्फ इतना बात जानते हैं कि दसों मजदूर मकई काटा है और सबको बराबर दो-दो सौ रूपया देना है। अब तुम जो भी बोलना चाहता है एकदम क्लियर बताओ।"
गंगुआ लम्बी साँस लेते हुए बोला "हम सब लोग जानते हैं कि मास्टर लोग का वाजिब क्या वेतन होता है??? अप्पन स्कूल के बुढवा मास्टर को कितना तनख्वाह मिलता है, तुम भी जानता होगा लेकीन ई  सरकार नियोजन के नाम पर एतना पढल-लिखल मास्टर लोगों का शोषण कर रही है। जब तुम्हारा मजदूर लोग इस नाइंसाफी को बर्दाश्त नही कर सकता है तो तुम सोच सकता है कि बिहार राज्य का चार लाख शिक्षक लोग क्या कर सकता है। ऐतना ही नही हम्मर सुशासन बाबू सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी मानने को तैयार नही है तब लोग सड़क पर आंदोलन करेगा कि नही !!!!

लठैत बिल्कुल आवाक हो गया "यार ई बात है, तब तो मास्टर सब बिल्कुल ठीक कर रहा है। अब कोई अप्पन हक का लड़ाई भी अगर नही लड़ सकता है तो आदमी में उसका जन्म ही बेकार समझो !!! ऐसन आदमी को  तुम मुर्दा ही समझो!!! समान काम के समान वेतन सबके कानूनी हक है, ई दुनियाँ में सबको अप्पन कानूनी हक के लिये जी-जान से लड़ना चाहिये!!! इसपर अगर कोई ई लोग को सनकल कहे तो ऊ एकदम पागल और गँवार है।"
गंगुआ बाजी पलटते देख बोला "एगो गँवार तो हम्मर सामने भी है, जो थोड़ा देर पहले मास्टर लोग को सनकल बोल रहा था"
और दोनों खिल-खिला के हँसने लगे
😆😆😆😆😆😆😆😆😆😆

कुछ देर बाद एकाएक लठैत बोल उठा "यार गंगुआ!!! ई बताओ कि आखिर सरकार मास्टर लोग का बात मान क्यों नही रही है???"
गंगुआ थोड़ा सोच कर बोला "सरकार बोलती है कि राज्य सरकार के पास इतना धन नही है कि सब मास्टर को समान काम का समान वेतन दे सके।"
"भक मरदे!!! एगो मामूली मुखिया अप्पन, पंचायत चुनाव के टाईम में दो बीघा ज़मीन बेच कर चुनाव लड़ा और जीत के पाँच साल में दस बीघा ज़मीन खरीद लिया। मुखीयाजी अप्पन बेटी के शादी में बीस लाख रूपया खर्च किये अलग। ऐसन-ऐसन कितना मुखिया होगा। सरकारी अफसर सब हर साल लाखों-लाख का प्रॉपर्टी खरीद लेता है और मास्टर लोग के लिये पैसा ही नही है !!!! हमको ई बात में बिल्कुल दम नही लगता है। मास्टर लोग के साथ सब गरीब-लोग के बच्चा सब का भविष्य जुड़ा हुआ है। सरकार को चाहिये कि न्यायसंगत तरीके से सबकी परेशानी समझे और सब मास्टर लोग को समान काम का समान वेतन और ऊ क्या बोलते हैं समान सेवशर्त दे के सब मामला ख़त्म करे।"

"बात तो तुम अबकी एकदम होशियारी वाला किया है रे लठैत" गँगुआ बोला।।।
लठैत ने फिर अपनी जिज्ञासा जाहिर की "अरे गँगुआ!!! तुम्हारे ख्याल से और क्या कारण हो सकता है ????
गंगुआ बोला "देख भाई !! बात बोलेंगे तो बहुत लोग को बुरा लगेगा !!! लेकीन हकीकत हम ज़रूर बोलेंगे। सरकार जितना भी निर्माण कार्य करती है उसमे नेता-अफसर-इंजिनियर-ठेकेदार सबका कुछ ना कुछ हिस्सा होता है। सब मिलजुल कर बंदरबांट करते हैं, लेकिन मास्टर के वेतन में किसी को कोई हिस्सा नही मिलता है। इसलिए सरकार के साथ-साथ सब लोग चाहते हैं कि मास्टर का वेतन जितना कम से कम हो। पर सब नेता और अफसर लोग ऐसा नही है कुछ लोग शिक्षक के कानूनी हक का समर्थन भी करते हैं। हम तो एक बात ज़रूर बोलेंगे कि समान काम का समान वेतन सब लोग का कानूनी हक है और ई हर हाल में सरकार को देना होगा। इसके लिये सब मास्टर लोग मिल कर लड़ाई भी शुरू कर दिये हैं, जो हमको बिल्कुल जायज लगता है।"

कुछ देर सोचने के बाद लठैत सिंह फ़िर बोला "यार सुने हैं कि मास्टर लोग में भी कई ग्रुप है। सबका अपना डपली अपना राग है !!!"
गंगुआ हँसते हुए "तुम भी जो है ना लठैत गंवार का गंवार ही रह गया!!!! अरे यही तो राजनीति है!!! इस बार पंचायत चुनाव में तुम देखा मल्लूह काका भी मुखिया के चुनाव में खड़ा थे, जबकि ऊ खुद भी जानते थे कि ऊ नही जीतेंगे !!! अब तुम ही बताओ ऊ क्यों खड़ा हुए थे???"
"भक्क मरदे !!!! ई  तो पुरा गाँव जानता है कि मल्लूह काका वोट काटने के लिये खड़ा हुए थे। उनका इलेक्शन का पुरा खर्चा भी मुखीयाजी ही उठाये थे जिससे बनारसी काका जैसा ईमानदार आदमी का वोट कट गया और ऊ चुनाव हार गये। ई मल्लूह काका के कारण ही ई बार फिर अप्पन पंचायत का मुखिया ऐसन बईमान आदमी बन गया !!! देखा नही रिजल्ट के दिन दोनों आदमी केतना गला मिल रहे थे!!! दोनों बैमानों के कारण बनारसी काका हार गये!!!"
"यही राजनीति है रे बुरबक" गंगुआ ने समझाया।
"मतलब सरकार कुछ दलाल नेता के बल पर मास्टर लोगों को बाँट कर अपना उल्लू सीधा करना चाहती है" लठैत अचानक से बोल पड़ा !!!!
"बिल्कुल !!! एकदम सही पकड़े हो!!! अँगरेज़ चला गया लेकिन अप्पन कुछ नाजायज औलाद सबको यहीं छोड़ के गया है। कोई मस्जिद के नाम पर पब्लिक को लड़ा रहा है!!! कोई धर्म के नाम पर !!! कोई आरक्षण के नाम पर !!!.कोई जाति के नाम पर !!! और तो और कोई अप्पन बड़का नेता होने के नाम पर !!! लेकिन यहाँ तो सुप्रीम कोर्ट भी मास्टर के साथ है। मास्टर क्या होम गार्ड, आँगनबारी सेविका , नियोजित डाक्टर, नियोजित इंजिनियर सबको समान काम का समान वेतन देना सरकार की वाजिब जिम्मेदारी है!!!"

लठैत सिंह ने हामी में सर हिलाया और रहस्यमयी मुस्कान के साथ बोला "अब हमको बिल्कुल समझ में आ गया कि आखिर कौन लोग सनक गया है!!! अबरी विधान सभा चुनाव में  पब्लिक सब समझा देगा !!!!

- बिपिन कुमार चौधरी

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